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कब तक बर्दाश्त करते रहेंगे हम सीमा पर हमले

Sat, 18 Oct 2014 12:02 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sat, 18 Oct 2014 12:02 AM IST
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How long will we continue to tolerate attacks on border

पहले स्पष्ट शब्दों में कहना चाहती हूं मैं कि जिन परिवारों को सीमा पर गोलाबारी का सामना करना पड़ रहा है आजकल, उनके डरे हुए चेहरे टीवी पर देखकर दिल दुखता है। इसके बावजूद यह कहूंगी मैं कि जो जवाबी कार्रवाई हमारी तरफ से हो रही है, वह सही है। बहुत पहले अगर हमारी सरकार ने साफ कर दिया होता कि हम पाकिस्तान की तरफ से किसी भी हमले का दोगुना जवाब देंगे, तो शायद ये हरकतें बंद हो गई होतीं। उस समय भी कायरों की तरह हम पेश आए, जब 26/11 वाला हमला हुआ। मनमोहन सरकार ने तब सिर्फ इतनी कार्रवाई की कि कुछ महीनों के लिए बातचीत बंद कर दी थी।

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अब प्रधानमंत्री बदल गया है इस देश का। इसके साथ गृह मंत्री के शब्दों में जमाना भी बदल गया है। उनके इस बयान की मणिशंकर अय्यर ने इन शब्दों में आलोचना की, 'ऐसे बयान अगर वरिष्ठ मंत्री देना शुरू कर देंगे, तो नियंत्रण रेखा पर हिंसा और होगी। हमारी महिलाएं और बच्चे मरते रहेंगे और उनके भी।' इस बयान का विश्लेषण किया जाए, तो संदेश निकलता है कि भारत को पाकिस्तान की हिंसक गतिविधियों से बचने के लिए फिर बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए।
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क्या इतना निर्बल है भारत? इस सवाल का जवाब मुझे देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि बिलावल भुट्टो ने ही पिछले सप्ताह यह कहा कि भारत का रवैया पाकिस्तान के साथ वही है अब, जो इस्राइल का होता है फलस्तीन के साथ। मैं यह नहीं कह रही कि भारत को भी हजारों बेगुनाहों को उसी तरह मारना चाहिए, पर पाकिस्तान से 'बस बहुत हो गया है' कहने का समय आ गया है।
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कब तक बर्दाश्त करते रहेंगे हम हर किस्म के हमले? मेरी नजर में आईसी-814 के अगवा होने के बाद हमारी सरकार ने मौलाना अजहर मसूद और उमर शेख जैसों को रिहा कर गलती की थी। उससे भी बड़ी गलती की बाद में कोई कार्रवाई न करके। इतना करते कि रिहा करने के बाद उन्हें ढ़ूंढ-ढ़ूंढकर मौत के घाट उतारने का काम खुफिया एजेंसियों को सौंपते। यह बात जब मैं विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से करती हूं, तो उनका जवाब होता है कि हमारी एजेंसियों के पास ऐसी क्षमता नहीं है। इंद्रकुमार गुजराल जब प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने हमारी गुप्त संस्थाओं को निर्बल कर दिया था शरीफ से दोस्ती निभाते हुए।


हमारे प्रधानमंत्रियों ने हमेशा ऐसा ही किया है इस उम्मीद में कि हम यदि दोस्ती करेंगे, तो पाकिस्तान भी दोस्ती निभाएगा। ऐसा नहीं होने वाला, क्योंकि पाक विदेश नीति पर नियंत्रण है वहां के जनरलों का, जिनके एजेंडे में भारत से दोस्ती की कोई जगह नहीं है। अमेरिकी सुरक्षा विशेषज्ञ क्रिस्टीन फेयर ने हाल में पाकिस्तानी सेना पर किताब लिखी है, फाइटिंग टू द ऐंड ः द पाकिस्तान आर्मीज वे ऑफ वार। वह लिखती हैं कि अगर भविष्य में भारत कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले करने को तैयार हो जाए, तब भी भारत के साथ दोस्ती नहीं होगी। सो अगर हम पाकिस्तान को काबू में रखना चाहते हैं, तो हमें करनी होगी उनकी हर हरकत पर जवाबी कार्रवाई। बातचीत शुरू करने से पहले हमें स्पष्ट कहना चाहिए कि भारत की सीमाएं फिर से नहीं बदली जाएंगी।

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