अनुकरण: पहले मातृभाषा, फिर देश की भाषा, कुछ ऐसा ही करें हिंदी प्रदेश
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विस्तार
पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रदेश के सभी अंग्रेजी स्कूलों में दूसरी भाषा के रूप में बांग्ला को अनिवार्य कर दिया है। स्थानीय स्तर पर इसकी आलोचना हो सकती है कि पहले दूसरी भाषा में एक विकल्प हिंदी भी था। हम हिंदी भाषी भी इस पर भावुक प्रतिक्रियाएं दे सकते हैं। पर स्थानीयता की दृष्टि से राज्य की भाषा को वरीयता होनी ही चाहिए। अगर दूसरी भाषा हिंदी चुने जाने का विकल्प होगा, तो स्थानीय भाषा से दूरी बनना तय हो जाएगा। हां, तीसरी भाषा में हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा का विकल्प एक सुंदर विचार हो सकता है। एक संघीय राष्ट्र के प्रांत के स्कूलों में अंग्रेजी के बाद स्थानीय/ प्रादेशिक भाषा को अनिवार्य बनाना व्यवहारिक मार्ग है। हिंदी प्रदेशों में हिंदी के लिए भी ऐसे कदम उठाने की ज़रूरत है। भारतीय भाषाओं को बचाने का यही एक मार्ग है।
संविधान सभा की कार्यवाही एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। उसमें भाषा और राष्ट्रभाषा को लेकर संविधान सभा के सदस्यों के बीच हुई बहसें बहुत दिलचस्प हैं। रघुनाथ विनायक धुलेकर ने हिंदी/ हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था। यह जानना भी दिलचस्प है कि पश्चिम बंगाल के लक्ष्मीकांत मित्र संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे। ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि 12 सितंबर, 1949 को दोपहर बाद चार बजे जो बहस शुरू हुई, पूरे दो दिन चली, और सारा वाद-विवाद अंग्रेजी में हुआ। यहां तक कि संविधान सभा की अध्यक्षता कर रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी अंग्रेजी में ही निर्देश दे रहे थे। रामचंद्र गुहा अपनी किताब इंडिया आफ्टर गांधी में कहते हैं कि भाषा संविधान सभा में सबसे विवादास्पद मुद्दा थी। उनके हवाले से मैं कहना चाहता हूं कि धुलेकर ने पुरजोर शब्दों में कहा कि जो लोग हिंदुस्तानी नहीं समझते हैं, उन्हें इस देश में रहने का कोई हक नहीं है।
मेरी सम्मति है कि आजादी की 76वीं वर्षगांठ के उत्सवों के बीच भाषा को लेकर फिर चर्चा-बहस होनी चाहिए। इतने वर्षों में हिंदी को लेकर हम कहां तक पहुंचे हैं और आगे क्या रास्ता है? राष्ट्रभाषा के नाम पर हिंदी के लिए लड़ने वाले अपने बच्चों को हिंदी माध्यम में पढ़ाने के नाम पर बिदक जाते हैं, इस विरोधाभास को संबोधित ही नहीं करना चाहते, जबकि इसी विरोधाभास में भारत के भाषायी भविष्य की चाबी छिपी है।
बंगाल से बात शुरू हुई, तो यह भी याद आता है कि गांधी जी कैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, जब उन्होंने राजस्थान से कहा कि हिंदी को अपनी भाषा घोषित करें, इससे देशहित में मदद मिलेगी, पर यह बलिदान उन्होंने अपने गुजरात से नहीं मांगा। सोचने की बात है कि क्या आज हमारी कामनाओं, सपनों और उम्मीदों की भाषा के रूप में वह मान और प्रेम हम हिंदी भाषा को अपने जीवन और व्यवहार में देते हैं? हम हिंदी के नाम पर दूसरों से तो लड़ने के लिए खड़े हो जाते हैं, पर अपने जीवन और घर में लड़ पाते हैं? और बात केवल हिंदी की नहीं है। सभी भारतीय भाषाओं की है। हालांकि एक बड़ा वर्ग अब अंग्रेजी को गैर-भारतीय भाषा मानने से इन्कार करने लगा है, पर अंग्रेजी से इतर हमारी भाषाएं भी तो हमारी थोड़ी तवज्जो चाहती हैं। इन भाषाओं को बचाने के प्रयास करने होंगे। ये प्रयास सरकारी-गैर सरकारी, दोनों ही स्तर पर हो सकते हैं। मुझे सुखद हैरानी होती है कि सोशल मीडिया रील्स के जरिये दूर-दराज के गांवों- कस्बों के लोगों ने अनजाने में ही सही, लेकिन अपनी स्थानीय भाषाओं को लेकर कितना अद्भुत काम किया है। दिखने में बेशक ये रील्स साधारण हास्यबोधक लगें, लेकिन बगैर किसी बड़े चेहरे के ये लोग जिस तरह से भारतीय भाषा-बोलियों प्रचार-प्रसार कर रही हैं, उसका दस्तावेजीकरण करने में अकादमिक गलियारे कितनी रुचि दिखाएंगे, उसमें मुझे संदेह है।
देश की कामकाजी आधिकारिक भाषा हिंदी बने या देश के माहौल व वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप अंग्रेजी बन जाए, पर हमारे दिलों से जुड़ी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को हमें हिंदी बनाम अन्य भाषाओं का संघर्ष बनाने से भी बचाना है। सब भारतीय भाषाएं अंग्रेजी के समक्ष अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही हैं। जिस प्रदेश की जो भाषा है, उस प्रदेश में पहले वह भाषा प्राथमिक हो, फिर राष्ट्रभाषा हो, यह तो तार्किक और व्यावहारिक बात है। हर प्रदेश के नागरिकों का बुनियादी हक और कर्तव्य बनता है कि अपने प्रदेश की भाषा को शिक्षा में अंग्रेजी की तुलना में प्राथमिकता दें, फिर हमें जोड़ने वाली हिंदी भाषा को। जाहिर है, हिंदी प्रदेशों में अंग्रेजी के साथ हिंदी को ही प्राथमिकता और समुचित आदर सबको मिलकर देना होगा। अब सब कुछ सरकार पर तो छोड़ा नहीं जा सकता। लोगों को निजी स्तर पर भी तो अपने मन की भाषा के लिए कुछ करना पड़ेगा। हालांकि देश की नई शिक्षा नीति में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को अहमियत दिए जाने के संकेत मिले हैं। कुछ स्रोतों के मुताबिक हाल के वर्षों में भारतीय सेना के उच्च पदस्थ अधिकारियों के पारस्परिक पत्र-व्यवहार में भी हिंदी को बढ़ावा दिया जा रहा है।