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कश्मीरी युवाओं को कैसे जोड़ें
Fri, 22 Feb 2019 07:25 PM IST
Raman Singh
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार
Published by: Raman Singh
Updated Fri, 22 Feb 2019 07:25 PM IST
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कश्मीरी युवा
पुलवामा में हुए आत्मघाती बम धमाके से, जिसमें सीआरपीएफ के चालीस जवान मारे गए, देश भर में व्यापक गुस्सा और आक्रोश है। पाकिस्तान को सबक सिखाने का आह्वान चरम पर पहुंच गया है। जैश-ए-मोहम्मद द्वारा जिम्मेदारी लेने के बावजूद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने इस हमले से किसी तरह का संबंध न होने का दावा किया है। भारत से उनका कार्रवाई करने योग्य सुबूत मांगना हास्यास्पद है। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान को आतंकवादी हमले की निंदा और पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट करनी चाहिए थी। जाहिर है, वह अपने आकाओं की नाराजगी का जोखिम मोल नहीं लेना चाहते थे।
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प्रधानमंत्री मोदी के बयान से जनता की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं, जिसमें उन्होंने कहा है कि उनके 'भीतर भी आग जल रही है' और यह चेतावनी कि 'बातचीत का समय खत्म हो गया है'। वह कार्रवाई के लिए उच्च स्तर पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। पाकिस्तान से सबसे पसंदीदा मुल्क का दर्जा वापस लेना और पाकिस्तानी उत्पादों पर 200 फीसदी शुल्क लगाना उसी दिशा में उठाया गया कदम है। लेकिन अलगाववादी नेताओं से सुरक्षा वापस लेने से उनकी गतिविधियों पर नजर नहीं रखी जा सकेगी। वैश्विक समुदाय आतंकवाद और उसका समर्थन करने वालों के खिलाफ एकजुट नहीं है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की बार-बार अपील के बावजूद आज तक आतंकवाद की परिभाषा पर सर्वसहमति नहीं बन सकी है!
एक सफल ऑपरेशन से प्रधानमंत्री की छवि चमकेगी और भाजपा की चुनावी संभावना बढ़ेगी। पर क्या भारत की दंडात्मक कार्रवाई और पाकिस्तान के प्रतिकार से दो परमाणु संपन्न मुल्कों के बीच शत्रुता नहीं बढ़ेगी, जो नियंत्रण से बाहर जा सकती है? दूसरी तरफ, ऐसे उत्तेजक माहौल के बाद क्या सरकार पाकिस्तान के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं कर पाना बर्दाश्त कर सकती है? और इसकी जवाबदेही प्रधानमंत्री पर ही आएगी। यह मोदी के लिए मुश्किल फैसला हो सकता है।
इस समय पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ने का दावा एक मिथक है। कई अरब देशों द्वारा पाकिस्तान को समर्थन करने का सबसे मजबूत कारक इस्लाम है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने हाल ही में वहां अरबों डॉलर निवेश करने का वायदा किया है। जब भाई (पाकिस्तान) और प्रिय मित्र (भारत) के बीच चुनने का मौका आएगा, तो वे हमेशा पाकिस्तान को चुनेंगे! चीन मजबूती के साथ पाकिस्तान के पीछे खड़ा है।
