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होरी की गांव गुनगुनाने की जिद
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प्रवासी पक्षी
- फोटो : Pixabay
समय की इन दिनों मेरे पास कोई तंगी नहीं। पर समय से मैं ही तंग हूं। समय ही समय होने के बावजूद पता नहीं क्यों, मैं चाहता हूं कि होरी के आने से पहले अखबार के सारे पेज फांक लूं। चिड़िया कटोरे में रखा पानी पी रही है। उसे महामारी से डरे मेरे जैसे व्यक्ति की कोई परवाह नहीं।
काश! इन दिनों मैं भी चिड़िया हो जाता। कल तक जिस चिड़िया को देखकर मैं उसके साथ चहका-बहका करता था, आज उसे देख शंका होने लगती है कि कहीं वह भी संक्रमण फैलाने वालों में शामिल तो नहीं हो गई होगी? आशंकाओं के बीच जीना कितना कठिन होता है, यह मैं पल-पल महसूस कर रहा हूं। कल तक हम जिन-जिनसे खुलकर, छिप-छिपकर प्रेम किया करते थे, उनका वह खुला-छिपा प्रेम अब संक्रमण में बदलता दिख रहा है। हे प्रेम! तू संक्रमण भी है क्या!
अखबार में जिस भी कॉलम पर नजर डालता हूं, आंखें खुद ब खुद बंद हो जाती हैं। लगता है, जैसे अब रोज एक ही तरह की खबरें पढ़कर ये आंखें तंग हो गई हों। जितने लोग इन दिनों पॉजिटिव गिने जा रहे हैं, उतने शायद पहले कभी ही पॉजिटिव रहे हों। लगता है, देवताओं के साथ दूर कहीं निगेटिव लोग भी कूच कर गए हों, जैसे महामारी की आहट सुनते ही।
डरते हुए अखबार का अगला पेज बदला ही था कि होरी फिर आ धमका। जब से सब बंद हुआ है, होरी परेशान है। वह अपने गांव जाना चाहता है। उस गांव में, जहां शोषण करने वालों की जमात उसका शिकार करने को अब भी जाल बिछाए हुए है। उसके आने वाले कदम-कदम पर लैंडमाइन्स बिछाए हुए है।
गांव छोड़ते-छोड़ते उसने पता नहीं, क्या-क्या सोचा होगा? अधिक सही, तो कम गलत सोचा होगा। किस-किस महाजन के पास गिरवी रखे खेत ने उसे रोका नहीं होगा? पर वह नहीं रुका था। शोषण जब निर्मोही कर दे, तो ऐसा ही होता है। उसे उस वक्त गांव की अपेक्षा शहर में जीने की संभावनाएं अधिक लगी थीं। पर आज उन्हीं संभावनाओं पर ऐसा पानी फिरा कि सोते-जागते गांव याद आने लगा।
आज भी होरी के आने पर मैंने अखबार बंद कर दिया है। पर अखबार बंद कर देने से जिंदगी के प्रश्न तो बंद नहीं किए जा सकते? आंखें बंद कर देने से सच दिखने तो बंद नहीं हो जाते। फिर भी कई दिनों से उसके आने पर कुछ ऐसा ही कर रहा हूं। क्योंकि उसके लिए अखबार में सब कुछ होने के बाद भी वास्तव में कुछ नहीं है। जो है भी, वह अखबार में से बाहर नहीं आ सकता। इसलिए उसके सामने अखबार खोलने की मेरी आज भी हिम्मत नहीं हुई।
‘बाबू साहब, आज कुछ खास है क्या हमारे लिए अखबार में? सरकार ने कहा कि नहीं कि अब हम अपने गांव अपनी बूढ़ी धनिया, हरदम बीमार रहने वाले गोबर, उसकी गर्भवती बीवी, पोते-पोतियों के साथ चले जाएं। देखो बाबू, यह तो सोचना ही छोड़ दो कि हम अकेले गांव जाएंगे। हो सके, तो सरकार तक आप हमारी यह आवाज पहुंचा दो।
हमसे हमारी आवाज तो छोड़ो, हमारा रोना तक सरकार तक नहीं पहुंच रहा। मस्ती के लिए गांव कौन जाना चाहता है बाबू? खुशी ढूंढने ही तो हम गांव छोड़कर शहर आए थे। मजदूरी महीनों से बंद है। ऐसे में सरकार ऐसा सोच भी कैसे सकती है कि हम अकेले गांव लौट जाएं? हम तो साथ जीने-मरने वाले जीव हैं।
वैसे भी हम अपनी खुशी से तो गांव जा नहीं रहे। बहुत जरूरी है, तभी तो गांव जा रहे हैं। रही बात बीमारियों में सफर न करने की तो, आप ही कहो कि देश के कितने मजदूरों की सेहत ठीक है? अगर मजदूरों की जांच हो, तो ट्रेनों में हम-सा एक भी अपने गांव लौटने लायक न हो। हमारी कोई तो मजबूरी रही होगी शहर छोड़ने की।
पसीने की जगह अपना खून दिया है हमने इस शहर को। हमने जंगल को शहर में बदला है। हमने यहां सड़कें बनाई हैं। अब सड़कों पर हमारे ही चलने से रोक। हमने तो...।’ उसने मेरे सामने उकड़ूं बैठे आंखों में गांव सजाते कहा, तो मैं चुपचाप उसे समझने लगा।
वैसे अगर किसी के पास समझने की ताकत-हिम्मत हो, तो अखबारों से अधिक मजबूर की आंखों में पढ़ने-समझने को मिल जाता है। सिर नीचा किए उससे इतना ही कह पाया, 'होरी! शहर फिर खुल तो रहा है।' अबके फिर बात तो उसके फायदे की की है, पर इसमें किसका कितना फायदा है, शायद अब होरी जान गया है। इसलिए वह जिद्दी-सा चुप है।
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काश! इन दिनों मैं भी चिड़िया हो जाता। कल तक जिस चिड़िया को देखकर मैं उसके साथ चहका-बहका करता था, आज उसे देख शंका होने लगती है कि कहीं वह भी संक्रमण फैलाने वालों में शामिल तो नहीं हो गई होगी? आशंकाओं के बीच जीना कितना कठिन होता है, यह मैं पल-पल महसूस कर रहा हूं। कल तक हम जिन-जिनसे खुलकर, छिप-छिपकर प्रेम किया करते थे, उनका वह खुला-छिपा प्रेम अब संक्रमण में बदलता दिख रहा है। हे प्रेम! तू संक्रमण भी है क्या!
