...जो डल सूख जाएगी तो

पंकज चतुर्वेदी Updated Sat, 08 Dec 2012 10:07 PM IST
if dull will dry
धरती का स्वर्ग कहलाने वाले श्रीनगर की फिजा बारूद की गंध से हताश है और शहर का ‘अस्तित्व’ मानी जाने वाली डल झील तिल-तिल कर मर रही है। कभी यह झील इनसानों के साथ लाखों-लाख जलचरों, परिंदों का घरौंदा हुआ करती थी। झील से हजारों हाथों को काम मिलता था।

अपने जीवन की थकान, हताशा और एकाकीपन दूर करने देश भर के लाखों लोग इसकी दीदार को आते थे। अब यह बदबूदार नाबदान और शहर के लिए मौत के जीवाणु पैदा करने का जरिया बन गई है। सरकार का दावा है कि वह डल को बचाने के लिए कृतसंकल्प है, लेकिन साल-दर-साल सिकुड़ती झील इसे कागजी शेर की दहाड़ निरूपित करती है। डल पानी का महज एक सोता नहीं, स्थानीय लोगों की जीवन-रेखा है, इसके बावजूद स्थानीय लोग इसके प्रति उदासीन हैं।

श्रीनगर नगर निगम के अफसरान तो साफ कहते हैं कि शहर की अधिकांश आबादी प्रॉपर्टी टैक्स तक नहीं चुकाती। यही लोग साफ-सफाई के लिए सरकार को कोसते हैं। डल के प्रति सरकार और समाज का ऐसा साझा रवैया इसका दुश्मन बन गया है। इन दिनों श्रीनगर में डल सियासी मसला बन गया है- इसके संरक्षण के लिए नहीं, बल्कि हाई कोर्ट के निर्देश पर हाउसबोट हटाने की मुहिम को लेकर। पुलिस-प्रशासन हाउसबोटों को हटाने जा रहा है और इसके जरिये पेट पाल रहे हजारों परिवार मरने-मारने पर उतारू हैं। डल को केवल हाउस बोट से खतरा नहीं है, इसके अलावा भी इसके कई दुश्मन हैं।

समुद्र तल से 1,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित डल एक प्राकृतिक झील है और कोई पचास हजार साल पुरानी है। शहर के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी दिशा में स्थित यह जल-निधि पहाड़ों के बीच इस तरह विकसित हुई थी कि पिघली हुई बर्फ के साथ बारिश की एक-एक बूंद इसमें संचित होती थी। इसका जल ग्रहण क्षेत्र और अधिक पानी की निकासी का मार्ग बगीचों और घने जंगलों से आच्छादित हुआ करता था।

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 1200 में इस झील का फैलाव 75 वर्ग किलोमीटर में था। वर्ष 1847 में इसका क्षेत्रफल 48 वर्ग किमी आंका गया। वर्ष 1983 में हुए माप-जोख में यह महज 10.56 वर्ग किमी रह गया। अब इसमें जल का फैलाव बमुश्किल आठ वर्ग किमी रह गया है। झील की गहराई गाद से पटी हुई है। पानी का रंग लाल-गंदला है और काई की परतें हैं। इसका पानी इनसान के इस्तेमाल के लिए खतरनाक घोषित किया जा चुका है। गौरतलब है कि श्रीनगर की कुल आय का 16 प्रतिशत इसी झील से आता है, और यहां के 46 फीसदी लोगों के घर का चूल्हा इसी झील के जरिये हुई कमाई से जलता है।

डल झील अगर इसी तरह सिकुड़ती रही, तो यह और 350 साल बची रह सकती है। इसके लिए सबसे बड़ा खतरा उसके जल-क्षेत्र को निगल रही आबादी से है। वर्ष 1986 में हुए एक सर्वे के मुताबिक झील के 300 हेक्टेयर पर खेती और 670 हेक्टेयर क्षेत्र पर आवास के लिए कब्जा किया गया है। इसके चारों ओर घनी बस्ती है। झील पर ही 200 से अधिक छोटे-बड़े हाउस बोट हैं। इतने लोगों के मल, दैनिक निकासी आदि सभी झील में सीधे गिरती है। झील के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल शहर का कचरा फेंकने के लिए कई साल तक होता रहा । रूड़की यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में बताती है कि झील में हर साल 61 लाख टन गंदगी गिर रही है। इसी गति से कचरा जमा होने पर यहां जल्दी ही सपाट मैदान होगा।

डल के पानी के बड़े हिस्से पर अब हरियाली है। झील में हो रही खेती और तैरते बगीचे इसे जहरीला बनाने में बड़ी भूमिका अदा कर रहे हैं। साग-सब्जियों में अंधाधुंध रासायनिक खाद व दवाएं डाली जा रही हैं, जिससे पानी खराब होने के साथ जलचरों की कई प्रजातियां नष्ट हो गईं। मछलियों की कई प्रजातियां और मेंढक गायब हो गए हैं। श्रीनगर शहर की क्षमताओं के अनुरूप सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है नहीं, डल के शिकारे साल भर पर्यटकों से भरे रहते हैं और उनकी गंदगी झील में गिरती है। इसका खामियाजा स्थानीय लोग भुगत रहे हैं। करीबी बस्तियों में शायद ही ऐसा कोई घर हो, जहां के लोग गेस्ट्रोइनटेरिटिस, पेचिस, जैसे रोगों से पीड़ित न हों।

आज डल झील का प्रदूषण जिस स्तर तक पहुंच गया है, उसमें कुछ वर्षों के बाद इसका इलाज ही नहीं बचेगा। यदि श्रीनगर शहर को बचाना होगा, तो झील को सुखाना जरूरी हो जाएगा। हालांकि अब भी कुछ आपात कदम उठाकर तसवीर बदली जा सकती है। उदाहरण के लिए, झील में जमे गाद को बाहर निकालने के साथ इसे गहरा करना पड़ेगा, इसके जल आवक क्षेत्र में हुए अतिक्रमणों को हटाना पड़ेगा, झील में किसी भी तरह के नाले या गंदगी को गिरने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाना पड़ेगा। इसके अलावा मछलियां पालने और यहां उग रही वनस्पति में रसायनों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने जैसे कदम भी डल को नया जीवन दे सकते हैं। यह  स्पष्ट है कि आम लोगों को झील के बारे में संवेदनशील और इसे नया जीवन देने की मुहिम में भागीदार बनाए बिना इसे बचाने की कोई भी योजना सार्थक नहीं हो सकती।

Spotlight

Most Read

Opinion

सुशासन में नागरिक समाज की भूमिका

सुशासन को अमल में लाने के लिए नागरिक समाज का अहम स्थान है, क्योंकि यही समाज की क्षमता में वृद्धि करते हैं और उसे जागरूक बनाते हैं। यही सरकार या राज्य को आगाह करते हैं कि कैसे नागरिकों की भागीदारी से उनका संपूर्ण विकास किया जाए।

20 जनवरी 2018

Related Videos

इस मराठी फिल्म का रीमेक लेकर आ रहे हैं करण जौहर, पोस्टर जारी

मराठी फिल्म 'सैराट' की रीमेक ‘धड़क’ 20 जुलाई को रिलीज हो रही है। इस बात की घोषणा फिल्म के प्रोड्यूसर करन जौहर ने की। इसके साथ ही करन जौहर ने धड़क का नया पोस्टर भी जारी किया है। जिसमें जाह्नवी और ईशान की रोमांटिक केमिस्ट्री भी दिख रही है।

20 जनवरी 2018

  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper