कैसे कारगर हो कूड़ा प्रबंधन
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भारत प्रदूषण और स्वच्छता के दो मोर्चों पर लड़ रहा है। वेस्ट टू एनर्जी रिसर्च ऐंड टेक्नोलॉजी कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक शोध के मुताबिक भारत में अपर्याप्त कूड़ा प्रबंधन बाईस तरह की बीमारियों का वाहक बनता है। कूड़े में एक ऐसा ही उत्पाद है, जिसका भारत जैसे विकासशील देश में बहुतायत से उपयोग होता है, पर जब यह पॉलिथीन कूड़े में तब्दील हो जाती है, तब इसके निस्तारण की कोई ठोस योजना हमारे पास नहीं है। लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में सरकार ने बताया कि देश में पंद्रह हजार टन प्लास्टिक कूड़ा पैदा होता है, जिसमें से छ हजार टन उठाया नहीं जाता है और वह ऐसे ही बिखरा रहता है!
पिछले एक दशक में भारतीय रहन-सहन में पर्याप्त बदलाव आए हैं। लोग प्लास्टिक की बोतल और प्लास्टिक में लिपटे हुए उत्पाद सुविधाजनक होने के कारण ज्यादा प्रयोग करने लग गए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक साल 2014-15 में 514 लाख टन ठोस कूड़ा निकला, जिसमें से इक्यानबे प्रतिशत इकट्ठा कर लिया गया, जिसमें से मात्र सत्ताईस प्रतिशत का निस्तारण किया गया। शेष तिहत्तर प्रतिशत कूड़े को डंपिंग साइट्स में दबा दिया गया। इस ठोस कूड़े में बड़ी मात्रा पॉलिथीन की है, जो जमीन के अंदर जमीन की उर्वरा शक्ति को प्रभावित कर उसे प्रदूषित कर रही है।
भारत सरकार की 'स्वच्छता स्थिति रिपोर्ट' के अनुसार देश में कूड़ा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) एक बड़ी समस्या है। इस रिपोर्ट में भारतीय सांख्यिकी सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) से प्राप्त आंकड़ों को आधार बनाया गया है। ग्रामीण भारत में तरल कूड़े के प्रबंधन की कोई कारगर व्यवस्था नहीं है, जिसमें मानव मल भी शामिल है। देश के 56.4 प्रतिशत शहरी वार्ड में सीवर की व्यवस्था का प्रावधान है। मगर आंकड़ों के मुताबिक देश का अस्सी प्रतिशत कूड़ा नदियों तालाबों और झीलों में बहा दिया जाता है।
यह तरल कूड़ा पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर देता है। यह एक गंभीर समस्या है, क्योंकि भूजल ही पेयजल का प्राथमिक स्रोत है। प्रदूषित पेयजल स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याएं पैदा करता है, जिसका असर देश के मानव संसाधन पर भी पड़ता है। गांवों में कूड़ा प्रबंधन का कोई तंत्र नहीं है, लोग कूड़ा या तो घर के बाहर या खेतों में ऐसे ही में डाल देते हैं। शहरों की हालत गांवों से थोड़ी बेहतर है, जहां 64 प्रतिशत वार्डों में कूड़ा फेंकने की जगह निर्धारित है, लेकिन उसमें से मात्र 48 प्रतिशत ही रोज साफ किए जाते हैं।
इसी कड़ी में ई कूड़ा भी शामिल है। ई-कचरा या ई वेस्ट एक ऐसा शब्द है, जो तरक्की के इस प्रतीक के दूसरे पहलू की ओर इशारा करता है। वह पहलू है पर्यावरण की बर्बादी। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग चार लाख टन ई-कचरा उत्पन्न होता है। राज्यसभा सचिवालय द्वारा 'ई-वेस्ट इन इंडिया'के नाम से प्रकाशित एक दस्तावेज के अनुसार भारत में उत्पन्न होने वाले कुल ई-कचरे का लगभग सत्तर प्रतिशत केवल दस राज्यों और लगभग साठ प्रतिशत कुल पैंसठ शहरों से आता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो भारत में ई-कचरे के उत्पादन में मामले में महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे समृद्ध राज्य और मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर अव्वल हैं। एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार देश का लगभग 90 प्रतिशत ई-कचरा असंगठित क्षेत्र के अप्रशिक्षित लोगों द्वारा निस्तारित किया जाता है|