हिंदी के हक में
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गृह मंत्रालय के मातहत कार्यरत केंद्रीय सुरक्षा बलों में अंग्रेजी वर्चस्व के दिन बीतने वाले हैं। इन बलों में अब सिर्फ हिंदी में काम करने वाले बाबुओं और टाइपिस्टों की नियुक्ति होगी। गृह मंत्री बनने के बाद अमित शाह ने जब भी किसी केंद्रीय बल का दौरा किया और उनसे संबंधित रिपोर्ट मांगी, तो उनके सामने संबंधित बल की अंग्रेजी में ही रिपोर्टें पेश की गईं। इसके बाद उन्होंने बलों की भाषायी संस्कृति बदलने की तैयारी की और सामान्य कामकाज हिंदी में करने पर जोर दिया। इसी सिलसिले में तय हुआ है कि बलों में अब बाबू और टाइपिस्ट हिंदी वाले ही तैनात किए जाएंगे। हिंदी को व्यावहारिक तौर पर सरकारी कामकाज की भाषा बनाने की दिशा में यह बड़ा कदम होगा। पर इसके साथ ही कुछ सवाल भी खड़े होते हैं, जिनके जवाब अगर नहीं ढूंढे गए, तो हिंदी को लेकर उठाए जा रहे इस सदाशयी कदम को भी नौकरशाही अपनी फच्चरबाजी से रोक देगी।
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केंद्रीय बलों में कार्यरत जवानों में से ज्यादातर हिंदी ही समझते हैं। हिंदी के पक्षधर और आंदोलनकर्मी हिंदी को उसका सहज स्थान दिलाने के आंदोलनों और विमर्शों में जब भी शामिल होते हैं, तब वे इन तथ्यों का जिक्र किए बिना नहीं रहते। ऐसे ही इंसाफ मांगने जाने वाले ज्यादातर लोग अंग्रेजी नहीं जानते। पर चार उच्च न्यायालयों को छोड़ दें, तो तकरीबन सभी उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्याय की भाषा अंग्रेजी है। पक्षकार और मुद्दई, दोनों को पता नहीं होता कि उनके मुकदमे के बारे में फैसला क्या आया है।
इसके बावजूद नौकरशाही का अब तक रवैया हिंदी विरोधी ही रहा है। उच्च नौकरशाही के लोग जिस सिविल सेवा परीक्षा के जरिये चुनकर आते हैं, उसमें अंग्रेजी का बोलबाला है। अब भी संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा की मुख्य भाषा तो अंग्रेजी है ही, उसकी बुनावट भी ऐसी है कि अंग्रेजी माध्यम के ही छात्र ज्यादा सफल होते हैं, इसलिए उन्हें अपना कामकाज अंग्रेजी में करना आसान लगता है। केंद्रीय बलों से संबंधित इस नए कदम की काट वे ढूंढ सकते हैं। हो सकता है कि वे फाइलों पर नोटिंग हिंदी में करें, पर उसका संक्षिप्तिकरण अंग्रेजी में कराएं। इसके लिए वे पहले मंत्रालय में हिंदी में आने वाले पत्रों का अपने अनुवादकों के जरिये अंग्रेजी अनुवाद करा सकते हैं। अंग्रेजी में ही उसका जवाब तैयार होगा। उसका फिर वे हिंदी में अनुवाद कराएंगे और वही पत्र गृह मंत्रालय को भेजा जाएगा। इससे मंत्रालय और संबंधित बलों के राजभाषा विभागों का कामकाज बढ़ जाएगा। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि राजभाषा अधिकारी हिंदी पखवाड़े में कुछ कार्यक्रम आयोजित करने और कुछ दस्तावेजों-सालाना रिपोर्टों के अनुवाद के अलावा करते क्या हैं? पर इसका एक नुकसान यह होगा कि हिंदी में मूल काम करने की प्रवृत्ति विकसित नहीं हो पाएगी और वह अंग्रेजी की चेरी ही बनी रहेगी।
एक और खतरा है। गृह मंत्रालय के इस कदम के विरोध में ताकतवर हैसियत रखने वाला अंग्रेजी मीडिया उतर सकता है। अतीत में हिंदी के पक्ष में कई बेहतर कदम उठाए गए, पर वर्चस्ववादी अंग्रेजी मीडिया के कड़े विरोध के बाद उन्हें वापस ले लिया गया। सिविल सेवा में अंग्रेजी के वर्चस्व को बढ़ावा देने के लिए मनमोहन सरकार के फैसले के खिलाफ छात्रों का लंबा धरना चला, पर तंत्र में बदलाव नहीं आया। इसके बावजूद यह कदम कामयाब रहा, तो आने वाले दिनों में हिंदी वालों का उत्साह बढ़ेगा।