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इस आंदोलन से कितनी उम्मीद

Mon, 07 Jan 2013 11:17 AM IST
Updated Mon, 07 Jan 2013 11:17 AM IST
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how much expectation to this movement

राष्ट्रीय राजधानी में हुए गैंगरेप की घटना पर उभरे जनाक्रोश की अधपकी व्याख्याएं हुई हैं। जो इस जनाक्रोश के पक्ष में खड़े हैं, वे कह रहे हैं कि इस जनाक्रोश के जरिये एक नए किस्म के नागरिक का उदय हुआ है-एक ऐसा नागरिक, जो आंदोलनधर्मी, जागरूक, संकल्पवान और आक्रोश से भरा हुआ है, और वह राजनीतिक सत्ता से जवाब मांग रहा है। इस नागरिक से सपनों के नए भारत के निर्माण की उम्मीद लगाई जा रही है।

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लेकिन रुमानियत से भरी इस तस्वीर की तरफ उंगली उठाकर आलोचक कहते हैं कि प्रतिरोध में उठ खड़े हुए इन लोगों में ज्यादातर शहराती यानी मध्यवर्गीय खाते-पीते घरों के हैं। आलोचक यह भी याद दिलाने से नहीं चूकते कि उमड़ा जनाक्रोश स्वतःस्फूर्त सही, पर लोग टिके रहे, तो इसमें मीडिया, खासकर टेलीविजन के लाइव कवरेज की भी मेहरबानी थी। इन आलोचनाओं में कुछ तो सच्चाई है, लेकिन ऐसी आलोचनाएं मूल बात से मुंह फेर लेती हैं।
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मूल बात यह है कि शहरी इलाकों में पहले भ्रष्टाचार और अब महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ उमड़ने वाला जनाक्रोश एक नए किस्म की राजनीति की शुरुआत है। यह राजनीति हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक खाई को पाट रही है। जिन शिकायतों के लिए व्यवस्था के भीतर कोई सुनवाई नहीं है, यह राजनीति उन शिकायतों को मुहावरा दे रही है। जो आंदोलनधर्मी नागरिक हम देख रहे हैं, बेशक वह अपने परिवेश से शहराती है, लेकिन उसका सामाजिक नजरिया शहराती संकीर्णता के दायरे में कैद नहीं। यह नई राजनीति देश के लोकतांत्रिक जीवन में एक नई किस्म की हलचल पैदा कर रही है।
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शहरी-गंवई, धनी-निर्धन या फिर शिक्षित-अशक्षित जैसे बने-बनाए चौखटों से बाहर जाकर हमें इस ‘आंदोलनधर्मी नागरिक’ को समझना होगा। जनाक्रोश के इस उभार में जो लोग शामिल हुए, वे अपने स्वार्थ के दायरे से बाहर जाकर सोच रहे थे। बेशक इन लोगों में त्याग की भावना नहीं है। नया ‘आंदोलनधर्मी नागरिक’ आत्म के विस्तार की राजनीति करने उतरा है और यह विस्तार कहां तक जाएगा, यह अभी अनिश्चत है।

यह नई राजनीति बीसवीं सदी की विचारधाराओं के गढ़े-गढ़ाए जुमले नहीं बोलती। इस जनाक्रोश की तख्ती पर भले लिखा हो- ‘हमें इंसाफ चाहिए’, लेकिन यह इंसाफ न तो पश्चिमी उदारवादी परंपरा का है, न ही समाजवादी या नारीवादी ढर्रे का। इसलिए इस जनाक्रोश को जांचना हो, तो विचारधाराओं की पारंपरिक शब्दावली मददगार साबित नहीं होने वाली। और इस जनाक्रोश का स्वर सिर्फ नकार का भी नहीं है। भ्रष्टाचार या फिर महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ उठ खड़ा होने वाला जनाक्रोश एक विकल्प की मांग कर रहा था, भले ही यह मांग बलात्कारियों को फांसी दो जैसी अतिरेकी भाषा में हुई हो।

