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गलत कमाई से बुद्धि भ्रष्ट होती है

Wed, 07 Aug 2013 08:12 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Wed, 07 Aug 2013 08:12 PM IST
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Have gotten the wrong mind!

वड़ोदरा (गुजरात) के शेखड़ी गांव में संत रवि साहेब एक आश्रम में रहते थे। वह ग्रामीण बच्चों को पढ़ाते, रोगियों का इलाज जड़ी-बूटियों से करते, फिर जो समय बचता, उसमें ईश्वर की भक्ति किया करते थे। दूर-दूर से भक्तजन उनके सत्संग के लिए आया करते थे।

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उस क्षेत्र में कबाजी डाकू का आतंक था। एक दिन उसके हृदय में संत रवि साहेब के दर्शन की लालसा जगी। वह साधारण वेश में आश्रम पहुंचा और संत जी के मुख से भगवत भजन सुनकर आह्लादित हो उठा। संत को बीमार लोगों की सेवा करते देख उनके प्रति उसकी श्रद्धा और बढ़ गई। उसने निर्णय लिया कि वह संत जी का सत्संग किया करेगा।
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एक दिन कुछ संत कीर्तन करते हुए शेखड़ी की ओर जा रहे थे। कबाजी ने उन्हें देखा, तो समझ गया कि संत आश्रम जा रहे हैं। उसने सोचा कि इन संतों की सेवा के लिए भोजन और धन लेकर जाना चाहिए। वह मिठाई और धन लेकर आश्रम पहुंचा।
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संत ने पूछा, तू कौन है? कबाजी ने कहा, मैं कबाजी हूं। संत ने फिर कहा, कबाजी, तू अपराध कर्म से और निर्दोषों की हत्याकर धन इकट्ठा करता है। हम तेरे इस अपवित्र धन से बने भोजन को स्पर्श भी नहीं करेंगे। पापपूर्ण कमाई के भोजन से हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी।

संत के शब्दों ने ऐसा जादू किया कि कबाजी ने तलवार उनके चरणों में डाल दी और बोला, मैं लूटपाट नहीं करूंगा। संत जी ने उसे हृदय से लगा लिया।

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