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14 सितंबर: हिंदी पट्टी से बाहर निकलती हिंदी, बन गई है पिछड़े समूहों के सशक्तीकरण की भाषा

Thu, 14 Sep 2023 06:46 AM IST
Badri Narayan बद्री नारायण
Updated Thu, 14 Sep 2023 06:46 AM IST
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सार
औपनिवेशिक काल से हिंदी की जो यात्रा प्रारंभ हुई, वह लगातार प्रभावी होती गई है। आजादी के बाद के करीब साढ़े सात दशकों में हिंदी स्वयं प्रभावी तो हुई ही है, इसने हिंदी समाज के अनेक सामाजिक-समूहों को भी शक्तिवान बनाया है।
 
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Hindi coming out of the Hindi belt, has become the language of empowerment of backward groups
विश्व हिंदी दिवस 2023 - फोटो : amar ujala

विस्तार

हिंदी समाज को प्रायः हिंदी पट्टी का समाज मान लिया जाता है। किंतु आज इसका दायरा हिंदी भाषी राज्यों की सीमा से ज्यादा व्यापक हो, पूरे देश में फैलता जा रहा है। इसमें बाजार, विज्ञापन और बॉलीवुड के फिल्मों की भूमिका तो है ही, हिंदी भाषी जनता का सतत प्रवासन भी इसके विस्तार का एक महत्वपूर्ण कारण है। प्रवासियों के साथ हिंदी न केवल उत्तर-दक्षिण, पूरब, पश्चिम हर ओर फैली है, वरन यूरोप, अमेरिका और लैटिन अमेरिका के अनेक मुल्कों में ‘हिंदी डायस्पोरा‘ मजबूत हुआ है।



औपनिवेशिक काल से हिंदी की जो यात्रा प्रारंभ हुई, वह लगातार प्रभावी होती गई है। आजादी के बाद के करीब साढ़े सात दशकों में हिंदी स्वयं प्रभावी तो हुई ही है, इसने हिंदी समाज के अनेक सामाजिक-समूहों को भी शक्तिवान बनाया है। मैं हिंदी का कवि हूं एवं अंग्रेजी तथा हिंदी, दोनों भाषाओं में लिखने वाला समाज विज्ञानी। यहां मैं अपने कुछ अनुभवों से हिंदी के इस बढ़ते प्रभाव की कथा कहूंगा।


हिंदी का कवि होने के नाते मैं साहित्य अकादेमी एवं अन्य संस्थाओं द्वारा आयोजित बहुभाषायी काव्य पाठों में शामिल होता रहता हूं। इन बहुभाषायी काव्य पाठों में अन्य भारतीय भाषाओं के कवियों को अपनी कविताएं अपनी भाषा में प्रस्तुत करने के साथ ही उनका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद भी प्रस्तुत करना होता है। मुझे यह महसूस कर खुशी होती है कि हिंदी के कवियों को अपनी कविताओं का अनुवाद पढ़ने की बाध्यता नहीं होती। श्रोता समूह हिंदी में ही उसे समझ लेता है। अभी हाल ही में साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित ‘उन्मेषा’ अंतरराष्ट्रीय फेस्टिवल में आयरलैंड और दक्षिण एशिया के कई मुल्कों के कवियों के साथ मुझे कविता पढ़नी थी। मुझे खुशी हुई कि अपनी कविताओं का अनुवाद मुझे नहीं पढ़ना पड़ा।

आज से बीस-पच्चीस साल पहले बड़े इतिहासकार, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री हिंदी में लिखने से कतराते थे, किंतु आज उनमें से ज्यादातर हिंदी में लिखने के लिए उत्सुक रहते हैं। वे आज इसके लिए खुद पैरवी करने लगे हैं। एक समय था कि हिंदी में सामाजिक चिंतन एवं शोधों पर लिखने की जगह साहित्यिक पत्रिकाएं ही थीं, किंतु अब अंग्रेजी के वर्चस्व वाले शोध संस्थानों से भी प्रतिमान, सामाजिकी, सामाजिक विमर्श जैसी उत्कृष्ट शोध पत्रिकाएं निकलने लगी हैं। मैं इसे भारतीय बौद्धिक मानसिकता में एक बड़े बदलाव के रूप में देखता हूं।

