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उंगलियों की भाषा

Sat, 18 Oct 2014 08:31 PM IST
भवेशचंद्र जायसवाल
भवेशचंद्र जायसवाल Updated Sat, 18 Oct 2014 08:31 PM IST
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hindi poem ungaliyon ki bhasha.

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मुट्ठी जब खुलती है
उग आती हैं तर्क की उंगलियां
उंगलियों पर चलता है
जोड़ना घटाना
जब तर्कातीत हो जाती है बहस
उंगलियां आकाश की ओर उठने लगती हैं
गरमाने लगती है हवा
जन्म देती हैं वे
आवेश भरे शब्दों को
...और हम
मुट्ठी में हवा!

.....................................................................

नाखून बढ़ रहे हैं


अनवरत बढ़ रहे हैं नाखून चुपके-चुपके
कसी मुट्ठियां
ढीली हो रही हैं
हम यत्न करते हैं
उन उभरे हुए नाखूनों को काटने का
और कभी कसने का
इन मुट्ठियों को
निश्चिंतता की सीमा तक
नाखून काटने और
मुट्ठियां कसने का
चलता रहा है यों ही सिलसिला अरक्षित
दिन कालचक्र से पराजित
मिती, तिथि, सम्वत्
सब नष्ट होते रहे
नाखून बढ़ते ही जा रहे हैं अब भी
और हम बढ़ रहे हैं उनकी ओर
समेट कर
अपनी पूरी ताकत।
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