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उम्मीदों के बोझ तले उर्जित पटेल

Fri, 02 Sep 2016 07:30 PM IST
अश्विनी महाजन
अश्विनी महाजन Updated Fri, 02 Sep 2016 07:30 PM IST
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Hopefull burden on Urjit Patel
अश्विनी महाजन

आगामी चार सितंबर से उर्जित पटेल रिजर्व बैंक के गवर्नर का कार्यभार संभालने जा रहे हैं। मौद्रिक नीति के बारे में उनकी राय रघुराम राजन से मेल खाती है। मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए अति आग्रही रघुराम राजन ब्याज दरों को न घटाने की जिद के लिए जाने जाते रहे हैं। इस कारण पहले यूपीए शासन के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम और बाद में एनडीए सरकार के दौरान वर्तमान वित्त मंत्री अरुण जेटली से उनका मतभेद रहा।

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मौद्रिक नीति को मुद्रास्फीति केंद्रित होना चाहिए, इस मामले में उर्जित पटेल वर्तमान गवर्नर से एक राय ही नहीं रखते, बल्कि उर्जित पटेल की अध्यक्षता में बनी समिति ने ही सुझाव दिया था कि उपभोक्ता कीमत सूचकांक को लक्षित किया जाए। इससे पहले थोक मूल्य सूचकांक को ही लक्षित मुद्रास्फीति के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
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उर्जित पटेल ऐसे समय रिजर्व बैंक के गवर्नर बन रहे हैं, जब भारत सरकार ही नहीं, वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भी आठ प्रतिशत की विकास दर के प्रति आश्वस्त हैं। विदेशी भुगतान की स्थिति अनुकूल है, भारी मात्रा में विदेशी निवेश देश में आ रहा है, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ रहा है, मुद्रास्फीति काबू में है और अच्छे मानसून के चलते भविष्य में मुद्रास्फीति के और नीचे जाने के पूरे आसार है।
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नए गवर्नर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आर्थिक विकास दर की अपेक्षाओं और मुद्रास्फीति की चिंताओं में संतुलन कैसे बिठाते हैं। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि मुद्रास्फीति को रोकते हुए कहीं विकास दर की संभावनाएं न समाप्त हो जाएं। उन्हें विकास दर और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रयास करना होगा।

नए गवर्नर की दूसरी प्रमुख चुनौती है सरकारी बैंकों में बढ़ते एनपीए को रोकना। इस स्थिति में सुधार लाने का जो काम रिजर्व बैंक और सरकार ने शुरू किया, वह अभी अधूरा है। यहां उर्जित पटेल की क्षमताओं का परीक्षण होगा।

उनकी तीसरी प्रमुख चुनौती है सरकारी बैंकों में नई तकनीक को प्रोत्साहित कर उन्हें नए और पुराने निजी बैंकों के समक्ष प्रतिस्पर्धी बनाना। राजन के कार्यकाल में कई नए निजी बैंकों को लाइसेंस प्रदान किए गए। सरकारी बैंकों को अधिक लचीलापन देने की जरूरत होगी।

इसी तरह रुपये को मजबूत बनाना या उसे कमजोर न होने देना नए गवर्नर के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती है। आज देश में विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति कहीं बेहतर है। पर निकट भविष्य में 35 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा जमा की परिपक्वता आने वाली है, इसलिए अप्रवासी भारतीयों को पुनः भारत में जमा लाने के लिए प्रेरित करना होगा। विदेशी संस्थागत निवेशकों के कार्यकलापों पर पैनी नजर रखनी होगी, और जब भी विदेशी निवेशक विदेशी मुद्रा बाहर ले जाएं तो त्वरित कार्रवाई करते हुए रुपये को कमजोर होने से बचाना होगा।


रेपो रेट तय करने के संबंध में एक नई वैधानिक मौद्रिक नीति समिति बनी है और उर्जित पटेल को इस कार्य के लिए इस समिति के साथ मिलकर काम करना होगा। इस समिति में तीन सदस्य सरकार द्वारा और तीन रिजर्व बैंक द्वारा नामित होंगे, पर ‘टाई' की स्थिति में वीटो का अधिकार गवर्नर का होगा। फिर भी नए गवर्नर पर यह दायित्व होगा कि निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत से हों। उर्जित पटेल के सामने वैसी चुनौतियां तो नहीं होंगी, जैसी रघुराम राजन के सामने थीं, इसके बावजूद उनके लिए स्थितियां उतनी भी आसान नहीं हैं।

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