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अब तो बंधन खोल दें: असली त्योहार वह है, जिसमें आप बिना किसी चिंता के एक दूसरे से मिलें
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होली का उत्साह (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : pexel
होली में हम जाने-अनजाने लोगों से गले मिलते हैं, हुड़दंग मचाते हैं और रंग लगाते हैं। होली घुलने-मिलने का त्योहार है। होली का मतलब है सामाजिकता। आज सबसे बड़ी बिजली सामाजिकता पर गिरी है। कोरोना भले एक मेडिकल वायरस है, पर अब वह मनोवैज्ञानिक वायरस बन गया है। एक साल से हम सब घर में पड़े हैं। मनुष्य, मनुष्य से दूर हो गया है। अभी तक फागुन आते ही बहार छा जाती थी। आज पेड़, पौधों पर तो फूल आ रहे हैं, लेकिन मनुष्य के मन में फूल मुरझा रहे हैं।
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मेरे पिता आकाशवाणी में थे और हम मुंबई के अंधेरी में एक राजस्थानी सोसाइटी जमनालाल बजाज नगर में रहते थे। वहां के राजस्थानी परिवार महीने भर पहले से ही होली की तैयारी शुरू कर देते थे। घरों में आलू के खूब सारे पापड़ बनते थे। एक सप्ताह पहले गुझिया बननी शुरू हो जाती थी। बेसन की पपड़ी बनती थी। ये सब होली की रंगीनियां थीं। होलिका दहन के बाद बड़े-बड़े ड्रमों में टेसू के फूल रात भर भिगोए जाते थे। इससे पानी केसरिया रंग का हो जाता था। हम पीतल की छोटी-छोटी बाल्टियों में पानी लेकर दोस्तों को नहलाने के लिए दौड़ते रहते थे।
मुंबई में मैं दो साल हॉस्टल में रही। वहां भी होली यादगार रही। हम लोग कॉरिडोर को बंद करके उसमें पानी भर देते थे और फिर उसमें एक दूसरे को नहलाते थे। कई बार हम गोरेगांव भी चले जाते थे, जहां हमारे कई पत्रकार मित्र होली में शामिल होते थे। मुझे, मम्मी और दीदी को रंग लगाना पसंद था। लेकिन पापा सूखे रंग लगाकर, गुझिया खिलाकर नमस्कार कर लेते थे। वह हुड़दंग में विश्वास नहीं रखते थे। वह कहते थे कि होली पर साहित्य पढ़ो। मैंने सबसे पहले नजीर अकबराबादी की लिखी कविता, जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की पढ़ी। पापा ब्रज की होली के संस्मरण सुनाते थे। मुझे ब्रज की होली का वास्तविक अनुभव है। वहां पुरुष सिर के ऊपर लाल अंगोछा डालकर ब्रजभाषा के गीत, मोरी भीगी रे सारी साड़ी रे, कैसो चटख रंग डारो गाते थे। बाद में मदर इंडिया फिल्म आई, जिसका होली आई रे कन्हाई गाना बेहद चर्चित हुआ और उसके बाद होली का फिल्मीकरण होने लगा।
एक बार मेरी मम्मी को उनकी सहेली के पिता ने मथुरा में ठंडाई के बहाने भंग पिला दी थी। मम्मी भंग के नशे में घर आ रही थीं और हमें उन्होंने रास्ते में एक बंद दुकान के सामने छोड़ दिया। घर पर मेरी दादी ने जब हमारे बारे में पूछा, तो वह जवाब ही नहीं दे पाईं। सब लोग घबरा गए। बाद में परिवार वालों ने हमें दुकान पर पाया। ऐसे संस्मरण हमें हर होली पर सुनाए जाते थे। यह लगातार पीढ़ियों में किस्सों का प्रसार करने वाला ज्ञान था। इलाहाबाद (अब प्रयागराज) आने पर हमें रानीमंडी में मकान मिला। बाद में हम इंजीनियरिंग कॉलेज के सामने एक कॉलोनी में रहने लगे। वहां पर लेखक और कलाकार बहुत रहते थे। होली की असल मौज वहां आकर देखी।
होली के दिन सुबह से ही सब टोली में आते थे। सब वहां खूब मस्ती करते थे। होली भाईचारे का त्योहार है। यदि कोरोना को ध्यान में रखते हुए भी कुछ लोग निकलेंगे, तो मुझे अच्छा लगेगा। क्योंकि मास्क पहनकर, एक दूसरे से अलग रहकर अब दम घुटने लगा है। अगर हमने त्योहार भी मोबाइल फोन पर बे-सिर पैर के धारावाहिक देखकर मना लिए, तो उसको मैं त्योहार नहीं मानती। असली त्योहार वह है, जिसमें आप बिना किसी चिंता के एक दूसरे के साथ मिलें और अपने दिल की बात करें। त्योहार में खुशी होनी चाहिए। मैं यही उम्मीद कर रही हूं कि इस बार की होली कम से कम हक्का-बक्का होली न हो, तल्खी न हो।