संयुक्त राष्ट्र में सुधार की राह में रोड़े
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पिछले कई दशकों से दुनिया जिस तेजी से आगे बढ़ी है, उसके सामने नई चुनौतियां भी पैदा हुई हैं। यही कारण है कि आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा संकट सुरक्षा का है, और सबसे बड़ी चुनौती जीवन को बचाने की है, जो उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों से ही संरक्षित रह सकती है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना ऐसी ही चुनौतियों से निपटने और शांति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हुई थी। लेकिन क्या संयुक्त राष्ट्र महासभा दुनिया को यह इत्मीनान दिला सकती है कि वह वास्तव में दुनिया के सामने खड़ी चुनौतियों का समाधान खोजने में सफल हो गई है?
पिछले दिनों अमेरिका, रूस और चीन के निर्णय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों को तो झटका लगा ही, भारत के उन प्रयासों को भी चोट पहुंची, जो सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए लंबे समय से किए जा रहे हैं। अमेरिका, रूस और चीन ने सुधार से जुड़ी वार्ताओं का विरोध किया है और सुधार की दीर्घ प्रक्रिया का आधार बनने वाले ‘फ्रेमवर्क डॉक्यूमेंट टेक्स्ट’ में योगदान से साफ तौर पर इन्कार कर दिया है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष सैम कुटेसा ने सुरक्षा परिषद में सुधार से जुड़ी वार्ताओं के आधार निर्मित करने वाले दस्तावेज को सदस्य देशों के बीच प्रसारित करके उन पर उनकी राय पाने की कोशिश की थी। कुटेसा ने सभी सदस्यों को लिखे पत्र में कहा कि वह उन समूहों और सदस्य देशों के रुख को दर्शाने वाले पत्रों को भी प्रसारित कर रहे हैं, जिन्होंने ये संकेत दिए थे कि वे अपने प्रस्तावों को ‘फ्रेमवर्क डॉक्यूमेंट टेक्स्ट’ में नहीं शामिल करना चाहते हैं। इन देशों में अमेरिका, रूस और चीन शामिल हैं।
शीतयुद्ध के बाद गुटनिरपेक्ष देशों ने 1992 के शिखर सम्मेलन में सुरक्षा परिषद के सुधार को सर्वाधिक महत्व दिया था। उसका कहना था कि कुछ देशों की परिषद पर हावी होने की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। उसकी दृष्टि में स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति का होना संयुक्त राष्ट्र के लोकतांत्रिक उद्देश्यों के विपरीत है, इसलिए इसकी समीक्षा की जानी चाहिए। उस समय सुरक्षा परिषद के सुधार के लिए दो प्रमुख मुद्दे थे, जो अब भी हैं-प्रथम, सुरक्षा परिषद की सदस्य संख्या में विस्तार और दूसरा, संयुक्त राष्ट्र के कामकाज की प्रक्रिया में बदलाव। सदस्य संख्या के विस्तार के लिए संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में एक औपचारिक संशोधन की जरूरत होगी, जबकि काम करने की प्रक्रिया में बदलाव चार्टर के एक औपचारिक संशोधन के बिना किया जा सकता है।
वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष द्वारा इंटर गवर्नमेंटल निगोसिएशन (आईजीएन) ऑन सिक्योरिटी काउंसिल रिफॉर्म नाम का तंत्र तैयार किया गया था, जिसे एक ‘फ्रेमवर्क टेक्स्ट’ तैयार करना था। इसी फ्रेमवर्क टेक्स्ट को सैम कुटेसा द्वारा बीते एक अगस्त को पेश किया गया था, जिसमें अमेरिका, चीन और रूस ने अपने प्रस्तावों को शामिल कराने से मना कर दिया।
फिलहाल पी-फाइव देशों (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्य देश) के कम से कम तीन देश सुरक्षा परिषद में सुधार के पक्षधर नहीं लगते। ऐसे में भारत की उम्मीदों का परवान चढ़ना मुश्किल है। फिर भी प्रयासों को विराम देने की जरूरत नहीं है, बल्कि जरूरी है कि भारत अकेले या जी-फोर के रूप में दुनिया के समक्ष सुधार के लिए सकारात्मक वैश्विक माहौल बनाने का प्रयास जारी रखे।