यह जानना भी रोचक है कि हिंदी आज सिर्फ हिंदी भाषी राज्यों के ‘मध्यवर्ग‘ की भाषा नहीं रह गई है। यह दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक एवं सीमांत पर बसे अनेक ग्रामीण समुदायों में फैली है। इस प्रक्रिया में हिंदी तो प्रभावी हुई ही है, इसने सीमांत पर बसे अनेक समुदायों के शिक्षित एवं साक्षर वर्गों को प्रभावी भी बनाया है। आज अगर हिंदी अखबारों, पत्रिकाओं एवं किताबों के पाठकों के प्रोफाइल का अध्ययन करें, तो यह जानकर खुशी होगी कि इसमें बड़ी संख्या में सीमांत पर बसने वाले समुदाय शामिल हुए हैं। यह ठीक है कि इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में साक्षरता एवं शिक्षा के प्रसार की बड़ी भूमिका रही है, किंतु धीरे-धीरे हिंदी मात्र स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालय की चारदीवारी के भीतर रहने वाली भाषा न होकर गांवों, कस्बों, जिलों, शहरों, बाजारों से होते हुए ‘एक शक्तिवान पब्लिक स्पेयर’में बदल गई है।

हिंदी एक प्रकार से आज की जनभाषा है। यह आज न केवल ‘शहरी मध्यवर्ग’ की, बल्कि उपेक्षित एवं पिछड़े समूहों के सशक्तीकरण की भी भाषा बन गई है। शिक्षा की परिधि में समाज का एक बड़ा तबका शामिल हुआ है। सीमांत पर बसे समुदायों को दिए जाने वाले आरक्षण एवं अन्य समाजों में भी एक आकांक्षी समुदाय का निर्माण पिछले दशक में हुआ है। इस आकांक्षी समुदाय में विकसित होती आगे बढ़ने की आकांक्षा उसे स्कूल, कॉलेजों तक ले गई है। इन स्कूल, कॉलेजों ने उन्हें हिंदी से जोड़ा, फिर उनके माध्यम से हिंदी उनके घर-परिवार तक पहुंच कर उनके दैनंदिन जीवन की भाषा बनती गई है।

हिंदी ने झारखंड से लेकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर भारत के अनेक राज्य, यहां तक कि जम्मू-कश्मीर तक की बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं के साथ एक लचीला सहकारी संबंध बनाते हुए अपने को प्रभावी बनाया है। यह जानना रोचक है कि इसने एक खास किस्म-‘मध्यवर्गीय मानस’ के इस भय को कम किया है कि हिंदी फैलेगी, तो बोलियां मर जाएंगी। बिहार एवं उत्तर प्रदेश के अनेक कॉलेजों में शिक्षकों को आप बोलियों के शब्दों एवं अंग्रेजी से भरी ‘हाइब्रिड हिंदी’ में बात करते सुन सकते हैं। हाइब्रिड हिंदी ही वह द्वार है, जिससे हिंदी समाज का हिंदी मानस शक्तिवान हुआ है।

हिंदी धीरे-धीरे सत्ता एवं प्रशासन की भाषा भी बनती जा रही है। पहले भले ही अधिकारी हिंदी में नोट्स एवं फाइलों पर टिप्पणियां ही लिखते थे, किंतु अपने अधिकारियों एवं मंत्रियों से अंग्रेजी में ही बातें करते थे। दिल्ली, लखनऊ, पटना, भोपाल के सचिवालयों में अंग्रेजी की ही ‘गिट-पिट’ या कहें, अनुगूंजें सुनाई पड़ती थीं, आज दिल्ली में बसे केंद्र सरकार के अनेक मंत्रालयों में मंत्रियों से लेकर दक्षिण भारतीय अधिकारी तक हिंदी में ही ब्रीफिंग देता सुनाई पड़ेगा।

भारतीय शासन एवं प्रशासन की कार्य पद्धतियों में आए इस नए मोड़ ने शासन के पास अपनी समस्याएं लेकर आने वाले लोगों के, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, या अंग्रेजी में बोलने में जो सहज महसूस नहीं करते थे, आत्मविश्वास को विकसित किया है, एवं सत्ता एवं प्रशासन से उनका संवाद सृजित किया है। इस कारण भारतीय समाज में राज्य एवं केंद्र द्वारा किए जा रहे विकास एवं समाज कल्याण के कार्यों की प्रक्रिया एवं परिणाम में जन सहभागिता बढ़ी है।

हिंदी क्षेत्र में हुए जिस ‘हिंदी पुनर्जागरण’ की चर्चा हिंदी के प्रसिद्ध चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने कभी की थी, वह हिंदी समाज में विकसित होती हुई आधार तल तक पहुंची है। हिंदी आज जनतांत्रिक ‘समावेशन’ की भाषा तो बनी ही है, बाबा साहेब आंबेडकर ने भारतीय जनतंत्र के राजनीतिक जनतंत्र से सामाजिक जनतंत्र के निर्माण की जो कामना की थी, हिंदी उस परावर्तन का एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरी है। हिंदी आज हिंदी पट्टी के समाज को बदल रही है, और हिंदी पट्टी का समाज भी रोज-रोज अपनी हिंदी गढ़ रहा है, जो लोक एवं समाज की बहुसंख्यक आबादी के मानस के करीब है।

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