Himachal Election Results: हिमाचल का संदेश, इसलिए मिली भाजपा को हार
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सत्ता-विरोधी रुझान, जयराम ठाकुर सरकार का निराशाजनक प्रदर्शन, आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमत, रोजगार की कमी से युवाओं का गुस्सा, नौकरशाही पर मुख्यमंत्री का अंकुश न होने और सर्वोपरि, पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की मांग अनसुनी करने से सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी का खामियाजा भाजपा को हिमाचल प्रदेश में भुगतना पड़ा। दूसरी ओर, हिमाचल की चुनावी जीत कांग्रेस के लिए संजीवनी की तरह है, जो आगामी विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में उसके लिए बूस्टर का काम कर सकती है। हिमाचल कांग्रेस में आपसी मतभेदों के अलावा चूंकि राहुल और सोनिया गांधी का चुनाव अभियानों में कोई योगदान नहीं था, ऐसे में, इस नतीजे का श्रेय सजग मतदाताओं को जाता है। हिमाचल का चुनाव जयराम ठाकुर के साथ भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल था, लेकिन दोनों ही इसमें विफल रहे। हालांकि जयराम ठाकुर का मंडी जिला भाजपा के साथ खड़ा रहा, जिससे वहां की 10 में से नौ सीटें भाजपा के खाते में गईं। कांगड़ा को इस पहाड़ी राज्य में सत्ता हासिल करने का द्वार माना जाता है, जहां 15 सीटें हैं। इनमें से 10 सीटें कांग्रेस ने जीती है, जबकि पिछले चुनाव में यहां से 11 सीटें जीतने वाली भाजपा तीन सीटों पर सिमट गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस राज्य से भावनात्मक जुड़ाव और उनकी ताबड़तोड़ चुनावी रैलियों के कारण भाजपा की इज्जत बच गई और उसकी सीटों की संख्या सम्मानजनक रही। दरअसल राज्य के फल उत्पादकों की नाराजगी की भारी कीमत भाजपा को चुकानी पड़ी है, जिनके बीच मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की छवि सेब विरोधी की बन गई थी। पूर्व बागवानी मंत्री मोहिंदर सिंह को भी फल उत्पादक लॉबी अपना विरोधी मानती आई थी, जबकि मोहिंदर सिंह ने इसका विरोध किया था। साफ है कि भाजपा हाईकमान राज्य के लोगों का मूड भांपने में विफल रही और उन्होंने मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष को बनाए रखा। अगर गुजरात और उत्तराखंड की तरह हाईकमान हिमाचल में भी बदलाव करता, तो शायद चुनावी नतीजा कुछ और हो सकता था। कुछ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, तो कुछ बेहद अयोग्य भी थे।
लेकिन इस मोर्चे पर सुधार की कोई कोशिश नहीं की गई। भाजपा के 11 मंत्रियों में से आठ का हारना ही उनकी अलोकप्रियता बताने के लिए काफी है। कांग्रेस ने यह चुनाव छह बार मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय वीरभद्र सिंह की छवि और लोकप्रियता के नाम पर लड़ा और किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया, जिसका उसे लाभ मिला। दूसरी बात यह कि कांग्रेस हाईकमान ने वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया, जिन्होंने राज्य की सभी 68 विधानसभा सीटों का दौरा किया। तीसरा यह कि हाईकमान ने हिमाचल में चुनाव अभियान और रणनीति की पूरी जिम्मेदारी प्रियंका वाड्रा को दी, जो आपसी मतभेदों पर अंकुश लगाने में सफल रहीं। चौथा यह कि पहले के राज्य प्रभारियों के विपरीत, जो हिमाचल को एक छोटी इकाई मानते थे, मौजूदा प्रभारी राजीव शुक्ल और उनके सचिवों ने आपसी झगड़ों को हतोत्साहित करते हुए राज्य का सघन दौरा किया। कांग्रेस के इस वादे ने भी मतदाताओं को आकर्षित किया कि सत्ता में आने पर पहली कैबिनेट बैठक में वह पुरानी पेंशन लागू करने के साथ एक लाख नौकरियां देने का फैसला लेगी।
सोनिया और राहुल गांधी हिमाचल के चुनाव अभियान में नहीं थे, जबकि वक्तृत्व कला में कुशल नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में मतदाताओं से जुड़ जाते थे। ऐसे में, प्रियंका वाड्रा ने अपने भाषणों में शिमला में अपना घर होने तथा इस पहाड़ी राज्य के प्रति दादी इंदिरा गांधी के लगाव का जिक्र किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाताओं और खासकर सरकारी नौकरीपेशा लोगों का सरकार से गुस्सा इतना ज्यादा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विशाल नेटवर्क और भाजपा का संसाधन भी उसके आगे नाकाफी साबित हुआ। अच्छी बात यह है कि जनादेश को स्वीकारते हुए जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ यह भी कहा है कि वह सरकार बनाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का विरोध करते हैं।
(-लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)