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कैसे लगाएंगे हिंसा पर रोक

Mon, 18 Aug 2014 06:56 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Mon, 18 Aug 2014 06:56 PM IST
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How will he stop the violence

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस के मौके पर लाल किले के प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए एक सार्वजनिक अपील की कि समाज से हिंसा दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि संप्रदाय और जाति के आधार पर निरंतर होती हिंसा एवं सामाजिक तनाव के वातावरण में समाज प्रगति नहीं कर सकता। यही बात माओवादी हिंसा के संबंध में कही जा सकती है, जो कुछ राज्यों में तेजी से फैल रही है।

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उन्होंने दस वर्षों के लिए हर तरह की हिंसा पर रोक लगाने के लिए कहा, ताकि देश में व्यापक स्तर पर विकास की प्रक्रिया शुरू हो सके। प्रधानमंत्री के इस बयान का आम तौर पर स्वागत किया गया। कइयों को लगा कि मोदी का यह बयान हाल के दिनों में मीडिया में हुई उस गंभीर आलोचना का उत्तर है, जिसमें कहा गया था कि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी है। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश के उन इलाकों में बढ़े सांप्रदायिक संघर्ष पर मोदी चुप थे, जहां विधानसभा के उपचुनाव होने वाले हैं। यहां तक कि इस मसले पर पिछले दिनों संसद में उत्तेजित करने वाली बहस भी हुई, जब एक मुस्लिम नेता ने कहा कि 'यदि आप हमारी लाश पर महल बनाना चाहते हैं, तो उसकी बुनियाद कभी मजबूत नहीं होगी।'
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अगले दस वर्षों के लिए हिंसा रोकने की प्रधानमंत्री मोदी की अपील का तात्कालिक कारण तो सांप्रदायिक हिंसा ही लगता है, हालांकि उन्होंने इसे विस्तार देते हुए हर तरह की हिंसा रोकने की जरूरत बताई है, जिसमें जातिगत हिंसा और छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा एवं आंध्र प्रदेश जैसे आदिवासी इलाकों में माओवादियों द्वारा जारी हिंसा भी शामिल हैं। मोदी ने देश के माओवादी नेताओं से यह सही अपील की है कि वे नेपाल के अपने समकक्षों का अनुसरण करें, जो सांविधानिक मुख्यधारा में शामिल हुए हैं।
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लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि भविष्य में मोदी की कथनी और करनी में एकरूपता रहती है या नहीं। प्रधानमंत्री की असली परीक्षा इस पर निर्भर होगी कि वह संघ परिवार के कार्यकर्ताओं की बढ़ती आक्रामकता से कैसे निपटते हैं, जिनका साहस लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत से काफी बढ़ गया है। यह आक्रामकता जमीनी स्तर पर दिख रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बढ़ते सांप्रदायिक संघर्ष संभवतः संघ एवं भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं की उस सोच के उदाहरण हैं कि बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण की जो रणनीति लोकसभा चुनाव में काम कर गई थी, वह विधानसभा उपचुनाव में भी कारगर साबित होगी। कार्यकर्ताओं का साहस इसलिए भी बढ़ा है, क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक ऐसे सांसद को भाजपा ने मंत्री पद दिया है, जो पिछले वर्ष हुए मुजफ्फरनगर दंगे का आरोपी है।

संघ परिवार के आक्रामक तत्वों को आगामी दस वर्षों तक भड़काऊ तौर-तरीके से परहेज करने के लिए कहकर और सामाजिक समन्वय का उदाहरण पेश करते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दंगों में विस्थापित मुस्लिमों को उनके घर और जमीन लौटाकर नरेंद्र मोदी स्वाधीनता दिवस का अपना संकल्प पूरा कर सकते हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो चुकी है, क्योंकि अपने घरों से विस्थापित हजारों मुसलमान ही वहां की अर्थव्यवस्था की धुरी हैं। वहां पूंजी एवं कुशल श्रम के बीच पुल का काम वही करते हैं। सामाजिक समन्वय और पुनर्वास के बिना वहां अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं लौट सकती। लाल किले से मोदी ने कहा है कि सामाजिक सद्भाव के बगैर आर्थिक विकास संभव नहीं। इस लिहाज से पश्चिमी उत्तर प्रदेश मोदी के बयान की असली परीक्षा होगा।

कोई भी यह समझ सकता है कि दस वर्षों के लिए हिंसा को विराम देने की प्रधानमंत्री की टिप्पणी संघ परिवार से जुड़े बजरंग दल एवं वैसे ही अन्य अतिवादी समूहों को भी सीधे संबोधित थी। लिहाजा मोदी को सर्वप्रथम सुनिश्चित करना होगा कि भाजपा दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी तत्वों के बयानों और कार्रवाइयों की सार्वजनिक निंदा करेगी। अन्यथा हिंसा रोकने संबंधी उनके बयान की विश्वसनीयता नहीं रहेगी।

यह दिलचस्प है कि माकपा और भाकपा जैसे मुख्यधारा के वाम दल माओवादियों की खुलकर निंदा करते हैं, पर मुख्यधारा की दक्षिणपंथी पार्टी भाजपा चरम हिंदुत्ववादी तत्वों की सार्वजनिक निंदा नहीं करती है। बल्कि भाजपा के टिकट पर बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता संसद में पहुंचे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी की उपस्थिति में विहिप नेताओं ने नियमित तौर पर भड़काऊ भाषण दिए। ऐसे ही मौके पर एक विहिप नेता ने बिहार में 'मुसलमानों की तरह ज्यादा बच्चे पैदा करने' की अपील की, जो आक्रामक होने के साथ सांप्रदायिक भाषा भी है।

राजग सरकार के मुखिया होने के नाते मोदी को सुनिश्चित करना होगा कि विहिप नेता सामाजिक सद्भाव और एकता को बढ़ावा देने वाली भाषा का प्रयोग करें। पर सवाल यह है कि क्या ये तत्व मोदी के नियंत्रण में हैं। पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के ताजा सांप्रदायिक संघर्ष पर लंबी बहस के दौरान भाजपा सांसद आदित्यनाथ ने एक अतिवादी बयान दिया कि 'सांप्रदायिक वे हैं, जो कहते हैं कि मेरा ईश्वर, मेरा पैगंबर सबसे महान है। जो उनमें विश्वास करते हैं, केवल उन्हें ही जीने का अधिकार है।...हिंदू दर्शन इसकी इजाजत नहीं देता।'


अगर भाजपा सांसद का संसद में हस्तक्षेप का यह स्तर है, तो पार्टी नेतृत्व को इस पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है कि वह अल्पसंख्यक समुदाय के साथ किस तरह से संवाद करना चाहता है। आदित्यनाथ ने एक विनम्र धमकी के साथ अपनी बात खत्म की, 'हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक है। अगर कोई राष्ट्रवाद के प्रतीक हिंदुत्व को बदनाम करेगा, तो उसे इसकी कीमत चुकानी होगी।' क्या संसद में इस तरह के बयान के साथ दस वर्षों के लिए हिंसा पर विराम के संकल्प की शुरुआत की जा सकती है?

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