फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   How long will the world tolrate Pakistan

कब तक बर्दाश्त करेगी दुनिया

Tue, 27 Sep 2016 08:09 PM IST
शंकर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार
शंकर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार Updated Tue, 27 Sep 2016 08:09 PM IST
विज्ञापन
How long will the world tolrate Pakistan
शंकर अय्यर

हो सकता है कि उन्हें पता रहा हो, या शायद वह नहीं भी जानती हों। लेकिन निश्चित रूप से यह सुखद हैरानी की बात थी। सोमवार को सुषमा स्वराज ने दो टूक शब्दों में पाकिस्तान के शासकों को कहा,'जिनके घर शीशे के हों, वे दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।' यह हिंदी फिल्म वक्त की एक लोकप्रिय पंक्ति है। इसके कई निहितार्थ हैं। इसका जो प्रतीकात्मक अर्थ है, वह यह कि पाकिस्तान को उपदेश देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। इसमें वह बात भी छिपी थी, जो अनकही छोड़ दी गई थी। गौरतलब है कि यह पंक्ति फिल्म में कश्मीरी मूल के अभिनेता और बलूचिस्तान में पैदा हुए राजकुमार ने चिनाय सेठ की भूमिका निभाने वाले और पाकिस्तान में जन्मे पश्तो रहमान खान से कही थी। फिल्म के निर्देशक लाहौर में जन्मे पंजाबी यश चोपड़ा थे। पाकिस्तान से रिश्ते का यह सिलसिला इस फिल्म के दूसरे कलाकारों तक भी जाता है, जैसे बलराज साहनी रावलपिंडी में जन्मे थे, सुनील दत्त झेलम में, आशा सचदेव पेशावर में और साधना कराची में जन्मी थीं।

विज्ञापन


वे कहते हैं कि पाकिस्तान एक पीड़ित है। तथ्य यह है कि पाकिस्तान उस नीति का पीड़ित है, जिसके तहत पाकिस्तान आतंकवाद को प्रायोजित करता है। शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तानियों को संबोधित किया। सोमवार को सुषमा स्वराज ने उस भाषा में अपना संदेश दिया, जिसे नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ के लोग अच्छी तरह से समझते हैं।
विज्ञापन


ये शब्द तसल्ली देते हैं, हालांकि येे पर्याप्त नहीं होंगे। इतिहास और भूगोल को लेकर युद्ध हुए हैं। विंस्टन चर्चिल ने एक बार कहा था, इतिहास का अध्ययन करें, क्योंकि शासन की कारीगरी के झूठ के सभी रहस्य इतिहास में छिपे होते हैं। इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध से हफ्ते भर पहले एक टीवी इंटरव्यू में एक भविष्यवाणी की थी। उन्होंने कहा था, 'मुझे लगता है और व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि अधिकांश दुनिया भी यह मानती है, लेकिन खुले तौर पर नहीं कह सकती कि पाकिस्तान अभी जिस रूप में है, उस रूप में उसका अस्तित्व फिर कभी नहीं रह सकता।'
विज्ञापन
विज्ञापन


इतिहास गवाह है कि तबसे पाकिस्तान विफल रहा है-एक दुष्ट राष्ट्र, जिसने लोगों और राष्ट्र को अलग कर दिया है। पाकिस्तान पिछले चार दशकों से विफल है-तबसे, जब भुट्टो ने भारत के साथ हजार वर्षों तक लड़ने का नारा दिया था। पाकिस्तान ने लगातार राष्ट्रीय नीति के एक हथियार के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल किया है, वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य होने के साथ ही वैश्विक नैतिकता के पहरूओं का सहयोगी भी है, जिससे भू-राजनीति के पाखंड का पता चलता है।

पाकिस्तान आतंकवाद प्रायोजित करता है और आतंकियों की सुरक्षित पनाहगाह है, यह बात बार-बार साबित हो चुकी है, एबटाबाद इसका एक उदाहरण है। जगजाहिर है कि भारत के बार-बार डोजियर दिए जाने का क्या हश्र हुआ। पाकिस्तान ने कभी भारत के साथ बेहतर रवैया नहीं दिखाया।

