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वैसी हिम्मत और वैसा जज्बा कितनों के पास है

Thu, 21 Aug 2014 07:54 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 21 Aug 2014 07:54 PM IST
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How many have the same courage and spirit

उसका नाम साक्षी है। नाम बदला नहीं गया, क्योंकि उसका मानना है कि मुजरिम वह नहीं, उसका उत्पीड़न करने वाला है। साक्षी के साथ जो हुआ, वह तो बहुतों के साथ होता है, पर उसने जो किया, वह कम लोग ही कर पाते हैं। साक्षी 1995 में पैदा हुई थी। बहुत कम उम्र में उसने पायलट का प्रशिक्षण शुरू किया था और 26 जनवरी, 2010 को, जव वह सिर्फ 15 साल की थी, उसे कानपुर के पुलिस लाइन में करतब दिखाने का मौका मिला। दर्शकों में उत्तर प्रदेश के सीओ स्तर के अधिकारी अमरजीत शाही भी मौजूद थे। उन्होंने लड़की को ढेरों बधाई दी। वह उनके घर भी गया और फिर अक्सर जाने लगा, क्योंकि उसकी तैनाती उन्हीं के क्षेत्र में हो गई।

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परिवार के सदस्य के रूप में जब उसकी मान्यता हो गई, तो उसने मौके का पूरा फायदा उठाया। एक दिन वह आया और उसने साक्षी की चाय में नशीली दवा मिलाने के बाद उसकी बेहोशी का नाजायज फायदा उठाया। उसने उसकी वीडियो भी बनाई और फिर उसे इस बात की धमकी दी कि अगर वह किसी से शिकायत करेगी, तो वह उसकी तस्वीर सार्वजनिक कर देगा। पुलिस की वर्दी तो बहुतों के लिए डरावनी होती है। 15 साल की बच्ची पर उसका क्या असर पड़ा होगा, इसकी कल्पना भी मुश्किल है।
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जुलाई, 2011 में शाही का तबादला प्रतापगढ़ कर दिया गया और पांच महीने बाद वह साक्षी को अपने साथ वहां ले गया। दूसरे ही दिन उसके पिताजी वहां पहुंचे और काफी मुश्किल से, उसे वहां से ले आए। उसके तुरंत बाद शाही फिर उनके घर पहुंचा और साक्षी को अपने साथ ले जाने की जिद करने लगा। मां-बाप ने विरोध किया और आखिरकार 10 फरवरी को उन्होंने आई जी के पास लिखित शिकायत कर दी। मामले की जांच के आदेश तो दिए गए, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
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13 मार्च को शाही जबर्दस्ती साक्षी को घर से लेकर चला गया, लेकिन रास्ते में ही उस लड़की ने कीड़े मारने की दवा खा ली और हड़बड़ाकर शाही ने उसे कानपुर के एक अस्पताल में भर्ती कर दिया। यही नहीं, उसने साक्षी के पिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी। 18 अप्रैल को शाही की गिरफ्तारी तब हुई, जब अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति के सदस्यों ने पुलिस के उच्च अधिकारियों पर दबाव बनाया। मई में शाही के खिलाफ बलात्कार और एससी/एसटी कानून के उल्लंघन की चार्जशीट दर्ज की गई। बड़ी ही विकट परिस्थितियों में मुकदमा चला। अथक प्रयासों के बाद आखिरकार विगत 14 अगस्त को शाही को अपहरण, बलात्कार और आतंकित करने के जुर्म में दोषी पाया गया और तीन दिन के बाद उसे 10 साल की सख्त कारावास और 65,000 रुपये के दंड भरने की सजा सुनाई गई।


मुकदमे की सुनवाई के दौरान साक्षी को फंसाने के लिए शाही के वकीलों ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, लेकिन वे उस लड़की की हिम्मत नहीं तोड़ पाए। अगर समिति की तरफ से लगातार प्रयास न किया गया होता, तो फैसला वर्षों बाद होता। न्याय की लड़ाई कितनी कठिन होती है! संगठन का समर्थन, अच्छे वकीलों की पैरवी, मां-बाप का पूरा सहयोग और साक्षी जैसी हिम्मत कितनी उत्पीड़न की शिकार लड़कियां और महिलाएं जुटा सकती हैं?

(लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं)

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