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अगर आपके मूंछों के बाल भी ऐसे हैं तो आपको भी मिल सकता है धन
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
Updated Tue, 12 May 2015 04:48 PM IST
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प्रसिद्ध भक्त कवि नरसिंह मेहता अकिंचन थे। लेकिन विरोधाभास यह कि वह दानशील भी अद्भुत थे। कभी किसी याचक को निराश नहीं करते। एक बार वह किसी मेले में चुपचाप गए। वहां याचकों ने उन्हें घेर लिया, पर नरसिंह के पास धन नहीं था। नगर के साहूकार से उधार लेकर वह धन बांटने लगे। नरसिंह मेहता के ही गांव का एक व्यक्ति यह देख रहा था। वह आश्चर्यचकित था कि इस नगर में कौन साहूकार मिल गया? उसने नरसिंह मेहता से पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया, मूंछ का एक बाल गिरवी रखकर ऋण लाया हूं।
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वह व्यक्ति भी पहुंच गया साहूकार के पास, और बोला, सेठ जी, मुझे ऋण चाहिए। साहूकार ने जब अमानत के बारे में पूछा, तो वह छूटते ही बोला, मूंछ का बाल है मेरे पास। साहूकार ने कहा, ठीक है, लाओ, जरा जांच लूं। उस व्यक्ति ने अपनी मूंछ का एक बाल दे दिया।
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साहूकार ने बाल उलटा-पलटा और बारीकी से देखने के बाद कहा, बाल तो बांका है। उस व्यक्ति ने कहा, कोई बात नहीं, उसे फेंक दो। मैं दूसरा बाल देता हूं। साहूकार ने दूसरे बाल को भी टेढ़ा बताया। फिर उसने तीसरा बाल दिया, जिसे साहूकार ने फिर नकार दिया। वह व्यक्ति चौथा बाल खींचने ही जा रहा था कि साहूकार ने ॠण देने से मना कर दिया।
व्यक्ति ने रोष जताते हुए कहा, आपने नरसिंह मेहता को तो ऋण दिया था। साहूकार ने कहा, मैंने उनके बाल की भी इसी तरह परीक्षा की थी। जब मैंने उन्हें कहा कि यह बाल तो बांका है, नरसिंह मेहता ने जवाब दिया, बांका है, तो माका (मेरा) है।
सेठ बोले, वह बाल की परीक्षा नहीं, साहूकारी (निष्ठा) की परीक्षा थी। नरसिंह मेहता की नजर में हर बाल बेशकीमती था। प्रथम बाल को इज्जत देने का कारण उनकी निष्ठा थी। वह कर्ज लौटाने की जिम्मेदारी का दृढ़ निश्चय था।