ट्रंप द्वारा पाकिस्तान की कड़ी निंदा के बावजूद अमेरिका अपनी सीमाओं से वाकिफ है। पाकिस्तान की मदद के बिना न तो तालिबान के साथ उसकी सार्थक बातचीत हो सकती है और न ही वह आसानी से अफगानिस्तान से बाहर निकल सकता है। रूस के हित भी पूरी तरह से हमारे साथ नहीं हैं। बहरहाल, हमें लगातार अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपने आर्थिक और सामरिक संबंधों का लाभ उठाते रहना चाहिए, ताकि भारत में आतंकवाद का निर्यात न करने का पाकिस्तान पर दबाव पड़े। पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल अपनी राज्य नीति के अभिन्न हिस्से के रूप में करता है। लेकिन यह दावा करना, कि घाटी में आतंकवाद का कोई आंतरिक आयाम नहीं है, झूठ है।
वक्त आ गया है कि हम आत्मनिरीक्षण करें। तीन दशकों से ज्यादा समय से घाटी में सेना तैनात है, ज्यादातर समय वहां अफ्स्पा लागू रहा। राज्य पुलिस अक्सर तलाशी अभियान चलाती है। पत्थरबाजों को खदेड़ने के लिए जिंदा पैलेट दागे जाते हैं। इन उपायों और कई आर्थिक पहल की घोषणाओं के बावजूद घाटी के कितने युवा केंद्र सरकार के साथ हैं? सच यह है कि कश्मीर घाटी के युवा व्यापक रूप से अलग-थलग पड़ गए हैं। जब तक हम इसे ईमानदारी और लगन से रोकने की कोशिश नहीं करते, तब तक हम इनका दिल नहीं जीत सकते। लीक से हटकर कुछ अलग कदम उठाने से इस बिगड़ती स्थिति को रोका जा सकता है-
एक, कश्मीरी नेताओं की पुरानी पीढ़ी अपनी साख खो चुकी है। नई पीढ़ी केंद्र पर भरोसा नहीं करती। हमें अंतरराष्ट्रीय ख्याति के एक गैर-राजनीतिक, गैर-नौकरशाह व्यक्ति की आवश्यकता है, जो न तो बंटवारे की बात करता हो और न ही वह राज्य के गलत शासन से जुड़ा हो, लेकिन जिसे युवा सुन सकते हों और भरोसा कर सकते हों। वैसे एकमात्र व्यक्ति हैं दलाई लामा, जिनके पास नैतिक अधिकार है, बेदाग कद है और जिनके दिल में अपार करुणा है। लेकिन क्या वह इसके लिए सहमत होंगे?
दो, जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेदी शासन के पतन के बाद शांति और सुलह आयोग की स्थापना की गई थी, उसी तरह के आयोग की यहां स्थापना करनी चाहिए, जो जम्मू-कश्मीर के सभी पीड़ित नागरिकों को शिकायत दर्ज कराने के लिए आमंत्रित करे। इससे कड़वाहट कम हो सकती है और सुलह की एक छोटी-सी खिड़की खुल सकती है।
तीन, वैसे लोगों की पहचान करनी चाहिए, जिन्होंने बिना सख्त रुख अपनाए विरोध करने वाले युवाओं को गिरफ्तारी की धमकी के बिना खुली बहस के लिए आगे आने के लिए कहा और उन्हें मजबूत तर्कों से निहत्था कर दिया कि न तो कश्मीर स्वतंत्र होगा और न ही पाकिस्तान को गले लगाना एक व्यावहारिक विकल्प है। कश्मीर का बंटवारा तो कभी होगा नहीं और दूसरा विकल्प उन्हें मुहाजिर बना देगा, जिसके कारण पाकिस्तान में उन्हें दोयम दर्जे की नागरिकता मिलेगी। ऐसा करने पर सच को स्वीकार करने के लिए बड़ी संख्या में युवाओं के आने की संभावना है, जो भारत में बने रहने को सबसे अच्छा विकल्प मानेंगे।
चार, शाह फैसल जैसे स्वच्छ छवि के कश्मीरी युवा, जिन्होंने कुछ साल पहले सिविल सर्विस परीक्षा में टॉप किया था और बाद में इस्तीफा दे दिया, को जम्मू-कश्मीर के ब्रांड एंबेसेडर के रूप में चुना जाना चाहिए। घाटी के युवाओं का दमन और वहां की जनसांख्यिकी में बदलाव से स्थितियां और बिगड़ेंगी।
पांच, कश्मीरी युवाओं का कट्टरपंथी होना एक सच्चाई है। लेकिन उन्हें इससे रोकने के लिए हमने क्या किया है? हम जेहादी रंगरूटों को उनके अपने ही खेल में क्यों नहीं हरा सकते? क्या हमारे पास जेहादियों का मुकाबला करने के लिए उससे ज्यादा मजबूत उपाय है? अगर हमारे पास ऐसा उपाय है, तो यह अजूबा है!