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कैसे आए नदियों में साफ जल

Mon, 23 Mar 2015 08:29 PM IST
विनीत नारायण
विनीत नारायण Updated Mon, 23 Mar 2015 08:29 PM IST
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How came fresh water in river

पूरा ब्रज क्षेत्र यमुना की अविरल धारा की मांग लेकर आंदोलित है। सभी संप्रदाय, साधु-संत, किसान और आम नागरिक चाहते हैं कि ब्रज में बहने वाली यमुना देश की राजधानी दिल्ली का सीवर न ढोए, बल्कि उसमें यमुनोत्री से निकला शुद्ध जल प्रवाहित हो। क्योंकि यही जल देवालयों में अभिषेक के लिए प्रयोग किया जाता है। भक्तों की यमुना के प्रति गहरी आस्था है। इस आंदोलन को आज कई वर्ष हो गए। कई बार पदयात्राएं दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंची और मायूस होकर लौट आईं। भावुक भक्त यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी इतनी सहज-सी मांग पूरी करने में सरकार को क्या दिक्कत हो सकती है। पर यह काम जितना सरल दिखता है, हकीकत में उतना है नहीं।

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यह सवाल केवल यमुना नदी का नहीं है। देश के ज्यादातर शहरीकृत भू-भाग पर बहने वाली नदियों का है। पिछले दिनों वाराणसी के ऐतिहासिक घाटों के जीर्णोद्धार की रूपरेखा तैयार करने मैं अपनी तकनीकी टीम के साथ कई बार वाराणसी गया। वाराणसी का नामकरण उन दो नदियों के नाम पर हुआ है, जो सदियों से अपना जल गंगा में अर्पित करती थीं। इनके नाम हैं वरुणा और असी। पर शहरीकरण की मार ने उन्हें सुखा दिया। अब वहां केवल गंदा नाला बहता है। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रामगंगा नदी लगभग सूख चुकी है। इसमें गिरने वाली गागन और काली जैसी सहायक नदियां आज शहरों का दूषित जल, कारखानों की गंदगी और सीवर लाइन का मैला ढो रही हैं। पुणे शहर की मूला और मूथा नदियों का भी यही हाल है। मेरे बचपन का एक चित्र है, जब मैं लगभग तीन वर्ष का पुणे की मूला नदी के तट पर अपनी मां के साथ बैठा हूं। पीछे से नदी का प्रवाह, उसके प्रपात और बड़े-बड़े पत्थरों से टकराती उसकी लहरें ऐसा दृश्य उत्पन्न कर रही थीं, मानो यह किसी पहाड़ की वेगवती नदी हो। पर पिछले दिनों मैं दोबारा जब पुणे गया, तो देखकर धक्क रह गया कि ये नदियां अब शहर का एक गंदा नाला भर रह गई हैं।
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यही हाल जीवनदायिनी मां स्वरूप गंगा का भी है, जिसके प्रदूषण को दूर करने के लिए सरकारें अरबों रुपये खर्च कर चुकी हैं। पर कानपुर हो या वाराणसी या आगे के शहर-सब गंगा के प्रदूषण को लेकर वर्षों से आंदोलित हैं। पर समाधान नहीं निकल रहा है। कारण वही हैं-वनों की अंधाधुंध कटाई, शहरीकरण का विकराल रूप, उद्योगों का अनियंत्रित विस्तार, प्रदूषण कानूनों की उड़ती धज्जियां और हमारी जीवन शैली में आया बदलाव।
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यमुना की अविरल धारा की मांग का जो आंदोलन चल रहा है, अगर उसका हल प्रधानमंत्री के पास होता, तो वह उसे अपनाने में देर नहीं लगाते। यह समझने की जरूरत है कि सर्वोच्च न्यायालय, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं ग्रीन ट्रिब्यूनल-सबके सब चाहें, जितने आदेश पारित करते रहें, उन्हें व्यावहारिक धरातल पर उतारने में तमाम झंझट हैं। जब पहले ही दिल्ली अपनी आवश्यकता से 70 फीसदी कम जल से काम चला रही हो, जब हरियाणा के किसान सिंचाई के लिए यमुना की एक-एक बूंद खींच लेना चाहते हों, तो आखिर कहां से बहेगी अविरल यमुना धारा? हथिनीकुंड के फाटक खोलने की मांग भावुक ज्यादा है, व्यावहारिक कम। इसके बावजूद हम जैसे लोग इस उम्मीद में बैठे हैं कि काश, एक दिन वृंदावन के घाटों पर यमुना के शुद्ध जल में स्नान कर सकें।

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