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हिमाचल का सेब चाहिए या अमेरिका का?
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माल ढुलाई
- फोटो : a
यह कितना दिलचस्प है कि एक देश, जो इन वर्षों में दालों का प्रमुख आयातक रहा है, वह दालों का निर्यातक भी रहा है! दालों का निर्यात वास्तव में नवंबर, 2018 से बढ़ा है, जब सरकार ने दशकों से लागू कुछ नियंत्रण में ढील दी है। जहां दालों का आयात वर्ष 2018-2019 में 25 लाख टन तक गिर गया है, जो दो साल पहले 66 लाख टन के उच्च स्तर पर था, वहीं निर्यात 2018-19 में पांच लाख टन तक बढ़ गया है। केंद्र ने बंगाल के चना निर्यात के लिए सात फीसदी प्रोत्साहन की भी घोषणा की है।
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दुनिया भर के देशों में खाद्य व्यापार में एक ही उत्पाद का आयात और निर्यात, दोनों हो रहा है। भारत कोई अपवाद नहीं है। ब्रिटेन स्थित लोकल फ्यूचर समूह के अनुसार, कैलिफोर्निया उतने ही बादाम का आयात करता है, जितना निर्यात करता है। वर्ष 2007 में ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने 20 टन बोतलबंद पानी का कारोबार किया। इस अनावश्यक आयात-निर्यात का मौसमी खाद्य की कमी से कोई लेना-देना नहीं होता है, लेकिन ऐसा किया जाता है, क्योंकि इससे कृषि व्यवसाय करने वाली बड़ी कंपनियों को मुनाफा कमाने में मदद मिलती है।
सबसे बुरी बात यह है कि गैर सरकारी संगठन लोकल फ्यूचर्स के अनुसार, माल ढोने वाले हजारों जहाजों और दुनिया भर का चक्कर लगाने वाले विमानों द्वारा उत्सर्जित कार्बन को पेरिस जलवायु संधि में शामिल नहीं किया गया है। वर्ष 2012 में व्यावसायिक जहाजों द्वारा दस लाख टन से भी ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन किया गया, जो ब्राजील या कनाडा के उत्सर्जन से ज्यादा है।
मुझे याद है कि कुछ साल पहले वर्ष 1994 में मैंने ब्रिटेन स्थित सस्टेन द्वारा तैयार एक उत्कृष्ट रिपोर्ट फूड माइल्स पढ़ी थी। इसमें महाद्वीपों में भेजे गए खाद्य पदार्थों के खतरे के बारे में बताया गया था, जिसमें कहा गया था कि खाद्य पदार्थों का प्रसंस्करण और पैकेजिंग कहीं और होती है, तथा उसे फिर उसी देश को भेजा जाता है, जहां से इसकी शुरुआत हुई थी। आपकी थाली में पहुंचने से पहले खाद्य पदार्थ औसतन 3,000 मील की दूरी तय करता है। यह अपने आप में एक ऐसा चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन था, जिस पर उपभोक्ताओं और नीति निर्माताओं को पुनर्विचार करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उस रिपोर्ट को अद्यतन करके फिर से प्रकाशित किया गया है, अब भी गंभीरता से उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सुपरमार्केट खाद्य पदार्थों का दुनिया भर में व्यवसाय करने में अग्रगण्य हैं। वे न केवल सस्ते प्रसंस्करण का लाभ उठाते हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर तेल सब्सिडी का भी फायदा उठाते हैं और इस प्रक्रिया में होने वाले कार्बन उत्सर्जन से अनभिज्ञ बने रहते हैं। वैश्विक जीवाश्म तेल सब्सिडी प्रति वर्ष पचास खरब डॉलर को पार कर जाता है, जो व्यवसाय करने वाली इन कंपनियों को दुनिया भर में सस्ते खाद्य आपूर्ति में मदद करता है।
