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कैसे करें न्याय?

ritika khedaरीतिका खेड़ा Updated Fri, 05 Apr 2019 08:04 PM IST
मनरेगा
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कांग्रेस द्वारा घोषित न्यूनतम आय योजना (न्याय) का दो वजहों से स्वागत किया जाना चाहिए। एक तो इसलिए कि इसके जरिये लोकसभा चुनाव से पहले महत्वपूर्ण मुद्दों पर लंबित चर्चा की पहल की गई है और दूसरा इसलिए कि यह घोषणा गरीबों पर ध्यान केंद्रित करती है।
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लेकिन इस घोषणा पर कई प्रश्न भी उठ रहे हैं और इसमें कई खामियां भी हैं। एक, जो नकद हस्तांतरण की घोषणा की गई है, उस पर जीडीपी का दो फीसदी खर्च होने की संभावना है। इसके लिए या तो सरकार को अधिक कर राजस्व जुटाना होगा या (और यह बहुत चिंता की बात है) मौजूदा सब्सिडी या सामाजिक समर्थन में कटौती करनी होगी। इसके संकेत पहले से ही मीडिया में आ रहे हैं। हालांकि अब तक की घोषणाओं में इस बात पर जोर दिया गया है कि सक्षम वर्ग के लोगों की सब्सिडी में कटौती होगी। इसके अलावा, सामाजिक समर्थन के अन्य रूपों के विलय की भी बात है। इससे यह खतरा पैदा होता है कि 'न्याय' एक हाथ से लेगा, तो दूसरे हाथ से (न्यूनतम आय) देगा भी।

कर की दृष्टि से, तुलनात्मक रूप से, आयकर आधार और कर दर के संदर्भ में, दोनों में सुधार की गुंजाइश है। भारत थोड़ा पिछड़ गया है। इसके अलावा, भारत में संपत्ति या विरासत कर नहीं है, जो राजस्व जुटाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। सामाजिक खर्च का व्यय भी, भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में निम्न रहा है।

इस योजना के समर्थकों और विरोध करने वालों ने एक समस्या पर जोर दिया है। समस्या यह है कि सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों का चयन कैसे किया जाएगा? 'बीपीएल' चयन के अनुभव को भारत में विफलता के रूप में स्वीकार किया गया है। इस कारण इस तरह के दृष्टिकोण से अधिक व्यापक उपाय अपनाए गए हैं ः मनरेगा आत्म-चयन पर निर्भर करता है, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) 'बहिष्करण दृष्टिकोण' (जो सक्षम हैं, उनके अलावा सभी) का उपयोग करती है और दो-तिहाई ग्रामीणों को लाभ प्रदान करती है। और मध्याह्न भोजन सब बच्चों को प्राप्त है।

एक तीसरी चिंता महंगाई और इस आशंका से संबंधित है कि हस्तांतरण का मूल्य समय के साथ मिट जाएगा। मिसाल के तौर पर, बुजुर्गों की पेंशन में केंद्र सरकार का योगदान 2006 के बाद से 200 रुपये प्रति व्यक्ति मासिक पर अटक गया है। इसे महंगाई से जोड़ा भी गया है, लेकिन सिर्फ नाम मात्र के लिए। झारखंड में मनरेगा मजदूरी में केवल एक रुपये प्रति दिन की वृद्धि हुई है! नकद हस्तांतरण कार्यक्रम केवल मुद्रास्फीति के साथ तालमेल बिठाने पर ही समझ में आता है।

इन सब चिंताओं और सवालों को मन में रखते हुए, एक विकल्प फिर भी मुमकिन है। यदि हम मनरेगा को उन लोगों के लिए सामाजिक समर्थन के रूप में देखें, जो काम करने में समर्थ हैं और 'न्याय' को उन लोगों पर केंद्रित करें, जो काम नहीं कर सकते, या जिन्हें काम नहीं करना चाहिए, तो बेहतर रहेगा। मेरा इशारा बूढ़ों, दिव्यांगों, विधवाओं, एकल महिलाओं और गर्भवती महिलाओं की ओर है।

ये सब लोग किसी-न-किसी हद तक काम करने में असमर्थ हैं। सबसे गरीब तबके के होने की वजह से इनका देश की संपत्ति पर पहला हक होना चाहिए। यह जनसंख्या का एक ऐसा हिस्सा है, जिसे चिह्नित करने में गलतियां होने की आशंका कम है। हो सकता है कि कुछ लोग अपनी उम्र गलत बता दें, लेकिन यदि कोई देख नहीं सकता, या कोई स्त्री गर्भ से है, तो इसके बारे में झूठ बोलना आसान नहीं। इस तरह से सबसे गरीब बीस फीसदी को परिवारों चिह्नित करने की समस्या का समाधान किया जा सकता है, यदि इन समूहों के सभी लोगों को न्यूनतम आय का हकदार बनाया जाए।

इस योजना को लागू करने में एक मददगार बात यह भी है कि केंद्र सरकार पहले से ही, बूढ़ों, दिव्यांगों और एकल महिलाओं (जिनमें विधवा भी शामिल हैं) के लिए पेंशन योजना चलाती है-राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी), लेकिन यह योजना यूनिवर्सल (सार्वभौमिक) नहीं है। इसका दायरा (कवरेज और पेंशन राशि) बढ़ाने की आवश्यकता है। पेंशन योजना के तहत वर्तमान में अपमानजनक ढंग से राशि प्रदान की जाती है-उनके लिए केंद्रीय योगदान 200 रुपये से 1,000 प्रति व्यक्ति प्रति माह के बीच है। एनएसएपी को सार्वभौमिक बनाने की आवश्यकता है, ताकि सभी बुजुर्ग, एकल महिलाएं और दिव्यांग व्यक्ति कवर किए जा सकें।

मातृत्व पात्रता एक और नकद हस्तांतरण कार्यक्रम है, जिसे राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता है। वर्ष 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) में असंगठित वर्ग की सभी महिलाओं के लिए 6,000 रुपये प्रति गर्भावस्था में दिए जाने का प्रावधान था।

चार साल बाद, 2017 में, जब पीएमएमवीवाई योजना को अंतिम रूप से तैयार किया गया, तो इसके वैधानिक प्रावधानों को कमजोर कर दिया गया था। समर्थन राशि को घटाकर 5,000 रुपये कर दिया गया था और इसे केवल पहली गर्भावस्था तक सीमित कर दिया गया था। कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में मातृत्व हक के तहत अधिक राशि (12,000-18,000 रुपये) दी जाती है। फिर भी, यह संगठित क्षेत्र की महिलाओं की तुलना में (जहां छह महीने का वेतन दिया जाता है) से काफी काम है।

पूर्वानुमान है कि 1,000 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह सार्वभौमिक पेंशन के रूप में दी जाए और मातृत्व पात्रता में एक साथ 6,000 रुपये प्रति बच्चा खर्च हो, तो इन पर जीडीपी का लगभग एक फीसदी खर्च होगा। यह खर्च उतना ही है, जितना अनुमान कांग्रेस के वक्ताओं ने न्याय योजना पर बताया है। बूढ़ों, एकल महिलाओं और दिव्यांग लोगों के लिए यूनिवर्सल पेंशन के रूप में इसके द्वारा वास्तव में न्याय होने की उम्मीद है।
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