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नागरिक अधिकार : भीड़ की हिंसा पर चुप्पी
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सार
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
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अमर उजाला
विस्तार
जब मैं यह कॉलम लिखने बैठी, तो मेरे कानों में अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन के नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर की यह पंक्ति गूंज रही थी कि 'हिंसा इस ब्रह्मांड में बुराइयां और हिंसा को बढ़ाती है। यह किसी भी समस्या का समाधान नहीं करती।' महामारी बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है। लाखों भारतीय अपने प्रियजनों को खोने के बाद उनकी स्मृतियों से निपटने और जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन साल के अंत में हम एक परेशान करने वाले सवाल से भी जूझ रहे हैं कि क्या एक इंसान को दूसरा इंसान सिर्फ इसलिए मार सकता है कि उस व्यक्ति ने उसे गहरे तौर पर आहत किया है?
हाल के दिनों में सीमावर्ती राज्य पंजाब में, जहां विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, बेअदबी की घटनाओं के आरोपियों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से की गई किसी भी बेअदबी की घटना की निंदा की जानी चाहिए और ऐसे अपराधों में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन आरोपी व्यक्ति की निर्मम हत्या देश के कानून की अवहेलना है। किसी भी मामले में किसी को भी आरोपी व्यक्ति को शारीरिक दंड देने का अधिकार नहीं है। संदिग्ध आरोपियों को जांच और उचित कार्रवाई के लिए पुलिस को सौंप देना चाहिए था। व्यक्ति की हत्या करके सबूत नष्ट नहीं किए जाने चाहिए थे। राजनीतिक और धार्मिक नेताओं ने बेअदबी की कड़ी निंदा की है, लेकिन लिंचिंग की घटना के बारे में कुछ नहीं कहा है।
पंजाब और अन्य जगहों पर हत्याओं की निंदा करने में राजनीतिक समुदाय की विफलता बेहद परेशान करने वाली है और भीड़ की हिंसा व कानून हाथ में लेने की घटना व्यापक सवाल खड़े करती है। भारत गहरे तौर पर एक धार्मिक और विविधतापूर्ण देश है। यहां एक समूह जिसे पवित्र मानता है, जरूरी नहीं कि दूसरा समूह भी उसे उसी नजर से देखे। यदि हम साथ-साथ जीना, फलना-फूलना और प्रगति करना चाहते हैं, तो यह परस्पर सम्मान के सिद्धांत से ही संभव हो सकता है। लेकिन हिंसा की भाषा तेजी से सामाजिक वैधता प्राप्त कर रही है, जहां लोग आपराधिक न्याय प्रणाली के कामकाज से नाखुश हैं और अन्य कारणों से बंदूक या लाठी हाथ में उठाने और तत्काल न्याय करने का फैसला करते हैं। अक्सर इसका मतलब किसी की जान लेना होता है। देश भर में, कई कारणों से गुस्साई भीड़ द्वारा कानून को हाथ में लेने के अनगिनत उदाहरण हैं- कभी एक पवित्र पुस्तक, एक पवित्र जानवर, और कुछ अन्य कारणों से।
मूल बात यह है कि हत्या, हत्या है और इसे कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। और जैसे-जैसे सहिष्णुता घटती जा रही है, यह पूछना महत्वपूर्ण है कि क्या इन चिंताजनक प्रवृत्तियों को उलटा जा सकता है। हम हरिद्वार की धर्म-संसद या दिल्ली में दिए गए नफरती बयान की उपेक्षा नहीं कर सकते। इस तरह प्रतिस्पर्धी हिंसा को भड़काने वाले बयान हमें नष्ट कर देंगे। आखिर इस भीड़ की हिंसा को कैसे रोकें? इसका सीधा-सा उत्तर है कि इसे सामान्य न मानें। अभी-अभी झारखंड विधानसभा ने मॉब वायलेंस ऐंड मॉब लिंचिंग बिल, 2021 पारित किया है, जिसका उद्देश्य राज्य में सांविधानिक अधिकारों की 'प्रभावी सुरक्षा' प्रदान करना और भीड़ की हिंसा को रोकना है। उम्मीद है कि दूसरे राज्य भी ऐसा कानून पारित करेंगे और उसे लागू करेंगे।
हमें सामूहिक रूप से कहना होगा कि किसी को चोट पहुंचाना भी गैर-कानूनी है, हत्या करना तो दूर की बात। चाहे कुछ भी हो जाए, भीड़ कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकती। राजनीतिक नेतृत्व के साथ न्याय तंत्र को भी कड़े संदेश देने होंगे कि गैरकानूनी कृत्यों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साहिर लुधियानवी ने ठीक ही कहा है, आज अगर खामोश रहे, तो कल सन्नाटा छाएगा। हिंसा से हिंसा पैदा होती है और हिंसा में डूबे देश का कोई भविष्य नहीं होता। हमें हिंसा के इस चक्रव्यूह में फंसकर अपना और अपने बच्चों का भविष्य खराब नहीं करना है। वर्ष के अंत में, बस यही मेरी आशा और प्रार्थना है।