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सात समंदर पार हिंदी की राजनीतिक गूंज, अमेरिकी चुनाव में हिंदी नारे

Sat, 24 Oct 2020 04:45 AM IST
उमेश चतुर्वेदी उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Published by: उमेश चतुर्वेदी Updated Sat, 24 Oct 2020 04:45 AM IST
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Hindi impact across the world, Hindi slogans in US elections
US Election 2020 - फोटो : amar ujala

कुछ साल पहले तक शायद ही किसी ने सोचा होगा कि सात समंदर पार उस अमेरिकी धरती पर भारत के भाल की बिंदी चमक उठेगी, जिसे खुद उसके ही देश में कुछ साल पहले तक किनारे रखने की तमाम राजनीतिक कोशिशें होती रही हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव कुछ दिनों की बात है। लेकिन घोर अंग्रेजीदां माहौल के बीच वहां के चुनावों में हिंदी चमक रही है। मौजूदा अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुकाबले चुनाव मैदान में उतरे डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन न सिर्फ हिंदी में वोट मांगने लगे हैं, बल्कि उनका चुनाव अभियान भी हिंदी में चल रहा है। बिडेन के समर्थन में हिंदी में जो नारे लग रहे हैं, वैसे ठेठ हिंदी नारे भारतीय भूमि के चुनावी माहौल की पहचान रहे हैं। बिडेन के समर्थन में नारे लग रहे हैं, 'ट्रंप हटाओ, अमेरिका बचाओ’, ‘अमेरिका का नेता कैसा हो, जो बिडेन जैसा हो।’


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यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिकी चुनाव में हिंदी में नारे लग रहे हैं या फिर हिंदी में चुनावी अभियान चल रहे हैं। चार साल पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब चुनावी मैदान में थे, तब उन्होंने भी 2014 के नरेंद्र मोदी के समर्थक नारे जैसा नारा खुद लगाया था, ‘अबकी बार ट्रंप सरकार..’ उनकी ओर से भी इस बार हिंदी में कुछ नारे लग रहे हैं, कुछ चुनाव अभियान चल भी रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इस बार डेमोक्रेट उम्मीदवार बिडेन के अभियान की हो रही है। इसकी वजह यह है कि पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में किसी उम्मीदवार के समर्थन में ठेठ भारतीय अंदाज में हिंदी नारे लग रहे हैं। मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका की स्थिति दुनिया के सबसे ताकतवर देश की है। उसके मुखिया को विश्व का सबसे ताकतवर इंसान माना जाता है। 

उसके चुनाव में अगर हिंदी गूंज रही है, तो इसकी वजह अमेरिकी धरती पर हिंदी वालों की ताकत है। अमेरिकी धरती पर हर भारतीय, यहां तक कि एक हद तक पाकिस्तानी और बांग्लादेशी भी हिंदीवाला ही है। देश की सीमाओं के पार हर हिंदुस्तानी की पहचान हिंदी वाले के ही तौर पर है। चाहे वह सीमा के इस पार का हो या उस पार का। अमेरिकी वोटरों में भारतीय मूल के लोगों की संख्या करीब 15 लाख है। यह मोटा आंकड़ा ही है कि दुनिया की सर्वशक्तिमान कुर्सी पर काबिज होने की कोशिश करने वाली शख्सियत को हिंदी राग गाना पड़ रहा है। 

याद कीजिए साल 2010 की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा को। आठ नवंबर, 2010 को संसद को संबोधित करते वक्त उन्होंने भाषण की शुरुआत ‘नमस्ते’ और अंत ‘जयहिंद’ से की थी। इस दौरान उन्होंने विवेकानंद और महात्मा गांधी का भी नाम लिया था। इसके पहले दिल्ली के सीरीफोर्ट ऑडिटोरियम में छात्रों को संबोधित करते वक्त उन्होंने एक हिंदी फिल्म के मशहूर संवाद की तर्ज पर, 'सेनोरिटा, बड़े बड़े देशों..आप मेरे कहने का मतलब जानते हैं।' कह कर चौंका दिया था। चूंकि भारतीय लोगों ने अब आर्थिक ताकत भी हासिल कर ली है। आज का दौर सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, आर्थिक ताकत का दौर भी है, यही वजह है कि अब सात समंदर पार में भी हिंदी की धुन सुनाई दे रही है। 

हिंदी को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का स्नेह इस साल फरवरी में भी दिखा। जब 24 फरवरी को ट्रंप भारत आए थे, तो उन्होंने तड़ातड़ तीन ट्वीट हिंदी में किए थे। उन्होंने अपने आखिरी ट्वीट में लिखा था, ‘अमेरिका और भारत अपने देशों को मजबूत बनाएंगे, अपने लोगों को संपन्न बनाएंगे, बड़े सपने देखने वालों को और बड़ा बनाएंगे और अपना भविष्य पहले से कहीं अधिक उज्ज्वल बनाएंगे... और यह तो शुरुआत ही है।' हिंदी की गूंज पिछले साल दिसंबर में हुए ब्रिटेन के आम चुनावों में भी सुनाई दी थी, जब प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के चुनाव प्रचार में हिंदी फिल्मी गीतों का सहारा लिया गया था। यह कम दुर्भाग्यजनक नहीं है कि सात समंदर पार तो हिंदी राजनीतिक संवाद का माध्यम बन रही है, लेकिन अपने ही देश में अब भी यह नीति निर्माण और प्रशासन की सही मायने में भाषा नहीं बन पाई है। जब तक अपने यहां ऐसा बदलाव नहीं हो पाता, दुनिया की हस्तियां भले ही हमसे हमारी भाषा में संवाद के लिए आगे बढ़ती रहें, वैश्विक पटल पर बड़ी राजनीतिक हैसियत हासिल कर पाना हमारे लिए आसान नहीं होगा।

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