{"_id":"18614b78-97c4-11e2-b06d-d4ae52bc57c2","slug":"hunters-may-also-hunt","type":"story","status":"publish","title_hn":"शिकारी भी हो सकता है शिकार","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
शिकारी भी हो सकता है शिकार
सुनील खिलनानी
Updated Thu, 28 Mar 2013 09:55 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अमेरिकी सरकार, मीडिया, कॉरपोरेट दफ्तरों और अमेरिकी राजधानी में स्थित तकरीबन सभी महत्वपूर्ण संस्थानों की इंटरनेट प्रणाली की व्यापक हैकिंग संबंधी ताजा खुलासे हैरान करने वाले हैं। इनमें से कुछ की व्यापक जांच के बाद जो निष्कर्ष सामने आए, वे चिंताजनक हैं।
विज्ञापन
ये निष्कर्ष पिछले महीने अमेरिकी इंटरनेट सुरक्षा कंपनी मैनडिएंट की तरफ से प्रकाशित किए गए, जिनमें बताया गया है कि हैकरों की खोजबीन से पता चला कि उनमें से ज्यादातर शंघाई के नजदीक एक स्थान से संबंधित हैं। वह जगह चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की यूनिट 61398 का अड्डा है। इस यूनिट को साइबर ऑपरेशन के मामले में विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है।
विज्ञापन
इससे पहले भारत के इंटरनेट नेटवर्क को संकट में डालने के कई मामले सामने आए थे। वर्ष 2009 में कनाडा के कुछ शोधकर्ताओं ने एक अन्य चीनी नेटवर्क घोस्टनेट का ब्योरा प्रकाशित किया था, जिसने भारत सरकार, उसके राजनयिक तंत्र से संबंधित कंप्यूटर प्रणाली के साथ-साथ दलाई लामा के नेटवर्क को भी खंगाला था।
विज्ञापन
उसके अगले साल ईरान को निशाना बनाने वाली अमेरिका निर्मित स्टक्सनेट वॉर्म ने भारत के भी तकरीबन 7,000 कंप्यूटरों में घुसपैठ की थी। स्मार्टफोन के विस्तार के चलते भारत में इंटरनेट की पहुंच काफी बढ़ रही है। साथ ही, सूचना एवं प्रौद्योगिकी पर कई अन्य क्षेत्रों की निर्भरता भी बढ़ती जा रही है। ऐसे में हमारे लिए साइबर खतरे काफी बढ़ गए हैं।
इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस अभी कम है, जबकि सरकार एक सिद्धांत और नीति तैयार करने के शुरुआती दौर में ही है। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने पिछले सप्ताह संसद में ऐसा ही आश्वासन दिया है। ज्यादातर तकनीकी मामलों की तरह इस मामले में भी हमें बहस को केवल साइबर क्षेत्र के लोगों और तकनीकी, कानूनी व सुरक्षा विशेषज्ञों पर नहीं छोड़ना चाहिए। साइबर क्षेत्र द्वारा उठाए गए मुद्दे मूल रूप से राजनीतिक हैं।
सच्चाई यह है कि साइबर क्षेत्र के विस्तार ने विभिन्न देशों और देशों व नागरिकों के बीच शक्ति संतुलन को अस्थिर किया है। इसने आधुनिक राज्य के दो प्रमुख तत्वों, सुरक्षा और गोपनीयता के सामने चुनौतियां पेश की हैं। दरअसल इंटरनेट ने सूचनाओं के प्रवाह के नियंत्रण को लगभग असंभव और जानकारी के सभी संरक्षित भंडारों को खोज योग्य बना दिया है। इस तरह गोपनीयता की प्रकृति में बदलाव आया है और सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के बीच की दीवार धुंधली हो गई है।
मालिकाना कॉरपोरेट जानकारी, बौद्धिक संपदा, अंतरंग निजी विवरण या राज्य की गोपनीय सूचनाएं अब हैकरों की पहुंच से बाहर नहीं हैं। इसके अलावा साइबर क्षेत्र ने विध्वंस के काम को इस तरह सक्षम बना दिया है कि वह जान-माल को नुकसान पहुंचाए बिना किसी राज्य को अपंग बना सकता है। फिर भी साइबर हमलों ने हिंसा की अनिवार्यता और युद्ध की परिभाषा को बदल तो दिया ही है।
किंग्स कॉलेज लंदन के विद्धान थॉमस रीड की ताजा किताब साइबर वार विल नॉट टेक प्लेस में इसी विरोधाभास का वर्णन है कि साइबर हमला किस तरह युद्ध की आशंकाओं को खत्म करता है। रिड का तर्क है कि साइबर वार का अर्थ भले ही युद्ध हो, लेकिन वस्तुतः यह युद्ध है नहीं।
उनके मुताबिक, विस्फोटकों के बजाय कोड से संचालित होने वाले साइबर हमले मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं- तोड़फोड़ वाले, जो मुख्य रूप से सरकार, उद्योग या वैज्ञानिक क्रियाकलापों को निशाना बनाते हैं, जासूसी वाले, जिन्हें वाणिज्यिक आंकड़ों और मालिकाना जानकारी पर कब्जा करने के लिए तैयार किया जाता है, और विध्वंसक किस्म के-इसके तहत सोशल मीडिया के जरिये ऐसे आंदोलन खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे कोई सरकार कमजोर हो सकती है या उसका तख्तापलट भी हो सकता है। रिड का भी निष्कर्ष यही है कि साइबर खतरों के मूल्यांकन और साइबर हमलों की जवाबी कार्रवाई से संबंधित सभी अहम निर्णय राजनीतिक स्तर पर लिए जाते हैं, तकनीकी स्तर पर नहीं।
साइबर हमलों का प्राथमिक लक्ष्य शरीर को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि दिमाग में गड़बड़ी पैदा करना है। वे वित्तीय, वैज्ञानिक, सैन्य, सरकारी और राजनयिक प्रणालियों के प्रति अविश्वास पैदा करके अनिश्चय का माहौल बनाना चाहते हैं। उनका लक्ष्य भरोसे को नष्ट करना होता है, जिसके लिए वे सूचनाएं जारी करने, अफवाहें फैलाने या आधारभूत संरचना व सुरक्षा प्रणाली को अव्यवस्थित करने जैसे तरीकों का सहारा लेते हैं। इस तरह साइबर हमले सरकार की विश्वसनीयता को चौपट कर देते हैं। इसका उद्देश्य अव्यवस्था पैदा करना और सोच को बदल देना होता है। रीड बताते हैं कि किसी राजनीतिक प्रणाली में जवाबदेही और पारदर्शिता ही साइबर हमलों से निपटने का सबसे अच्छा तरीका है।
इस लिहाज से देखें, तो शंघाई के पुडॉन्ग में यूनिट 61398 द्वारा तैयार की गई आक्रामक क्षमता वास्तव में उस अधिनायकवादी देश के नेताओं के लिए ही सर्वाधिक चिंतनीय होनी चाहिए। चीनी समाज के जिन तेज दिमाग लोगों ने यह अचूक साइबर क्षमता विकसित कर ली है, कल वे इसी के जरिये अपनी सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठा सकते हैं, क्योंकि पारदर्शिता और जवाबदेही का तो वहां नामोनिशान नहीं है। यानी भारत व अमेरिका जैसे देशों को अस्थिर करने के लिए साइबर हमलों का जो तरीका चीन ने अख्तियार किया है, भविष्य में वह उसके लिए घातक हो सकता है।
(लेखक इंडिया इंस्टीट्यूट, किंग्स कॉलेज, लंदन के निदेशक हैं।)