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हिंदी का भी एक दिन, जगदीश उपासने से जानिए भाषा कैसे सबको जोड़ती है..
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Hindi Diwas
दुनिया में हिंदी के अतिरिक्त और ऐसी कौन-सी भाषा है, जिसका वर्ष में कोई एक विशिष्ट दिवस मनाया जाता है? 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इतना ही नहीं, 2006 के बाद से तो हर वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस भी मनाया जाता है। वर्ष 1975 से विश्व हिंदी सम्मेलन भी किए जाते हैं। क्या हिंदी कोई नवजात भाषा है, जिसका ‘दिवस’ मनाकर उसका लालन-पोषण किया जाए?
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अंग्रेजी और चीनी (मंडारिन) के बाद हिंदी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है; भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार, 53 करोड़ लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं; इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 42 प्रतिशत भारतीयों को या तो अपनी भाषा में या फिर हिंदी में सामग्री चाहिए; हिंदी की उंगली पकड़कर गूगल समूचे हिंदी विश्व को साधने में जुटा है।
विश्व के 40 से अधिक देशों की 600 से अधिक संस्थाओं, विद्यालयों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है; अमेरिका के येल विश्वविद्यालय में तो 1815 से ही हिंदी-हिंदुस्तानी पढ़ाई जाती है; इसी तरह जापान में टोक्यो के विश्वविद्यालय में एक सौ साल से हिंदी का अध्यापन होता है; पूर्व सोवियत संघ के विभिन्न देशों, समूचे यूरोप के विश्वविद्यालयों में दशकों से हिंदी का अध्यापन होता है।
रूस में हिंदी की साहित्यिक पुस्तकों का अनुवाद सबसे अधिक संख्या में हुआ है; सारे विकसित विश्व के लिए हिंदी आज बाजार की भाषा है; मॉरिशस, त्रिनिदाद, टोबैगो, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम, फिजी में बसे भारतवंशी हिंदी की विरासत को आगे बढ़ा रहे है; फिजी में तो हिंदी को आधिकारिक रूप से भाषा का दर्जा मिला हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र न्यूज हिंदी में रेडियो बुलेटिन प्रसारित करने लगा है और संयुक्त राष्ट्र ट्विटर, फेसबुक तथा इंस्टाग्राम पर सोशल मीडिया कंटेंट हिंदी में भी पोस्ट करता है; भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की कोशिश भी कर रही है।
देश-विदेश में इतने व्यापक प्रभाव वाली हिंदी विश्व में अपनी धमक बढ़ाने और इसमें रुचि रखने वाले अधिक से अधिक लोगों को शिक्षित-दीक्षित करने के लिए प्रयास करे, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। आखिर चीन अपनी भाषा सीखने के इच्छुकों को हर तरह की सुविधा देता है; अमेरिकी नेताओं ने अमेरिकन अंग्रेजी का राजकाज और व्यापार में प्रभाव बढ़ाने के लिए तरह-तरह के जतन किए हैं।
लेकिन हिंदी को अपनी धरती पर ही अपना नगाड़ा क्यों बजाना पड़ता है? कारण यह कि अंग्रेजी के प्रभुत्व के सामने हिंदी सरकार, प्रशासन, उद्योग-व्यापार आदि में अब भी दरिद्र ही है। अंग्रेजी बोलना एक अभिजात गुण है और अंग्रेजों ने अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा-संस्कारों के माध्यम से अंग्रेजों की तरह सोचने-व्यवहार करने वाला, भारत के गौरवशाली अतीत, देशज संस्कृति, सभ्यता, आचार-विचार, भारत की समृद्ध ज्ञान-विज्ञान परंपरा, सैनिक शक्ति, साहित्य, कला, पुरातत्व आदि को हेय मानने वाला जो वर्ग तैयार किया।
