ड्रोन पत्रकारिता के युग में
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जब भी पत्रकार शब्द सामने आता है, एक छवि मानस पटल पर उभरती है, कुर्ता-पाजामा और चप्पल पहने एक व्यक्ति की, जिसने मोटा चश्मा पहन रखा है, दाढ़ी बढ़ी हुई है। कंधे में झोला है, जिसमें डायरी, टेप रिकॉर्डर, कैमरा, कलम आदि हैं। यह पत्रकार की पारंपरिक छवि है, जिसमें हाल के वर्षों में बड़ी तेजी से परिवर्तन आया है। कागज-कलम या झोले की जगह अब लैपटॉप, स्मार्टफोन और अत्याधुनिक गैजेटों ने ले ली है। पत्रकार के औजारों में जल्द ही एक नया औजार जुड़ने जा रहा है, वह है, ड्रोन। यानी एक ऐसा लघु विमान, जो मुश्किल जगह से दृश्यों को कैद कर ले आए। खबर व विजुअल जुटाने के लिए अमेरिका में इसका प्रयोग शुरू हो गया है।
भारत में पिछले साल लोकसभा चुनाव में ड्रोन का सीमित प्रयोग हो चुका है, पर इसके उपयोग को लेकर विवाद भी खड़े हो रहे हैं कि कहीं इससे लोगों की निजता का हनन तो नहीं हो रहा? अमेरिका में संघीय विमानन प्रशासन इसके लिए नया कानून बनाने में जुटा है, तो पत्रकारिता संस्थान और बड़े मीडिया घराने इसके लिए शिक्षण-प्रशिक्षण की तैयारियों में जुट गए हैं। बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान एक मुद्दा यह भी था कि अमेरिका ड्रोन प्रौद्योगिकी भारत को दे। फिलहाल कुछ भारतीय कंपनियां अमेरिका से ड्रोन सीधे आयात कर रहे हैं, पर टेक्नोलॉजी भी आ जाए, तो यहीं ड्रोन बनने लग जाएंगे। इससे अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है। कहा जा रहा है कि ड्रोन प्रौद्योगिकी के जरिये जोखिम भरी घटनाओं की फील्ड रिपोर्टिंग में आमूल परिवर्तन आ जाएगा। जिस ड्रोन टेक्नोलॉजी को हम वजीरिस्तान के आतंकवाद बहुल क्षेत्रों में बम और मिसाइल गिराने वाले ड्रोन विमानों के रूप में जानते रहे हैं, वही टेक्नोलॉजी हमें समाचार संकलन में मदद पहुंचाएगी! पर बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। जैसा कि मार्शल मैक्लुहान ने कहा है, माध्यम ही संदेश है, तो ड्रोन जब खबर लाने का काम करेगा, तो खबर का चरित्र भी बदलेगा। इसके साथ नैतिक प्रश्न भी जुड़े हैं। अमेरिकी आश्वस्त नहीं हो पा रहे कि ड्रोन की पत्रकारिता उसकी शुचिता को बचाए रखते हुए खबर-संकलन करेगी भी या नहीं!
अमेरिका में चार राज्यों ने रिपोर्टिंग के लिए ड्रोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। 39 राज्य इस पर अब भी विचार कर रहे हैं। पर व्यावसायिक उपयोग वाला ड्रोन अभी बाजार में आया भी नहीं कि कई बड़ी मीडिया कंपनियों ने ड्रोन खरीदने की घोषणा कर डाली है। दुनिया में पेशेवर पत्रकारिता सिखाने वाले सबसे पुराने मिसौरी विश्वविद्यालय ने ड्रोन पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू कर दिया है। नेब्रास्का विश्वविद्यालय के लिंकन पत्रकारिता कॉलेज में ड्रोन पत्रकारिता की लैब बन गई है।
ड्रोन के जरिये जासूसी, फोटोग्राफी, रिपोर्टिंग, फिल्म निर्माण, हवाई सर्वेक्षण, आपदाग्रस्त इलाकों का सर्वेक्षण, खोज एवं बचाव कार्य, वन्यप्राणियों की गणना, फसलों का सर्वेक्षण, जंगल की आग का सर्वेक्षण, दुर्गम इलाकों तक चिकित्सकीय सुविधा पहुंचाने जैसे काम किए जा सकते हैं। जहां तक रिपोर्टिंग का सवाल है, दंगा-फसाद हो या युद्ध, प्राकृतिक आपदा हो या हिंसक प्रदर्शन या स्टिंग ऑपरेशन, ये काम ड्रोन के कैमरों के जरिये प्रामाणिक अंदाज में हो सकते हैं। यह टेक्नोलॉजी काफी सस्ती भी हो गई है। जहां एक हेलीकॉप्टर के एक घंटे के 1,500 डॉलर देने पड़ते थे, वहां 1,000 डॉलर में पूरा ड्रोन ही आ जा रहा है। ड्रोन का नाम चाहे जितना बदनाम हो, यह एक इंटेलीजेंट मशीन है, जो रिमोट से परिचालित होती है, जीपीएस सिस्टम से लैस होने से अचूक भी है और बिना आदमी के उड़ती है। यह पत्रकारिता के जोखिम भरे पेशे के लिए वरदान साबित हो सकता है। पर असली मुद्दा यह है कि इससे पत्रकारिता के पवित्र उसूलों को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए।