सरहद को कैसे रखें शांत

हर्ष कक्कड़ Updated Wed, 07 Feb 2018 07:45 PM IST
भारतीय सेना
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भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर हमेशा हलचल रहती है। पाकिस्तान की ओर से वर्षों से घुसपैठ को बढ़ावा देने के लिए एलओसी पर गोलीबारी होती रही है। वह कश्मीर सीमा में हरकत करते रहना चाहता है, ताकि दुनिया को बता सके कि यह विवादित क्षेत्र है। भारत हमेशा से नियंत्रण रेखा पर शांति चाहता है, क्योंकि वहां आम नागरिक रहते हैं और उनके खेत सीमा से लगे हैं। दोनों मुल्कों द्वारा एलओसी पर संघर्ष विराम बरकरार रहने पर भारत के लिए घुसपैठ पर निगरानी और आतंकवादियों पर निशाना साधने में आसानी होती है।
पिछले दो महीनों में संघर्ष विराम उल्लंघन में भारी वृद्धि हुई है। पिछले वर्षों के आंकड़े देखें, तो 2015 में 387, 2016 में 271, 2017 में 860 और इस वर्ष जनवरी के तीसरे हफ्ते तक संघर्ष विराम उल्लंघन के 134 मामले सामने आए हैं। 2017 में सर्वाधिक(147) संघर्ष विराम उल्लंघन के मामले दिसंबर में देखे गए। पिछले कुछ महीनों के रुझान को देखते हुए इसमें केवल वृद्धि ही होगी। इस वर्ष हमारी ओर नागरिकों और सुरक्षा बलों, दोनों की मौत के आंकड़े करीब दोगुने हो गए और इसमें बढ़ोतरी की ही आशंका है।

दोनों देश एक-दूसरे पर बढ़ते संघर्ष विराम उल्लंघन का आरोप लगाते हैं। पाकिस्तान के लोगों के ज्यादा हताहत होने के भारतीय दावे सत्य हैं, क्योंकि भारत पूरी तैयारी के साथ पलटवार करता है। पहले सीमा पर तैनात पाकिस्तानी सेना और रेंजरों को गोलीबारी की पूरी स्वतंत्रता थी, जबकि भारत सरकार हालात के बेहतर होने की उम्मीद में सुरक्षा बलों को रोकती थी, ताकि कम जनहानि हो और वार्ता फिर से शुरू हो सके। लेकिन अब भारतीय सैनिकों पर से यह प्रतिबंध हटा लिया गया है, इसलिए फायरिंग निरंतर जारी है।

पाकिस्तान में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता के साथ मुल्क पर लगभग पूरी तरह से सेना का नियंत्रण है। कश्मीर में सक्रिय आतंकी गिरोहों को उसका समर्थन बढ़ा है। इन समूहों के नेता आसानी से आतंकियों को खरीद सकते हैं, जिन्हें वे प्रशिक्षण एवं असलहा देते हैं। कश्मीर में उनके घुसपैठ के लिए पाकिस्तानी सेना जिम्मेदार है। भारतीय सेना घुसपैठ करने वाले आतंकियों को खत्म करने में सक्षम है। इसलिए उनकी घुसपैठ में मदद करने के लिए संघर्ष विराम उल्लंघन में बढ़ोतरी की जाती है।

कई टिप्पणीकारों का कहना है कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई से पाकिस्तान में जनहानि तो हुई है और उसकी चौकियां नष्ट हुई हैं, लेकिन उसका बहुत सीमित प्रभाव पड़ा है। भारत को अपने सैन्य विकल्पों पर फिर से विचार करना चाहिए। मुझे लगता है कि इस तरह का सुझाव वास्तविक है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना कभी अपनी जनहानि को स्वीकार नहीं करेगी और न ही वहां की सरकार और मीडिया में इतना साहस है कि वह सेना के दावे को चुनौती दे सके।

लगता नहीं कि पाकिस्तान भाड़े के आतंकियों को रोकेगा, क्योंकि यह उसकी रणनीति के खिलाफ है। पाकिस्तान की राजनीतिक अक्षमता का मतलब यह है कि आगामी चुनाव में कोई भी दल बड़े मुद्दे के रूप भारत से वार्ता की मांग नहीं करेगा। इसलिए निकट भविष्य में भी यथास्थिति रहेगी। सिर्फ इसलिए कि एलओसी पर गोलाबारी जारी है, खुलेआम युद्ध की घोषणा करना आसान जवाब नहीं हो सकता। दुनिया की इस पर नजर है, उन्हें चिंता है कि कहीं परमाणु विवाद न बढ़ जाए। भारत का मजबूत और प्रभावी सैन्य प्रतिरोध यह सुनिश्चित करता है कि पाकिस्तान मुंबई या संसद पर हुए हमले जैसी एक और हरकत करने की कोशिश नहीं करेगा, पर उसकी गतिविधियां जम्मू-कश्मीर तक सीमित रहेंगी।

यदि स्थानीय सैन्य कार्रवाई ने केवल उसे सावधान किया है, पाक को संघर्ष विराम उल्लंघन रोकने के लिए मजबूर नहीं किया है, तो अगला उपाय यही है कि पाकिस्तान पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ाया जाए। लेकिन ये दोनों उपाय केवल तभी प्रभावी होंगे, जब इसे मजबूत सैन्य समर्थन मिलेगा। हमारी अपनी सैन्य क्षमता विकसित करने से भी उस पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा, पाकिस्तान को भी हथियार खरीदने के लिए मजबूर करना होगा। हालांकि चीन उसे हथियार उपलब्ध कराएगा, लेकिन उसकी उसे कीमत चुकानी होगी। भारत की बराबरी करने के लिए पाकिस्तान अपनी क्षमता से अधिक हथियारों पर खर्च करेगा, जिससे उसकी नाजुक अर्थव्यवस्था और कमजोर होगी और वह गंभीर अराजकता की तरफ बढ़ेगा। कूटनीतिक रूप से उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। हालांकि चीन उसे अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी से बचा रहा है, लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, अगर सभी देश स्वतंत्र रूप से उसकी उपेक्षा शुरू कर देंगे।

भारत की कूटनीतिक पहल का परिणाम मिलना शुरू हो गया है, क्योंकि कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को आतंकी समूहों का समर्थक देश बताया जाने लगा है। जिन आतंकी गुटों का पाकिस्तान समर्थन करता है, उनके नेताओं को भी अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया जाने लगा है। उसकी आतंकवादी समर्थक नीतियों की वजह से संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को लेकर उसके दावे की अनदेखी की जाती रही है। उसने भारत पर पाकिस्तान विरोधी आतंकी समूहों को समर्थन देने का आरोप लगाया, लेकिन उसे भी किसी ने गंभीरता से नहीं लिया।

एक शैतान राष्ट्र को, जिसने आतंकवाद को अपनी राज्य-नीति का औजार बना लिया, सबक जरूर सिखाया जाना चाहिए। उसे इस पूरे क्षेत्र को अस्थिर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। युद्ध एक साधन के रूप में हमेशा रहना चाहिए, लेकिन उसे तभी अपनाना चाहिए, जब कूटनीतिक और आर्थिक उपाय विफल हो जाएं। पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए युद्ध की बयानबाजी और अपनी सैन्य क्षमता विस्तार जारी रहना चाहिए, साथ ही नियंत्रण रेखा पर भी जवाबी कार्रवाई तेज होनी चाहिए, पाक की कार्रवाई पर रोक के लिए वैकल्पिक उपायों पर जोर देना चाहिए। युद्ध को अंतिम उपाय का साधन रखना चाहिए। 

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