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होर्मुज संकट और भारत: आपूर्ति-स्रोतों में विविधता लाने की नीति से फिलहाल संकट नहीं, कीमतों पर ध्यान देना होगा

Tue, 24 Jun 2025 07:24 AM IST
अमर उजाला Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 24 Jun 2025 07:24 AM IST
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सार
ईरानी संसद के होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध करने के फैसले पर अगर वहां की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद मुहर लगाती है, तो इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला पर संकट आएगा। आपूर्ति-स्रोतों में विविधता लाने की नीति से भारत पर फिलहाल संकट नहीं है, लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव चुनौती न बने, इस पर ध्यान देना होगा।
 
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Hormuz crisis and India diversified supply source policy safeguards for now but focus on prices vital
इस्राइल-ईरान संघर्ष - फोटो : PTI

विस्तार

अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए हवाई हमलों के जवाब में होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध किए जाने के प्रस्ताव पर ईरान की अभूतपूर्व मंजूरी ने वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों में तो हलचल मचाई ही है, यह कदम सामरिक के साथ आर्थिक दृष्टि से भी वैश्विक संतुलन को हिला सकता है। हालांकि, इस फैसले को अंतिम रूप देने का अधिकार ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पास है, लेकिन विश्व के इस सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक, जहां से प्रतिदिन करीब 30 फीसदी वैश्विक तेल और दुनिया की एक-तिहाई एलएनजी की ढुलाई होती है, के बंद होने की आशंकाओं ने फिलहाल भारत समेत तमाम ऊर्जा आयातक देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।



फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला होर्मुज जलडमरूमध्य वैसे तो अपने सबसे संकरे बिंदु पर सिर्फ 33 किलोमीटर चौड़ा है और इसके शिपिंग लेन तो और भी अधिक संकरे हैं, लेकिन इसका महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और कुवैत जैसे प्रमुख तेल उत्पादक अपने तेल निर्यात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं। बावजूद इसके कि कम चौड़ा होने की वजह से इसे अवरुद्ध करना या फिर गुजरने वाले जहाजों पर हमला करना आसान हो जाता है, तथ्य यह भी है कि ईरान ने अब तक किसी संघर्ष के दौरान इसे अवरुद्ध नहीं किया है। 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान भी दोनों देशों ने यहां से गुजरने वाले जहाजों पर हमला तो किया, लेकिन यातायात नहीं रोका। वजह यह है कि ईरान खुद अपने व्यापार के लिए भी जलडमरूमध्य पर ही निर्भर है और इसे अवरुद्ध किए जाने पर ईरान के दुश्मनों के साथ दोस्तों को भी नुकसान पहुंचेगा। शायद इसलिए ही अमेरिकी विदेश मंत्री ने चीन से ईरान को समझाने के लिए कहा है।


जहां तक बात भारत के आयात की है, तो फिलहाल तो इसे कोई खतरा नहीं है, क्योंकि यह ईरान से कच्चे तेल का आयात नहीं करता है, लेकिन भारत के आयातित कच्चे तेल का आधे से अधिक और प्राकृतिक गैस का तकरीबन 80 फीसदी इसी मार्ग से गुजरता है, इसलिए आशंकाएं तो बनी ही हुई हैं। पेट्रोलियम मंत्री भी आश्वासन दे चुके हैं कि भारत के पास कई हफ्तों का रणनीतिक तेल भंडार शेष है। इसके अतिरिक्त, भारत ने हाल के वर्षों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और तेल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने के लिए कई कदम उठाए हैं, इसलिए उसे पर्याप्त तेल और गैस तो मिलती रहेगी, लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव बड़ी समस्या न बने, इसके लिए जरूरी है कि भारत संकट की इस घड़ी को अपनी ऊर्जा कूटनीति को मजबूत करने, रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने और नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाने के अवसर के रूप में ले।

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