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उनका अंदाजे बयां था कुछ और
सुरेंद्र कुमार
Updated Wed, 29 Aug 2018 06:36 PM IST
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सुरेंद्र कुमार
अटल बिहारी वाजपेयी जी से मेरी क्षणिक मुलाकात तब हुई थी, जब 1967 में वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ को संबोधित करने आए थे। उस समय मैं वहां स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। वह उस समय काफी युवा थे, बोलने के क्रम में जो विराम लेते थे, वह छोटा था, लेकिन उनके शब्दों की धार बहुत तेज थी। हिंदी भाषा पर गहरी पकड़ के कारण उन्होंने छात्रों पर जादू कर दिया था, सूक्ष्म व्यंग्य और दाहिने हाथ के अंदाज से लैस उनकी वक्तृत्व कला मोहक थी। उस समय सोलह राज्यों में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस अपने घाव सहला रही थी।
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उसके बाद मैं उनसे हांगकांग में मिला, जब फरवरी 1979 में वह वियतनाम पर चीनी हमले के बाद अपनी चीन की यात्रा में कटौती करने के निर्णय के बाद कैंटोन (ग्वांगझू) से होवरक्राफ्ट से आए थे। हालांकि शाम को हांगकांग स्थित भारतीय समुदाय द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में वह स्पष्ट रूप से थके हुए लग रहे थे, लेकिन जब उनसे नेहरू की चीन नीति पर बोलने के लिए कहा गया, तो उन्होंने हिंदी में अपनी करिश्माई शैली में उत्तर दिया, जिसका मोटे तौर पर मतलब था, 'आप मुझसे जिस जवाब की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वह मैं नहीं दूंगा। मैं आज उसी कुर्सी (विदेश मंत्री) पर बैठा हूं, जिस पर कभी नेहरू जी बैठते थे। मैं उनकी कमियां निकालने के लिए हांगकांग नहीं आया हूं।'
उन्होंने कई मुद्दों पर गंभीर मतभेद होने के बावजूद नेहरू की भूमिका और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान के लिए इस गहरे सम्मान को बरकरार रखा। खासकर कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने और उसके बाद की नीति, जिसके चलते 1962 में चीन का हमला हुआ, इसको लेकर नेहरू से उनके मतभेद थे। तमाम गड़बड़ियों के लिए नेहरू की उनके विरोधियों द्वारा आलोचना की जाती है, लेकिन उन आलोचकों को नेहरू की मृत्यु पर अटल जी की श्रद्धांजलि पर गौर करना चाहिए-'भारत माता आज गहरे सदमे में है, उसने अपना सबसे प्रिय राजकुमार खो दिया है। मानवता आज दुखी है, उसने अपना पुजारी खो दिया है। शांति आज बेचैन है, उसका संरक्षक अब नहीं है। दलित-वंचित लोगों ने अपना आसरा खो दिया है। आमलोगों ने अपनी आंख की ज्योति खो दी है...एक सपना टूट गया है, गीत चुप हैं, एक लौ अनंत में गायब हो गई है।'
'धर्मनिरपेक्षता' आज गंदा शब्द बन गया है। धर्मनिरपेक्षता पर जोर देने वाले व्यक्ति को छद्म धर्मनिरपेक्ष और अल्पसंख्यक समुदायों के वकील के तौर पर निंदा की जाती है। लेकिन वाजपेयी जी दृढ़ता से मानते थे कि भारत धर्मनिरपेक्षता के बिना जीवित नहीं रह सकता। अगर वह पिछले कुछ वर्षों से अपने पूरे होशो-हवाश में होते, तो मौजूदा राजनीतिक बयानबाजी, भीड़ द्वारा लोगों की हत्या, धार्मिक असामंजस्य और विरोधी विचारों के प्रति असहिष्णुता को देखकर खुश नहीं होते।
उन्होंने व्यावहारिक विदेश नीति का पालन किया, जिसका लक्ष्य पड़ोसी देशों के साथ तनाव कम करना और प्रमुख वैश्विक खिलाड़ियों के साथ उपयोगी साझेदारी बनाना था, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और गौरव से समझौता किए बिना भारत के आर्थिक विकास को उन्नत बनाया जा सके। वह एक दूरदर्शी स्टेट्समैन थे, पाकिस्तान और अमेरिका के प्रति उनकी नीति इसी बात को रेखांकित करती है। उन्होंने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को बढ़ाया। उन्होंने विनिवेश मंत्रालय का गठन भी किया और अरुण शौरी को उसका नेतृत्व करने के लिए कहा। हैरानी की बात नहीं कि उनके कार्यकाल के दौरान सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर आठ फीसदी से ज्यादा रही। अटल जी का सम्मान करने के लिए उनके मूल्यों को अपनाना चाहिए और दोस्तों व दुश्मनों के साथ उनके व्यवहार का अनुकरण करना चाहिए।
लेखक पूर्व राजदूत हैं