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जब राहुल जी भावुक हो उठे
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 05 Oct 2012 09:56 PM IST
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महापंडित राहुल सांकृत्यायन ईश्वर और धर्म में विश्वास नहीं करते थे। वह प्रायः कहा करते थे कि विज्ञान ने ईश्वर को मार डाला है। उन्होंने काशी की संस्कृत पाठशाला में शिक्षा प्राप्त की थी। देश-विदेश का भ्रमण करने के बाद वह वर्षों बाद काशी आए, तो अस्सी घाट स्थित अपनी पुरानी पाठशाला पहुंचे। उन्होंने अपने एक पुराने साथी को आवाज दी, शंकर है?
एक प्रज्ञाचक्षु (नेत्रविहीन) ने आवाज सुनी, तो पहचान लिया कि यह केदार (राहुल जी का पुराना नाम) है। वह पाठशाला के कमरे से बाहर आए और स्नेह से राहुल जी का हाथ थामकर कहा, केदार, दुनिया घूम आए, कोई नई बात बताओ। राहुल जी बोले, नई बात यही है कि मैं दुनिया घूमकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ईश्वर मर गया है। उन्होंने राहुल जी के कंधे पर हाथ रखा और बोले, भाई केदार, मेरा अनुभव भी सुनो।
मैं आंखें और सहारा खोने के बाद काशी आया आश्रय पाने के लिए। मैं सोचता था कि मेरे जैसे नेत्रविहीन व्यक्ति का गुजारा कैसे होगा। एक रात मैंने देखा कि धनुष लिए हुए एक युवक कमरे के दरवाजे पर खड़ा है। वह निश्चय ही मेरे ईष्टदेव श्रीराम थे। अब तुम मेरे ईष्टदेव राम को नकारने का साहस मत करना। यह कहते हुए वह रो पड़े। राहुल जी भी भावुक व्यक्ति थे। उनकी आंखें सजल हो उठीं। वह बोले, मैं अब कभी तुम्हारी अनुभूति और आस्था को ठेस नहीं पहुंचाऊंगा।
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एक प्रज्ञाचक्षु (नेत्रविहीन) ने आवाज सुनी, तो पहचान लिया कि यह केदार (राहुल जी का पुराना नाम) है। वह पाठशाला के कमरे से बाहर आए और स्नेह से राहुल जी का हाथ थामकर कहा, केदार, दुनिया घूम आए, कोई नई बात बताओ। राहुल जी बोले, नई बात यही है कि मैं दुनिया घूमकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ईश्वर मर गया है। उन्होंने राहुल जी के कंधे पर हाथ रखा और बोले, भाई केदार, मेरा अनुभव भी सुनो।
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मैं आंखें और सहारा खोने के बाद काशी आया आश्रय पाने के लिए। मैं सोचता था कि मेरे जैसे नेत्रविहीन व्यक्ति का गुजारा कैसे होगा। एक रात मैंने देखा कि धनुष लिए हुए एक युवक कमरे के दरवाजे पर खड़ा है। वह निश्चय ही मेरे ईष्टदेव श्रीराम थे। अब तुम मेरे ईष्टदेव राम को नकारने का साहस मत करना। यह कहते हुए वह रो पड़े। राहुल जी भी भावुक व्यक्ति थे। उनकी आंखें सजल हो उठीं। वह बोले, मैं अब कभी तुम्हारी अनुभूति और आस्था को ठेस नहीं पहुंचाऊंगा।
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