एक दूसरा उदाहरण लीजिए। ट्रेडक्राफ्ट कॉफी जिसे सेन्सबरी चेन अपने स्टोरों में बेचती है, वह तंजानिया के बुकोबा में उगाई जाती है। फिर कॉफी बीन्स 656 किलोमीटर की दूरी तय कर दार-एस-सलाम जाती है, जहां से इसे आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा भेजा जाता है। विजयवाड़ा दार-एस-सलाम से करीब 3,250 मील दूर है। विजयवाड़ा में कॉफी बीन्स को पैक किया जाता है। इसे फिर ब्रिटेन के साउथम्टन भेजा जाता है, जो करीब 5000 मील दूर है। साउथम्प्टन से यह लीड्स जाता है, जहां से इसे दुनिया भर के सेन्सबरी स्टोर्स में पुनः भेजा जाता है। मुझे यकीन है कि एक बार जब भारत में रिटेल में एफडीआई के लिए मंजूरी मिल जाएगी, तो सेन्सबरी को लीड्स से नई दिल्ली पैक कॉफी जहाज से भेजने में सुविधा होगी। मेरी समझ में कभी यह नहीं आया कि न्यूजीलैंड, चिली, फिजी से भारत में सेब को आयात करने की अनुमति क्यों दी गई, जबकि यहां हिमाचल प्रदेश और कश्मीर के सेब खरीदने वाला कोई नहीं है। इस समय भारत में 44 देशों से सेब का आयात होता है।
कुछ दशक पहले मैंने लिखा था कि कैसे पेप्सी इस्तेमाल की गई पीईटी बोतलों को, जिसका उपयोग शीतल पेय पैकिंग के लिए होता है, भारत के चेन्नई में रीसाइक्लिंग के लिए भेजती है। इन बोतलों को फिर से उपयोग के लिए अमेरिका भेज दिया जाएगा। बोतलों की रिसाइक्लिंग के लिए पेप्सी इसलिए इतने चक्कर लगाती है, क्योंकि प्लास्टिक कचरे की रिसाइक्लिंग की अनुमति अमेरिका में स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय कारणों से आसानी से नहीं मिलती है। इसको लेकर वहां बहुत सख्त कानून है, इससे लागत भी बढ़ती है। हाल ही में मुझे तब खुशी हुई, जब चीन ने 28 तरह के प्लास्टिक कचरों के आयात पर रोक लगा दी। भारत ने भी प्लास्टिक कचरे के आयात पर रोक लगाई है। यह तब हुआ, जब चीन द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद कचरा निर्यातकों की भारत में बाढ़ आ गई, और भारत ने जहरीले और गंदे कचरे के आयात पर रोक लगाने की जरूरत महसूस की।
क्या अब वह समय नहीं आ गया है कि हम अपनी अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति पर पुनर्विचार करें? मैं लंबे समय से कह रहा हूं कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और जलवायु वार्ताकार वास्तव में विपरीत उद्देशों के लिए काम कर रहे हैं। डब्ल्यूटीओ ऐसे व्यापार पर और जोर डाल रहा है, जबकि इससे होने वाले कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग पर पड़ने वाले असर पर उसका ध्यान नहीं है।
इसी तरह जलवायु वार्ताकार जलवायु नियंत्रक मानकों के रूप में ऐसे अवांछित व्यापार पर प्रतिबंध लगाने की बात नहीं करते हैं। इसका एक मात्र उपाय है कि दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की पागल दौड़ के बजाय स्थानीय बाजारों को लोकप्रिय बनाया जाए। इसमें उपभोक्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। उन उत्पादों के लालच से बचने की कोशिश करें, जो दूर कहीं प्रसंस्कृत होने का दावा करते हैं, जो आपके पड़ोस में उगाया जाता है। चिली या अमेरिका से प्रसंस्कृत नारंगी का जूस पीने के लिए क्यों जाएं, जब आपके स्थानीय बाजार में ताजा और स्वादिष्ट जूस उपलब्ध है? इस तरह का समझदार विकल्प अपनाने से आप कार्बन उत्सर्जन कम करने में छोटा ही सही, लेकिन प्रभावी भूमिका निभाएंगे।