अखबार में जिस भी कॉलम पर नजर डालता हूं, आंखें खुद ब खुद बंद हो जाती हैं। लगता है, जैसे अब रोज एक ही तरह की खबरें पढ़कर ये आंखें तंग हो गई हों। जितने लोग इन दिनों पॉजिटिव गिने जा रहे हैं, उतने शायद पहले कभी ही पॉजिटिव रहे हों। लगता है, देवताओं के साथ दूर कहीं निगेटिव लोग भी कूच कर गए हों, जैसे महामारी की आहट सुनते ही।
डरते हुए अखबार का अगला पेज बदला ही था कि होरी फिर आ धमका। जब से सब बंद हुआ है, होरी परेशान है। वह अपने गांव जाना चाहता है। उस गांव में, जहां शोषण करने वालों की जमात उसका शिकार करने को अब भी जाल बिछाए हुए है। उसके आने वाले कदम-कदम पर लैंडमाइन्स बिछाए हुए है।
गांव छोड़ते-छोड़ते उसने पता नहीं, क्या-क्या सोचा होगा? अधिक सही, तो कम गलत सोचा होगा। किस-किस महाजन के पास गिरवी रखे खेत ने उसे रोका नहीं होगा? पर वह नहीं रुका था। शोषण जब निर्मोही कर दे, तो ऐसा ही होता है। उसे उस वक्त गांव की अपेक्षा शहर में जीने की संभावनाएं अधिक लगी थीं। पर आज उन्हीं संभावनाओं पर ऐसा पानी फिरा कि सोते-जागते गांव याद आने लगा।
आज भी होरी के आने पर मैंने अखबार बंद कर दिया है। पर अखबार बंद कर देने से जिंदगी के प्रश्न तो बंद नहीं किए जा सकते? आंखें बंद कर देने से सच दिखने तो बंद नहीं हो जाते। फिर भी कई दिनों से उसके आने पर कुछ ऐसा ही कर रहा हूं। क्योंकि उसके लिए अखबार में सब कुछ होने के बाद भी वास्तव में कुछ नहीं है। जो है भी, वह अखबार में से बाहर नहीं आ सकता। इसलिए उसके सामने अखबार खोलने की मेरी आज भी हिम्मत नहीं हुई।
‘बाबू साहब, आज कुछ खास है क्या हमारे लिए अखबार में? सरकार ने कहा कि नहीं कि अब हम अपने गांव अपनी बूढ़ी धनिया, हरदम बीमार रहने वाले गोबर, उसकी गर्भवती बीवी, पोते-पोतियों के साथ चले जाएं। देखो बाबू, यह तो सोचना ही छोड़ दो कि हम अकेले गांव जाएंगे। हो सके, तो सरकार तक आप हमारी यह आवाज पहुंचा दो।
हमसे हमारी आवाज तो छोड़ो, हमारा रोना तक सरकार तक नहीं पहुंच रहा। मस्ती के लिए गांव कौन जाना चाहता है बाबू? खुशी ढूंढने ही तो हम गांव छोड़कर शहर आए थे। मजदूरी महीनों से बंद है। ऐसे में सरकार ऐसा सोच भी कैसे सकती है कि हम अकेले गांव लौट जाएं? हम तो साथ जीने-मरने वाले जीव हैं।
वैसे भी हम अपनी खुशी से तो गांव जा नहीं रहे। बहुत जरूरी है, तभी तो गांव जा रहे हैं। रही बात बीमारियों में सफर न करने की तो, आप ही कहो कि देश के कितने मजदूरों की सेहत ठीक है? अगर मजदूरों की जांच हो, तो ट्रेनों में हम-सा एक भी अपने गांव लौटने लायक न हो। हमारी कोई तो मजबूरी रही होगी शहर छोड़ने की।
पसीने की जगह अपना खून दिया है हमने इस शहर को। हमने जंगल को शहर में बदला है। हमने यहां सड़कें बनाई हैं। अब सड़कों पर हमारे ही चलने से रोक। हमने तो...।’ उसने मेरे सामने उकड़ूं बैठे आंखों में गांव सजाते कहा, तो मैं चुपचाप उसे समझने लगा।
वैसे अगर किसी के पास समझने की ताकत-हिम्मत हो, तो अखबारों से अधिक मजबूर की आंखों में पढ़ने-समझने को मिल जाता है। सिर नीचा किए उससे इतना ही कह पाया, 'होरी! शहर फिर खुल तो रहा है।' अबके फिर बात तो उसके फायदे की की है, पर इसमें किसका कितना फायदा है, शायद अब होरी जान गया है। इसलिए वह जिद्दी-सा चुप है।