इस राजनीति की मांग है कि हम व्यक्ति बनाम समूह के चौखटे से बाहर जाकर सोचें। महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ जुटी भीड़ पर किसी जाति या समुदाय का ठप्पा नहीं लगा था। विरोध-प्रदर्शन में जुटने वाले लोग किसी स्थापित राजनीतिक संगठन या पार्टी के सदस्य नहीं थे। बेशक, विरोध-प्रदर्शन में जुटने वाले लोगों की इच्छा थी कि उनके आस-पास राजनेता क्या उनकी छाया तक न दिखाई दे। लेकिन लोगों की इस चाह के भीतर यह तलाश छिपी हुई थी कि बने-बनाए राजनीतिक संगठनों से काम नहीं चलने वाला, राजनीति के मोर्चे पर कुछ नया होना चाहिए। इस नई राजनीति की आत्मा नई काया को तलाश रही है और मौजूदा दलीय राजनीति में आमूल-चूल बदलाव खोज रही है।

बेशक इस नएपन के साथ कुछ आशंकाएं भी जुड़ी हैं। मुंह बाये खड़े टीवी के इशारे पर आक्रोश प्रदर्शन और हाथो-हाथ इंसाफ चाहने वाली भीड़ कोई शुभ लक्षण नहीं। ऐसे विरोध-प्रदर्शनों को अधिनायकवादी प्रवृति के कुछ नेता मुट्ठी में कर सकते हैं। साथ ही ये प्रदर्शन सरकार को लोक-लुभावन, सस्ते और फिजूल कदम उठाने को बाध्य कर सकते हैं। यह डर तो है ही कि आंदोलन की यह हवा अपने आप गायब हो जाएगी और आगे जनांदोलनों की जमीन तोड़ने का काम और कठिन हो जाएगा।

अधपकी और अधबुनी यह नई राजनीति फिलहाल व्यवस्था की अलस तंद्रा तोड़ने के लिए उसे झकझोरने का काम कर रही है। सत्ता के सुचिक्कन और जमे-जमाए समीकरणों में इसने खलल पैदा की है, चाहे जिम्मेदारी का संस्कार न बना हो। अन्ना हजारे के अनशन ने थोड़े समय के लिए ही सही, सरकार और राजनीतिक दलों को जिस तरह घुटने मोड़ने पर मजबूर किया, वैसा हाल का कोई बड़ा जनांदोलन भी नहीं कर पाया था। अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने घोटालों का पर्दाफाश किया और इस पर्दाफाश ने सत्ता-वर्ग को जितना बेचैन किया, उतना हाल की किसी संसदीय बहस ने नहीं। ठीक इसी तरह महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ हाल के जनाक्रोश ने पुलिस और उसके राजनीतिक आकाओं को जिस किस्म से जवाब देने के लिए मजबूर किया, वैसा दशकों तक चले महिला-अधिकारों या फिर मानवाधिकारों से जुड़े आंदोलन नहीं कर सके थे।


ऐसे विरोध-प्रदर्शनों के देर तक ठहरने की क्षमता और दिशा के बारे में अभी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि कितनी तेजी और समझदारी से यह नई ऊर्जा हमारे लोकतंत्र के भीतर दलगत राजनीति के दलदल की सफाई कर पाती है। पर एक बात साफ है- भारत की लोकतांत्रिक राजनीति के सामने विकल्पों की तलाश में लगे जनाक्रोश का अश्वमेधी घोड़ा खड़ा है, और सत्तावर्ग अब मनमर्जी की चाबुक फटकार कर उसे अपने रथ में नहीं हांक सकता। सवाल यह है कि यह घोड़ा स्थापित राजनीति के स्थापित विकल्पों की राह लग जाएगा या कि एक वैकल्पिक राजनीति की डगर बनाएगा।

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