उनके नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं
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कुछ सप्ताहों से मैं यह तय करती आई हूं कि इस सप्ताह किसी अच्छे विषय पर लिखूंगी। लेकिन जब मैं लिखने बैठती हूं, तो ऐसी कोई घटना घट जाती है, जिस कारण मैं उसी पर लिखने के लिए मजबूर हो जाती हूं। इस बार मेरा इरादा था कि त्योहारों के इस मौसम में मैं मोदी सरकार की उपलब्धियों के बारे में लिखूंगी। मगर जब मैं लिखने बैठी, तो मेरी आंखों के सामने उन दो मासूम बच्चों के चेहरे आए, जो बल्लभगढ़ के सुनपेड़ गांव में सिर्फ इसलिए जिंदा जला दिए गए, क्योंकि वे दलितों के घर में पैदा हुए थे। जब तक उनके पिता उठे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
ऐसा नहीं है कि इस तरह की बर्बर घटना इस देश में इससे पहले नहीं हुई है। यहां दलितों के साथ सदियों से अत्याचार होता आया है। लेकिन इस तरह की बर्बरता इन दिनों कुछ ज्यादा ही होने लगी है। ऐसी पहली घटना दादरी में हुई थी, जहां मोहम्मद इकलाख को इस बर्बरता से पीटा गया कि उसकी मौत हो गई। उसके बेटे को मार डालने की पूरी तैयारी थी। पूरा देश इस हादसे को भूल ही रहा था कि देश भर में गौकशी को लेकर हिंसा और हत्या की खबरें आने लगीं। ऊधमपुर में जाबिद बट्ट मारा गया, तो नेपाल की सीमा पर किसी और ट्रक को रोककर किसी दूसरे बेगुनाह मुस्लिम की जान ली गई। यह सारा कुछ अफवाहों की बुनियाद पर हुआ। अचानक जिस तेजी से देश का माहौल बिगड़ा है, वैसा बहुत दिनों से नहीं हुआ।
इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों हो रहा है। यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि तनाव फैलने के बाद भी प्रधानमंत्री मौन क्यों हैं। क्या वह नहीं जानते कि इससे सबसे ज्यादा बदनाम वह खुद हुए हैं? क्या वह नहीं जानते कि जब तक हिंसा और तनाव इस तरह फैलता रहेगा, तब तक परिवर्तन और विकास के उनके सपनों का साकार होना असंभव है? क्या वह नहीं जानते कि उनके नेतृत्व पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं? मोदी को पूर्ण बहुमत दिलाने वालों में वे लोग थे, जिन्हें उम्मीद थी कि वह वास्तव में परिवर्तन और विकास लाकर दिखाएंगे। अब यह उम्मीद थोड़ी कम हुई है। और उसकी वजह है, मोदी की तरफ से नेतृत्व का अभाव।
संकट की इस घड़ी में हिंसा और गुंडागर्दी दिन-ब-दिन फैल रही है। इससे बड़ी गुंडागर्दी और क्या हो सकती है कि जब कश्मीरी विधायक राशिद जाहिद बट्ट के परिजनों को लेकर दिल्ली में प्रेस क्लब में पहुंचे, तो उन पर स्याही फेंक दी गई? इससे बढ़कर गुंडागर्दी और क्या हो सकती है कि मुंबई में बीसीसीआई के दफ्तर में शिव सैनिकों की भीड़ पाकिस्तान के क्रिकेट अधिकारियों से अपना विरोध दर्ज कराने घुस आई थी?
जब भी भाजपा के प्रवक्ताओं से हिंसक घटनाओं के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब यही रहा है कि ये घटनाएं उन राज्यों में हुई हैं, जहां गैरभाजपा सरकारें हैं। उन मुख्यमंत्रियों से सवाल पूछिए, जहां ये घटनाएं घटीं, क्योंकि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी उनकी है। अब क्या कहेंगे ये प्रवक्ता, जब हरियाणा में दलित बच्चों को जलाया गया है, जहां भाजपा की सरकार है? महाराष्ट्र में हुई गुंडागर्दी पर वे क्या कहेंगे, जहां भाजपा की सरकार है? क्या अब प्रधानमंत्री से यह पूछना नहीं पड़ेगा कि तेरी रहबरी का सवाल है? वह रहबरी, वह नेतृत्व यदि जल्दी ही देखने को नहीं मिला, तो देशवासियों की उम्मीदें धूल में मिल जाएंगी।