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अर्थव्यवस्था : आर्थिक विकास से मानव विकास, जरूरी है जीडीपी की गति बनाए रखना

Mon, 05 Jun 2023 06:52 AM IST
Santosh Mehrotra संतोष मेहरोत्रा
Updated Mon, 05 Jun 2023 06:52 AM IST
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सार
शोध में पाया गया कि जो राज्य 1993 से 2018 के बीच प्रांतीय जीडीपी की उच्च वृद्धि बनाए रख सके, वे मानव विकास में अपेक्षाकृत उन्नत थे।
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Human development from economic development, it is necessary to maintain the pace of GDP
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारतीय अर्थव्यवस्था 2016 से आर्थिक विकास में मंदी और बढ़ती शिक्षित बेरोजगारी के साथ एक महत्वपूर्ण चरण से गुजर रही है। 2004 से 2014 तक विकास दर भारत के आधुनिक आर्थिक इतिहास में सबसे अधिक थी। रोजगार में संरचनात्मक परिवर्तन, जो 2004 से शुरू हुआ था, के कारण कृषि में मशीनीकरण बढ़ा, निर्माण क्षेत्र में उछाल आया, गैर-कृषि नौकरी में उच्च वृद्धि हुई  (2004-05 के बाद से 75 लाख प्रति वर्ष), वास्तविक मजदूरी दर बढ़ी, गरीबी में कमी आई ।



परंतु 2016 की नोटबंदी के बाद से वर्ष 2019 तक आर्थिक विकास दर घटती चली गई। फिर कोविड महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था में दशकों बाद भारी संकुचन हुआ। वैश्विक अर्थव्यवस्था में जहां 3.1 फीसदी का संकुचन हुआ, वहीं 2020-21 में भारत की जीडीपी में 6.6 फीसदी की कमी हुई। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था में उसके बाद सुधार हुआ है, लेकिन नियमित, अनौपचारिक, औपचारिक नौकरियों, मजदूरी दर और गरीबों की आजीविका पर जो हानिकारक असर पड़े, उनमें सुधार नहीं हुआ है। अमीर और अमीर होते जा रहे हैं तथा गरीब लोग और भी गरीब। लोग वास्तविक वेतन वृद्धि का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं।


आर्थिक विकास और मानव विकास के बीच पारस्परिक संबंध होता है। हाल के शोध में हमने पाया कि भारत में जो राज्य 1993 से 2018 के बीच प्रांतीय जीडीपी की उच्च वृद्धि को बनाए रख सके, वे मानव विकास में अपेक्षाकृत उन्नत थे। उनकी जीडीपी प्रतिवर्ष सात फीसदी से अधिक दर से बढ़ी। इनमें केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा शामिल हैं। ये राज्य शिक्षा और स्वास्थ्य, दोनों पर जीडीपी का काफी अधिक हिस्सा खर्च कर रहे थे, जो उनके स्वास्थ्य और शिक्षा परिणाम संकेतकों से परिलक्षित होता है।

इसके विपरीत, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में पिछले ढाई दशकों के दौरान औसतन मात्र पांच फीसदी प्रति वर्ष जीडीपी की वृद्धि दर्ज की गई। ये वे राज्य हैं, जहां गरीबी, कुपोषण और शिशु मृत्यु दर बहुत अधिक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) में पाया गया कि इन पिछड़े राज्यों में गंभीर रूप से नाटे बच्चों का अनुपात बढ़ गया है। इसके अलावा, इन राज्यों में स्कूली शिक्षा का औसत वर्ष भी बहुत निम्न स्तर का है, जिसमें पिछले दो दशकों के दौरान ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। इनमें गरीबी का अनुपात भी दक्षिणी राज्यों से अधिक है।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि गरीबी की कमी से न केवल लोगों के जीवन स्तर में सुधार होता है, बल्कि उनके परिवार के खर्च करने की क्षमता भी बढ़ती है। इसलिए गरीबी में कमी से वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ती है, जिससे उत्पादन में वृद्धि की संभावना होती है। विकास दर बढ़ने से शिक्षा और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक और निजी खर्च बढ़ता है। जिसका मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बढ़ती आय परिवारों को स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर खर्च करने में सक्षम बनाती है।

प्रत्येक राज्य सरकार को आर्थिक विकास, गरीबी में कमी, और मानव क्षमताओं में सुधार (शिक्षा और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार) के बीच इन तीन-तरफा संबंधों के बारे में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। हमारा शोध साबित करता है कि गरीबी में कमी और मानव विकास में सुधार, दोनों ही  भारतीय राज्यों में आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए पूर्व शर्त हैं, क्योंकि गरीबी में कमी के साथ बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा आर्थिक विकास का एक  फीडबैक लूप है।

यही कारण है कि दक्षिण के कुछ राज्यों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर औसतन सात फीसदी सालाना के करीब दर्ज करके लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है, जबकि कई अन्य राज्य पांच प्रतिशत की आर्थिक विकास दर को बनाए रखने में भी पूरी तरह विफल रहे हैं।

-विजिटिंग प्रोफेसर, सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज, यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ, यूके।

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