हिंदी की ताकत वही है जो हिंदुस्तान की है, लेकिन हिंदी को हिब्रू-सा गौरव कब मिलेगा?
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
हिंदी जो हमारी अस्मिता का बोध है; जो हमारी मातृभाषा है; जो हमारी सोच की रगों में लहू बनकर बहती है; जो हमारी आजीविका का साधन है; जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है, आखिर उसका दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाने का चोंचला क्यों? हिंदी तो इस देश की आत्मा है। फिर उसे सरकारी फाइलों से क्यों जूझना पड़ रहा है?
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
हिंदी जो हमारी अस्मिता का बोध है; जो हमारी मातृभाषा है; जो हमारी सोच की रगों में लहू बनकर बहती है; जो हमारी आजीविका का साधन है; जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है, आखिर उसका दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाने का चोंचला क्यों? हिंदी तो इस देश की आत्मा है। फिर उसे सरकारी फाइलों से क्यों जूझना पड़ रहा है?
दक्षिण पूर्व भूमध्य सागर के पूर्वी छोर पर एक देश है इस्राइल। इसके उत्तर में लेबनान, पूर्व में सीरिया और जॉर्डन तथा दक्षिण-पश्चिम में मिस्र है। 20 हजार वर्ग किमी के क्षेत्रफल वाला यह देश दुनिया भर में हमेशा सुर्खियों में बना रहता है। इस्राइल की स्थापना 14 मई, 1948 को हुई थी। इससे पहले इस नाम के किसी देश का कोई अस्तित्व नहीं था। यहूदियों पर उस्मान साम्राज्य राज करता था। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1917 में उस्मान साम्राज्य का पतन हो गया। अलग देश की मांग उठी और ब्रिटेन फलस्तीन पर राज करने लगा। अंग्रेजों ने बेलफोर्स घोषणा कर यहूदियों के लिए अलग देश की मांग का समर्थन किया।
ब्रिटिश राज ने संयुक्त राष्ट्र से यहूदी-फलस्तीन झगड़े का हल निकालने को कहा। संयुक्त राष्ट्र ने फलस्तीन को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला लिया। पहला हिस्सा यहूदियों को, दूसरा अरब को और तीसरा येरूशलम। अंग्रेजी राज खत्म होने पर इस्राइल ने खुद को आजाद देश घोषित किया। डेविड बेन-गुरियन इस्राइल के संस्थापक और पहले प्रधानमंत्री थे। वह एक कट्टर यहूदी राष्ट्रवादी थे। उनकी भाषा हिब्रू करीब 3,000 साल पुरानी थी। पर संस्कृत की तरह वह मृत भाषा हो गई थी। प्रधानमंत्री बनते ही गुरियन ने अपने सहयोगियों से पूछा कि अगर हिब्रू को राजभाषा बनाना हो, तो कितना वक्त लगेगा? अफसरों ने कहा, वक्त लगेगा। गुरियन ने कहा, कल सुबह से हिब्रू इस देश की राजभाषा होगी। दूसरे रोज सुबह हिब्रू को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। अरबी को विशेष भाषा के दर्जे के साथ।
आज हिब्रू इस्राइल की सरकार, वाणिज्य, अदालत, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इस्तेमाल की जाने वाली आधिकारिक भाषा है। 90 लाख से अधिक लोग हिब्रू बोलते हैं, जिनमें से अधिकतर की यह मातृभाषा है। हिब्रू के इस्राइल की राजभाषा बनने की कहानी प्रखर राष्ट्रवाद और दृढ़ इच्छाशक्ति की कहानी है। अब यहां से अपने देश की सीमा में प्रवेश करते हैं।
आज हिंदी देश के एक बड़े हिस्से के संवाद की भाषा है। भौगोलिक विविधताओं के बावजूद हिंदी का संसार बेहद व्यापक है। हिंदी ने न तो किसी भाषा का विरोध किया, न किसी से टकराई, न ही बगावत की। सभी को अपने भीतर समाहित करती गई। हिंदी की ताकत वही है जो हिंदुस्तान की है।
एक बड़ा सच यह है कि कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का बीड़ा हिंदीभाषी नेताओं ने नहीं, बल्कि महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ, सी. राजगोपालाचारी और सुभाष चंद्र बोस सरीखे गैर-हिंदी भाषी नेताओं ने उठाया था। ये सभी हिंदी की ताकत से वाकिफ थे।
भाषा का भविष्य इस्तेमाल करने वालों के चरित्र और पुरुषार्थ से भी जुड़ा होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दुनिया में हिंदी की प्रसिद्धि का तात्कालिक कारण हैं। संस्कृत अपने समय की कालजयी भाषा रही। मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा का काल 500 ई. पू. से 1,000 ई. के बीच है। इसमें पालि, प्राकृत, अपभ्रंश का भी हिस्सा है। भगवान बुद्ध के सारे उपदेश पालि में ही हैं जबकि भगवान महावीर के सारे उपदेश प्राकृत में हैं। मगर हिंदी इन सभी के बीच का पुल बन चुकी है। हिंदी में संस्कृत भी घुली हुई है। पालि भी। प्राकृत, अपभ्रंश और यहां तक उर्दू और अंग्रेजी भी। संपूर्ण विश्व में इतनी उदार भाषा कहीं नहीं मिलेगी, जो आने वाले हर मेहमान का गले लगाकर स्वागत करती हो। ऐसी हिंदी को किसी दिवस विशेष की सीमा में बांधा जा सकता है क्या?
हमें हिंदी को अपने गर्व की भाषा बनाना होगा। इसे राष्ट्र की भाषा बनाना होगा। हिंदी जिस भी रोज, राष्ट्र भाषा के सिंहासन पर सुशोभित हो हमारा गर्व बन जाएगी, हम वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र हो जाएंगे। हमारी, बोली, भाषा, विचार, चेतना सब पर हिंदी का कर्ज है। इस कर्ज को उतारे बगैर हम कभी मुक्त नहीं हो सकते। तुलसीदास जी कह गए हैं, पराधीन सपनेहु सुख नाहि। सत्य बस इतना ही है कि देह के पराधीनों को सपने में भी सुख नसीब नहीं हो सकता है और भाषा के पराधीनों को जन्मों में भी नहीं।