वह न केवल फल-फूल रहा है, बल्कि पहले की तरह संगठित रूप से शासन-प्रशासन, शिक्षा, उद्योग-व्यापार-धंधों, सब जगह भारत को हांक रहा है। यद्यपि हिंदी को राजभाषा बनाया गया, तथापि स्वयं डॉ. आंबेडकर समेत संविधान सभा के आधे सदस्य संस्कृत को राजभाषा बनाने के पक्षधर थे।
अनुच्छेद 343 में यह भी वर्णित है कि अंग्रेजी को चरणबद्ध कार्यक्रम से 15 वर्षों के भीतर हटाया जाएगा। पर ऐसा हुआ नहीं और निकट भविष्य में इसकी संभावना भी नहीं दिखती। हालांकि नई शिक्षा नीति ने सरकारी और निजी, दोनों तरह के स्कूलों में ग्रेड 5 और ग्रेड 8 या उससे आगे भी मातृभाषा, घर में बोली जाने वाली, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा की वकालत की है।
पर स्कूली शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा में इतनी जल्दी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा या हिंदी में शिक्षा की व्यवस्था करने में काफी समय, तैयारी, परिश्रम और शासनकर्ताओं की मजबूत इच्छाशक्ति की ज़रूरत होगी।
अंग्रेजों की विरासत को ढोने वाले वर्ग का तर्क है कि अंग्रेजी विश्व स्तर पर न केवल राजकाज, बल्कि उच्च शिक्षा-शोध, प्रौद्योगिकी-तकनीकी, उद्योग-व्यापार की भी भाषा है। लेकिन आईआईटी, कानपुर और टेक्सस यूनिवर्सिटी में पढ़े तथा माइक्रोसॉफ्ट में इंजीनियरिंग और प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके संक्रांत सानु ने अपनी किताब अंग्रेजी माध्यम का भ्रमजाल में इस धारणा को खंडित करने वाले अनेक तथ्य उद्धृत किए हैं, जैसे दुनिया में मूल अंग्रेजी भाषी वर्ग सिर्फ 5.1 प्रतिशत है जबकि अन्य अंग्रेजी भाषी 3.9 फीसदी। विश्व की 91.5 जनसंख्या गैर-अंग्रेजी भाषी है।
अंग्रेजी में उच्च शिक्षा वाले अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को छोड़ दें, तो रूस, चीन, जापान, कोरिया समेत विश्व के बाकी सारे देश अपनी भाषा में उच्च शिक्षा देते हैं, इन सभी देशों में प्रौद्योगिकी-तकनीकी की भी भाषा उनकी अपनी भाषा है।
उद्योग-व्यापार की बात करें, तो एशिया की प्रमुख 1,000 कंपनियों में से 792 कोरिया, जापान और चीन की है। सानु ने इस संदर्भ में केन्या के लोकप्रिय लेखक न्गुगी वा थ्योंगो की मशहूर पुस्तक डिकोलोनाइजिंग द माइंड का जिक्र किया है। थ्योंगो ने पर-भाषा के साथ आने वाली संस्कृति और उसके प्रभाव की चर्चा की है।
वह लिखते हैं, ... (भाषा का)... सांस्कृतिक बम सबसे बड़ा शस्त्र है... यह लोगों का नाम, भाषा, वातावरण, संघर्ष, परंपरा, एकता, क्षमता, और अपना अपनत्व सब कुछ समाप्त कर देता है... यह उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा देता है, जहां उन्हें अपने अतीत की उपलब्धियां बंजर भूमि जैसी दिखती हैं... जिससे वे दूरी बनाने को प्रेरित होते हैं।
सर्वस्व हारने की यह स्थिति उन्हें नई और भिन्न पहचान देती है, जैसे अपनी भाषा के बजाय दूसरों की भाषा से जुड़ जाना...। भाषा और संस्कृति के अंतर्निहित संबंधों तथा किसी अन्य देश, उसकी भाषा और संस्कृति पर उसके प्रभाव-कुप्रभाव पर काफी अध्ययन हुए हैं। भारत में हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के बजाय अंग्रेजी की वकालत करने वालों को आज शायद ये अध्ययन-शोध पढ़ाए जाने की जरूरत है।