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(अ) मन पसंद शहर में...!
प्रकाश पुरोहित
Updated Thu, 03 Oct 2013 06:50 PM IST
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अभी दो दिन पहले ही मुझे मालूम हुआ कि मेरा शहर अमन-पसंद है, वरना तो मन में न जाने कैसे-कैसे बुरे ख्याल आ रहे थे कि नींद में भी चौंक जाता था। वैसे मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि इस धरा पर कोई अमन-नापसंद शहर भी है। भला हो...कि तीन दिन में चार हत्याएं हो गईं, तो किसी के दिल से यह सच निकल गया कि मेरे अमन-पसंद शहर का चैन छिन गया है।
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अब तक तो मुझे यही लग रहा था कि देश के दूसरे प्रदेशों में जैसे शहर होते हैं, वैसा ही है मेरा शहर। यह रहस्य ही रहता...अगर एक साथ तीन-चार हत्याएं नहीं होतीं। यानी हत्याओं के लगातार होने से ही यह यह पता लग सकता है कि आपका शहर अमन पसंद है या नहीं। उन गुंडों का शुक्रिया, जिनकी वजह से मैं अपने शहर का खूबसूरत सच जान सका। शरीफ लोगों के भरोसे तो आप पूरे खर्च हो जाएं और पता भी न चले कि आपके शहर का चरित्र क्या है। अमन-पसंद शहर में गुंडे न हों, तो पता करना मुश्किल कि हम किस टाइप के शहर में रह रहे हैं।
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कहने वाले तो यह भी कह सकते हैं कि हत्या के अलावा होने वाले अपराध अमन-पसंद शहर की पहचान नहीं हैं क्या! बाकी अपराध रात के अंधेरे में और चोरी-चुपके, नजर बचाकर किए जाते हैं, लेकिन हत्या का क्या है कि दिन-दहाड़े करने का रिवाज है। सुपारी ली है रामलाल की...और अंधेरे में श्यामलाल को टपका दिया, तो एक सुपारी में दो हत्या नहीं करना पड़ेगी क्या? रामलाल को तो सुपारी की एवज में मरना ही है न! तो अमन-पसंद शहर में हत्या दिन-दहाड़े की जाती है, क्योंकि अमन-पसंद लोग किसी के कर्तव्य पालन में आड़े नहीं आते। कुछ लोगों का तो यह भी अंधविश्वास है कि यह शहर अगर अमन-पसंद नहीं होता, तो शायद इतनी हत्याएं और इतने अपराध भी नहीं होते।
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अब अगर शहर अमन-पसंद है, तो इतनी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी न! या तो आप अमन-पसंद हो लें...या फिर इतनी हिम्मत दिखाएं कि अपराधी किसी और अमन-पसंद शहर की तरफ निकल जाएं।
सच कहूं, तो यह जानकर डर बढ़ गया है कि मेरा शहर अमन-पसंद है। कल्पना करता हूं कि कोई रिवॉल्वर या चाकू ताने मेरी तरफ दौड़ा चला आ रहा है...और मेरा अक्खा अमन पसंद शहर यों कनखियों से, निर्विकार भाव से देख रहा है, जैसे कुछ हो ही नहीं रहा है। अमन-पसंद शहर में कितनी आसान है मेरी हत्या!