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सरकारें कितनी गरीब हितैषी

Thu, 08 Dec 2016 07:32 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 08 Dec 2016 07:32 PM IST
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How poor friendly Governments
सुभाषिनी सहगल अली

इस सप्ताह की शुरुआत में तमिलनाडु की जनप्रिय मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता का निधन हो गया। तामिलनाडु की जनता शोकग्रस्त है। जयललिता की लोकप्रियता का बड़ा कारण यह था कि वह अपनी सरकार के माध्यम से गरीबों को सहूलियतें प्रदान करती थीं। वहां गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों के पास राशन कार्ड हैं, जिनके जरिये उन्हें हर महीने 25 किलो चावल के अलावा, मसाले, दाल और खाने के अन्य सामान मुफ्त मिलते हैं। तमाम सरकारी अस्पताल मुफ्त में लोगों का इलाज करते हैं। सस्ती दरों में आम लोगों को खाने-पीने की चीज उपलब्ध कराने के लिए अम्मा कैंटीन भी खोले गए हैं। वहां चुनाव के समय मतदाताओं को बहुत सारे ‘तोहफे’ दिए जाते रहे हैं। ये द्रमक की ओर से भी दिए जाते हैं। ये तोहफे भी गरीब और साधारण लोगों के काम आने वाली चीजें होती हैं, जैसे टीवी, इडली-डोसा बनाने में इस्तेमाल की जाने वाले पिसाई मशीन, साइकिल, लैपटॉप आदि। कुछ लोग इस तरह की नीतियों का विरोध करते हुए कहते हैं कि यह जनता को ‘घूस’ देने के सामान है। यह सरकारी पैसे का दुरुपयोग है। इन लोगों को धनाढ्य लोगों और कंपनियों को सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाएं और कर में छूट उचित लगती हैं!

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जयललिता के निधन की खबर पर कुछ लोगों को इतना धक्का लगा कि उनकी मौत हो गई। राज्य सरकार ने उनके परिवारों को तीन लाख रुपये की सहायता प्रदान की है। कोई यह दावा नहीं कर रहा कि सरकार उन मौतों के लिए जिम्मेदार है। पर यह बात पसंद की गई कि मृतकों के परिवारों की मुसीबत की घड़ी में सरकार ने उनकी मदद की है।
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जो लोग गरीबों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं और वित्तीय मदद का विरोध करते हैं, उन्हें आज बहुत संतुष्ट होना चाहिए। मोदी सरकार ने कुर्सी संभालने के बाद से शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला कल्याण, अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण आदि के बजट में भारी कटौतियां की हैं। दूसरी ओर, उसने बड़ी कंपनियों को न सिर्फ सहूलियतें प्रदान की हैं, बल्कि उनके पुराने कर्जों की अनदेखी करते हुए उन्हें नए कर्ज भी दिए हैं।
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एक महीना पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी कर गरीबों और आम लोगों की जेब ही खाली कर दी। लोगों को अपना ही पैसा बैंक से निकालने के लिए दिन-रात लंबी कतारों में खड़े होने को मजबूर कर दिया। बैंकों में रुपयों का पर्याप्त इंतजाम न होने के कारण करोड़ों लोग लाचार हैं। बिना पैसे के छोटे-बड़े अनेक कारोबार और उद्योग बंदी के कगार पर हैं। बाजारों में सन्नाटा है और लाखों मजदूर बेरोजगार हैं। उनकी दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है? यह किसानों की बुआई का समय है। अगर उनके पास बीज, सिंचाई, खाद और मजदूरी के लिए पैसा नहीं, तो उनकी अगली फसल की बर्बादी का जिम्मेदार कौन होगा? अपना ही पैसा निकालने के लिए कतारों में खड़े अस्सी से अधिक लोग मर चुके हैं। दवा के अभाव में बच्चे और बूढ़े भी मरे हैं।


नोटबंदी के कारण हुई मौतों और तमाम लोगों के जीवन और भविष्य की बर्बादी के लिए सरकार सीधे तौर पर जिम्मेदार है। लेकिन यह कितना निंदनीय है कि इस जिम्मेदारी को स्वीकारना तो दूर, वह इन लोगों के लिए हमदर्दी के दो शब्द भी बोलने के लिए तैयार नहीं है। आखिर सरकार होती किस काम के लिए है? अगर जनता को राहत पहुंचाना उसका काम नहीं, अगर उसकी भूख मिटाना उसका काम नहीं, अगर लोगों को मार डालने के बाद दो आंसू बहाना उसका काम नहीं, तो फिर सरकार किस काम की?

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