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में टेड पो नामक सांसद ने पाकिस्तान स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म डेजिग्नेशन ऐक्ट प्रस्तुत किया है, जिसको लेकर उत्साह है। उन्होंने कहा कि हमारे पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि पाकिस्तान किसके पक्ष में है और वह पक्ष अमेरिका नहीं है।

तथ्य यह है कि इससे पहले 1995 में भी पाकिस्तान को आतंकवाद प्रायोजित करने वाला देश घोषित करने के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया गया था। लेकिन न तो 1995 में कुछ हुआ और न ही 2016 में कुछ होने की उम्मीद है।

सच तो यह है कि अमेरिका और चीन के बीच दोस्ती की दलाली के कारण पाकिस्तान ने सुरक्षित शरण ढूंढ ली। 25 अक्तूबर, 1970 को रिचर्ड निक्सन ने पाकिस्तानी सैन्य शासक याह्या खान से वायदा किया था, 'हम अपना वायदा निभाएंगे, हम जो कर सकते हैं, उतनी मदद करेंगे।' और हथियार प्रतिबंध के बावजूद निक्सन ने तुर्की और ईरान के जरिये पाकिस्तान को हथियार उपलब्ध कराए। चार दशक बाद भी ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिकी प्रशासन दलाली की किस्त चुका रहा है। 9/11 के बाद से अमेरिका ने पाकिस्तान को 25 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता दी है। पाकिस्तान को विश्व बैंक, आईडीए जैसी बहुपक्षीय एजेंसियों से भी सहायता मिलती है और जापान, ब्रिटेन, जर्मनी के अलावा मध्य-पूर्व के देशों से भी। बेशक इन देशों को अपने हित पता हैं। मगर विश्व बैंक और अन्य बहुपक्षीय एजेसियां क्यों सहायता करती हैं? क्या ये पैसे विकास कार्यों के लिए दिए जाते हैं? मानवाधिकार का क्या हुआ? शिया मस्जिदों पर बम गिराए जाते हैं, अहमदियों को मारा जाता है, ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग होता है और गैर-न्यायिक दंड वहां आदर्श है। संयुक्त राष्ट्र और उसके आदेश का क्या हुआ? बेंजामिन नेतन्याहू ने हाल ही में चुटकी ली कि संयुक्त राष्ट्र एक नैतिक ताकत से नैतिक तमाशे में बदल गया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद समिति ने 9/11 के बाद से 38 प्रस्तावों को सूचीबद्ध किया है, पर उनमें पाकिस्तान पर ध्यान केंद्रित नहीं किया गया है। निश्चित रूप से सभी पाकिस्तानी आतंकवाद का समर्थन नहीं करते, पर ज्यादातर आतंकी पाकिस्तान के आतंकवादी स्कूलों से निकले प्रतीत होते हैं।


भारत एक बार फिर उस चौराहे पर खड़ा है, जहां उसे अपने सम्मान का बदला लेना चाहिए, वह अपने नैतिक कद को खोना बर्दाश्त नहीं कर सकता। इस पर विभिन्न तरह की सलाहें हैं, जिनमें पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने, सैन्य कार्रवाई करने, सिंधु नदी का पानी देने से इन्कार करने जैसे परामर्श शामिल हैं। अब यह देखना होगा कि सरकार किस तरह प्रतिक्रिया देती है। बेशक भारत को स्वतंत्र रूप से अपनी श्रेष्ठता सुनिश्चित करने के लिए जवाब तलाशना होगा। मगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक सवाल बचता है कि वे कब तक मूकदर्शक बने रहेंगे, जबकि पाकिस्तान घरेलू स्तर पर जनसंहार कर रहा है और दुनिया भर में आतंकवाद का निर्यात कर रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed