चीन में भारत के लिए उम्मीद
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इन दिनों देश और दुनिया के अर्थविशेषज्ञ यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यापार युद्ध में भारत से चीन को निर्यात बढ़ने की नई संभावनाएं निर्मित हो गई हैं। पिछले दिनों अमेरिका ने चीन के 1300 उत्पादों पर 25 फीसदी आयात शुल्क लगाने का निर्णय लिया, वहीं इसके जवाब में चीन ने अमेरिका से बड़ी मात्रा में आयात होने वाले 128 उत्पादों पर 25 फीसदी आयात शुल्क लगाने का निर्णय ले लिया। इन उत्पादों में सोयाबीन, तंबाकू, फल, मक्का, गेहूं, रसायन आदि शामिल हैं। चीन के द्वारा लगाए गए आयात शुल्क के कारण अमेरिका की ये सारी वस्तुएं चीन के बाजारों में महंगी हो जाएंगी। चूंकि इनमें से अधिकांश वस्तुएं भारत भी चीन को निर्यात कर रहा है और भारतीय वस्तुओं पर चीन ने कोई आयात शुल्क नहीं बढ़ाया है। ऐसे में ये भारतीय वस्तुएं चीन के बाजारों में कम कीमत पर मिलने लगेंगी। इससे चीन को भारत का निर्यात बढ़ेगा।
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वैसे भी विगत 26 मार्च को नई दिल्ली में चीन के वाणिज्य मंत्री झोंग शैन तथा भारतीय वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु के साथ दोनों देशों के उच्च अधिकारियों की संयुक्त बैठक में दोनों देशों ने नए वैश्विक कारोबार परिदृश्य के मद्देनजर आपसी कारोबार बढ़ाने का निर्णय लिया है। सुरेश प्रभु ने याद दिलाया कि भारत का बढ़ता हुआ व्यापार घाटा दोनों देशों के आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों की राह में एक चिंताजनक मुद्दा बना हुआ है। वहीं चीन के वाणिज्य मंत्री शैन ने भरोसा दिया कि भविष्य में चीन की ओर से प्रयास होगा कि भारत-चीन के बीच व्यापार असंतुलन में कमी आए।
गौरतलब है कि भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2017 में चीन को भारत का निर्यात 16.34 अरब डॉलर मूल्य का रहा। जबकि चीन से भारत ने 68.10 अरब डॉलर का आयात किया। यानी भारत का व्यापार घाटा 51.76 अरब डॉलर रहा। 2017 में भारत और चीन के बीच व्यापार की ऐतिहासिक ऊंचाई और भारत का सर्वाधिक व्यापार घाटा तब रहा, जब दोनों देशों के बीच दोकलम विवाद और अन्य मुद्दे मसलन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, चीन द्वारा जैश ए मोहम्मद के मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध के भारतीय प्रयास में अड़चन और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश पर बाधा पहुंचाई जा रही थी। इस बीच, भारत ने दलाई लामा के भारत में आगमन के 60 वर्ष पूर्ण होने पर धन्यवाद समारोह दिल्ली के बजाय धर्मशाला में स्थानांतरित कर भविष्य में अच्छे संबंधों का रास्ता निकाला। ऐसे परिदृश्य में इस साल भारत-चीन का द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने की संभावना दिखाई दे रही है।
वैश्विक शोध संगठन स्टैटिस्टा और डालिया रिसर्च ने 'मेड इन कंट्री इंडेक्स' में उत्पादों की साख के अध्ययन के आधार पर कहा है कि गुणवत्ता के मामले में 'मेड इन इंडिया' 'मेड इन चायना' से आगे है। चूंकि भारतीय उत्पाद गुणवत्तापूर्ण और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी होते हैं, इसलिए यहां ऐसा कोई कारण नहीं है कि चीनी उपभोक्ता और कंपनियां इनकी खरीद नहीं कर सकतीं। चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे को कम करने के लिए भारतीय निर्यातकों को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। चीन से व्यापार में मुकाबला करने के लिए भारत को कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले देश के रूप में बाजार में पहचान बनानी होगी। इसके साथ ही हमें अपनी बुनियादी संरचना में व्याप्त अकुशलता एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर उत्पादन लागत कम करने के रास्ते भी तलाशने होंगे।