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गुड़हल की कीमत पर कैक्टस
यशवंत व्यास
Updated Sat, 16 Feb 2013 11:54 PM IST
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हमारे अपार्टमेंट में एक सोसायटी है। सोसायटी का जिम्मा है कि वह अपार्टमेंट के लोगों से पैसा वसूले और बदले में सुविधाओं का इंतजाम करे। सोसायटी सबकी है और सभी सोसायटी के हैं। इसलिए जो होता है अच्छे के लिए होता है।
सेक्रेटरी ने एक दिन गुड़हल का पेड़ उखाड़ दिया और सीमेंट से जमीन हमवार कर दी।
दो लोगों ने पूछा, लोग पेड़ लगवाते हैं, आप पेड़ उखड़वा रहे हैं? सेक्रेटरी ने कहा, इस पर मच्छर आते थे। मच्छरों की बस्ती कभी भी बुखार का आक्रमण कर सकती है। सभी निवासियों को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी था कि पेड़ हटवा देते। क्या आप चाहेंगे कि मच्छर आएं और फूल के सौंदर्य की चाहना में पेड़, परिवार को डेंगू या कोई और विश्वस्तरीय बीमारी दे जाएं? जाहिर है लोग गुड़ हो या हल, भोजन और खेती की प्राथमिकता के आधार पर ही चाहेंगे। दोनों ने प्रतिवाद छोड़ दिया।
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एक रविवार की सुबह उस सीमेंट के ऊपर गमला रखा मिला। गमले में कैक्टस था। कैक्टस में एक फूल था। फूल का सौंदर्य मारक था, लेकिन गुड़हल देखने वालों को यह फूल मुंह चिढ़ाता-सा जान पड़ा।
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वे दोनों सज्जन बाहर आए जो गुड़हल के कटने पर सेक्रेटरी से मच्छर संबंधी वक्तव्य ग्रहण कर चुके थे।
उन्होंने फिर सेक्रेटरी की तलाश की।
सेक्रेटरी नहीं मिला। सदस्य भी नहीं मिले।
बेचैनी बढ़ी तो गार्डरूम तक पहुंचे और तलाशा तो पता चला कि कल रात को ही सब वैष्णो देवी के दर्शन करने चले गए हैं।
यहां कैक्टस लगाकर वे पुण्य कमाने चले जाएं, इस पर दोनों को बहुत कष्ट हुआ। वे न गमला हटा सकते थे, न संघर्ष कर सकते थे। तीन दिन तक वे रोज सुबह कैक्टस को देखते, फूल को देखते, अपने आपको देखते और सेक्रेटरी को कोसते। चौथे दिन वे फिर मिले। आज कैक्टस का फूल भी झर गया था।
सेक्रेटरी श्रद्धा भाव से माता का प्रसाद लिए खड़ा था। ये भीतर उबल रहे थे, वह बाहर से निर्विकार था।
आदमी जब प्रसाद ले रहा होता है, तो प्रत्येक भाव को दबाकर पवित्र होने की प्रक्रिया आरंभ करने के फेर में पड़ा होता है। इन दोनों ने भी प्रसाद हाथ में लेते हुए कैक्टस को केंद्र में लाना कुछ क्षण स्थगित कर दिया।
पर सेक्रेटरी पवित्रता को छूकर महान बनकर लौटा था। उसने बगैर भूमिका बनाए स्वयं कहा, 'आह क्या कैक्टस है। मां की कृपा है कि यात्रा पूर्ण होते ही इसका फूल झर गया। श्रेष्ठतम क्वालिटी और उत्तम शगुन के मेल से यह कैक्टस सोसायटी की फिजा बदल देगा।'
वह चला गया लेकिन दोनों ने संघर्ष कई दिन तक चलाया। कैक्टस की कीमत पता की। सोसायटी से किया गया पेमेंट पता किया। जैसी कि उन्हें आशंका थी, जितने पैसे में वह कैक्टस खरीदा गया था, उतने में साल भर माली की तनख्वाह जा सकती थी। दो साल तक मच्छर मारने की दवा छिड़की जा सकती थी। दस गुड़हल के पेड़ उगाए जा सकते थे। बच्चों के लिए एक झूला लगाया जा सकता था।
उन्होंने दस्तावेज इकट्ठे किए। सबूत लाए। कितनी रकम किसने घूस में ली और सेक्रेटरी को कैसे क्लीन चिट दी। टेंडर और कैक्टस की क्वालिटी पर किसने 'ओ.के.' किया।
सोसायटी सदस्यों को उनकी ओर से नोटिस दिया गया है। नोटिस में यह भी बताया गया है कि कैक्टस जहां से खरीदा गया है, उस नर्सरी के तीन मालियों को निकाल दिया गया है, जिन्होंने घूसखोरी करके कैक्टस के सौदों में जमकर कमाया। इससे स्पष्ट होता है कि एक गुड़हल की बलि पर कैक्टस का मामला सोसायटी में भ्रष्टाचार का सीधा-सीधा प्रतीक बन गया है।
सोसायटी अपने स्तर पर इस नोटिस पर विचार कर रही है। उसने कुछ विकल्प चुने हैं-
1. भविष्य में लिए जाने वाले कैक्टस के सौदे रद्द कर दिए जाएं। इस कैक्टस के गमले को सेक्रेटरी से 'रिसेल' करने को कहा जाए और प्राप्त रकम सोसायटी को जमा करा दी जाए।
2. कैक्टस की गुणवत्ता पर कोई सवाल नहीं है। उसकी प्रजाति तो श्रेष्ठतम है, वर्ना इतने कैक्टस वह नर्सरी कैसे बेच पाती जिसके तीन-तीन माली इसके सौदों में एक्स्ट्रा कमा सकें।
3. कैक्टस वाली नर्सरी को ही एक चिट्ठी लिखकर जवाब मांगा जाए कि उसके यहां से किसने सोसायटी को कैक्टस बेचने में घूस दी?
4. एक जेपीसी बिठाई जाए। आखिर बोफोर्स प्रकरण के वक्त भी जेपीसी ने ही देखकर बताया था कि तोपों की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं है। गुणवत्ता महत्वपूर्ण है और उससे यदि कोई समझौता नहीं हुआ है, तो यह देखा जाना चाहिए कि पूरे मामले के बावजूद हमें वही कैक्टस, दूसरी सोसायटी के मुकाबले कम मूल्य में हासिल हुआ है, अतः सेक्रेटरी को विशेष उल्लेख क्यों न दिया जाए?
चारों विकल्पों पर विचार चल रहा है। सदस्यों का मानना है कि कॉमनवेल्थ घोटालों की उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि दिल्ली को ढेरों फ्लाईओवर तो मिल गए हैं और दिल्ली चमक गई है। यदि गुणवत्ता बढ़ानी है, तो भ्रष्टाचार की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना ही होगा।
कैक्टस नर्सरी को एक प्रतिनिधिमंडल भेजने पर भी विचार हो रहा है, लेकिन सोसायटी हैलीकॉप्टर घोटाले में जेपीसी की घोषणा तक प्रतीक्षा करना चाहती है। आखिर सरकार जो करेगी, सोसायटी वही तो कर सकती है।