{"_id":"c3794238-34c1-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"his-moment-and-my-mouth","type":"story","status":"publish","title_hn":"उनका मुहूर्त और मेरा मुंह!","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
उनका मुहूर्त और मेरा मुंह!
प्रकाश पुरोहित
Updated Thu, 22 Nov 2012 09:59 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जब एक ही दिन में चार-पांच शादियों में जाना पड़ता है, तब मुझे बड़ी कोफ्त होती है। मुहूर्त के हिसाब से शादी करने वालों की क्या मजबूरी होती है, मैं समझ नहीं पाता। साल में इतने दिन होते हैं, कोई भी छुट्टी का दिन देखकर शादी कर ली। आप तो शादी तय कर बैठ गए, मगर उनका क्या, जो यहां से वहां, इस शादी से उस शादी मारे-मारे फिर रहे हैं। घर अगर रास्ते में है, तो हर शादी के बाद सूट बदल लेते हैं, और घर बीच में नहीं आता, तो साथ में ही सूटकेस रख लेते हैं।
विज्ञापन
मेरी पत्नी तो शादी के हिसाब से रास्ते में पड़ने वाले घरों को याद कर लेती है, कृष्णा बेन का घर है उधर तो! बहुत दिन से गए भी नहीं उधर। गुप्ताजी की शादी निपटा कर कृष्णा बेन के यहां फ्रेश हो लेंगे। वहां से पुरी साहब की शादी में चले जाएंगे...तब तक नौ तो बज ही जाएंगे। ...उधर से बड़े मामा के यहां जाना है शादी में... तो उस रास्ते पर मेरी सहेली जानकी का घर है... वहां फ्रेश हो लेंगे। और देख लूंगी, अगर उसकी कोई साड़ी पसंद आ गई, तो चेंज भी कर लूंगी। ...हां, याद रखना कि गुप्ता जी के यहां शादी में सिर्फ सलाद ही खाना है।
विज्ञापन
तुम्हारा तो भरोसा नहीं। जहां खाना देखा, प्लेट भरकर खड़े हो जाते हो! वहां से पुरी साहब की शादी में पानी-बताशे और चाट! ज्यादा से ज्यादा सूप...वह भी स्वीट कॉर्न का हुआ तो...! फिर जानकी जरूर चाय पिलाएगी। पीने मत बैठ जाना! कह देना कि जूस पीकर आ रहे हैं। हां, बड़े मामा के यहां एक घंटा तो रुकना ही पड़ेगा, इसलिए याद रखना कि गुप्ता जी के यहां बीस मिनट में निपटा देंगे और पुरी साहब को भी पंद्रह-बीस मिनट से ज्यादा नहीं देंगे। यह समय लिफाफे देने के बाद शुरू होगा। हां तो मैं खाने पर थी कि बड़े मामा तो हलवाइयों से, खड़े होकर खाना बनवाते हैं। आइटम याद रख लेना, वे पूछेंगे जरूर!
विज्ञापन
मगर खाने मत लगना! वहां प्लेट तो लेनी पड़ेगी और भरनी भी पड़ेगी, पर खाना नहीं है। आंख बचाकर डाल देना डस्टबिन में! खन्ना भाई साब के यहां खाना वाकई अच्छा होगा। सुना है, दिल्ली और राजस्थान से बुलाए हैं महाराज! तो पूरा खाना हम खन्ना साहब के यहां खाएंगे। मगर वहां भी दाल-रोटी लेकर खड़े मत हो जाना! जो नए-नए आइटम हों, वही लेना। फिर वह कौन है तुम्हारे दफ्तर वाला। उसके यहां सिर्फ पान ही खाना है। अब आप ही बताइए कि इतनी सारी शर्तों के बीच क्या तो शादी और क्या खाना!