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त्रिकोणीय मुकाबले की ओर गुजरात : राजनीतिक संभावनाओं के बीच कांटे की टक्कर और वोटबैंक में लगती सेंध का असर

Sat, 19 Nov 2022 08:28 AM IST
Neerja Chowdhary नीरजा चौधरी
Updated Sat, 19 Nov 2022 08:28 AM IST
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सार
यदि कांग्रेस हिमाचल जीत जाती है, तो निश्चित रूप से उसका मनोबल बढ़ेगा, राहुल की यात्रा और उनकी लीडरशिप को महत्व मिलेगा। लेकिन अगर कांग्रेस दोनों राज्यों में हार जाती है, तो यही संदेश जाएगा कि राहुल जो कर रहे हैं, वह अपनी जगह ठीक है।
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Gujarat Election towards triangular contest: close fight between political possibilities and vote bank
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

इन दिनों गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों की राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा जारी है। हिमाचल के मतदान तो संपन्न भी हो गए हैं और वहां मतगणना का इंतजार किया जा रहा है, जो आठ दिसंबर को गुजरात की मतगणना के साथ ही होगा। लेकिन गुजरात में अभी मतदान होना है और वहां विभिन्न राजनीतिक दल धुआंधार प्रचार में लगे हुए हैं। जहां तक हिमाचल प्रदेश की बात है, वहां कांटे की टक्कर है। 



जितने लोग वहां सत्ता परिवर्तन की बात कह रहे थे, उतने ही लोग भाजपा की दोबारा वापसी की बात कर रहे थे। भाजपा समर्थक स्थानीय मुद्दों पर बात न करके मोदी के नेतृत्व के नाम पर वोट देने की बात कह रहे थे। वे राज्य सरकार के कामकाज पर बात नहीं करते थे। बदलाव के इच्छुक लोग सेब उत्पादक किसानों की समस्याएं, लागत एवं जीएसटी बढ़ने, बेरोजगारी, महंगाई और पुरानी पेंशन बहाल करने का मुद्दा उठा रहे थे। 


सरकारी कर्मचारी, महिलाएं और युवा हिमाचल प्रदेश के चुनाव में निर्णायक होंगे। महिलाओं को लुभाने के लिए भाजपा एवं कांग्रेस, दोनों ने बढ़-चढ़कर वादे किए। लेकिन कांग्रेस के पास मजबूत संगठन नहीं है। हालांकि हिमाचल में तो फिर भी संगठन है, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार में संगठन नहीं है। इस कारण कांग्रेस अपने मतदाताओं को घर से बाहर निकालकर बूथ तक लाने और मतदान कराने के मामले में मात खा जाती है, जबकि भाजपा का संगठन बहुत मजबूत है। 

यों तो हिमाचल एक छोटा-सा राज्य है, जहां मात्र 68 सीटें हैं, लेकिन इस बार उसका महत्व बढ़ गया है, क्योंकि वहां जिसकी भी जीत होगी, उसके लिए मनोबल बढ़ाने का काम करेगा। अगर वहां कांग्रेस जीत जाती है, तो न केवल उसे एक और राज्य मिलेगा, बल्कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को भी इसका श्रेय मिलेगा। लेकिन अगर सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद भाजपा दोबारा सत्ता में वापस आती है, तो यह उसके लिए भी मनोबल बढ़ाने का काम करेगा। 

जहां तक गुजरात की बात है, तो वहां चुनाव जीतना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है, क्योंकि यह प्रधानमंत्री और गृहमंत्री, दोनों का गृह राज्य है। इस बार दोनों राज्यों में भाजपा की रणनीति चुनाव को तिकोना बनाने की रही। हालांकि हिमाचल प्रदेश में लगता नहीं कि ऐसा हो पाया, पर गुजरात में उसकी रणनीति यही है कि चुनाव को त्रिकोणीय बनाया जाए। और गुजरात का चुनाव त्रिकोणीय होता दिख भी रहा है। 

हाल ही में अमित शाह ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा कि गुजरात में मुख्य लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच है। वह चाहते हैं कि कांग्रेस थोड़ा दमखम दिखाए, इसकी मुख्य वजह है कि वह इस लड़ाई को तिकोना बनाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें मुख्य चुनौती आप से दिख रही है। जबकि कांग्रेस स्वयं कह रही है कि उसने गुजरात में बहुत दम नहीं लगाया, इसलिए स्थानीय कांग्रेसी नेता केंद्रीय नेतृत्व से बहुत नाराज हैं। 

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि गुजरात में आप को आरएसएस का समर्थन मिल रहा है, क्योंकि आरएसएस मोदी और अमित शाह की रणनीति से उदासीन है। इसमें कितना सच है, मुझे नहीं मालूम। लेकिन केजरीवाल जिस तरह से गुजरात चुनाव में अपनी प्रासंगिकता बनाते जा रहे हैं, उससे इसमें कुछ दम नजर आता है। चाहे हनुमान चालीसा हो, या चाहे नोटों पर लक्ष्मी-गणेश की फोटो छापने की उनकी मांग हो, चाहे बुजुर्ग लोगों को मुफ्त में तीर्थयात्रा कराने की बात हो, वह अपनी पार्टी को हिंदू समर्थक और काम करने वाली पार्टी के रूप में दिखाना चाह रहे हैं। 

केजरीवाल कांग्रेस के वोटबैंक में सेंध तो लगाना ही चाह रहे हैं, उनकी रणनीति भाजपा से नाराज हिंदुओं के वोटबैंक में भी सेंध लगाने की दिख रही है। इन सबके बावजूद यह निश्चित रूप से लग रहा है कि गुजरात में दोबारा भाजपा ही सत्ता में आएगी, क्योंकि भाजपा ने वहां सारी ताकत झोंक दी है। हालांकि आम आदमी पार्टी बहुत बढ़िया टक्कर देती दिख रही है, लेकिन कितनी सीटें जीत पाएगी, इसका पता नहीं है। हालांकि आप का वोट शेयर जरूर बढ़ेगा। 

बेशक 27 साल से सत्ता में रहने के कारण वहां सत्ता विरोधी रुझान स्वाभाविक है। लेकिन अंतिम क्षण में हमेशा नरेंद्र मोदी के मैदान में उतरने से स्थिति नाटकीय रूप से बदल जाती है, क्योंकि तमाम विरोध के बावजूद लोग नेतृत्व के सवाल पर भाजपा के पाले में चले जाते हैं। पिछली बार भी यही हुआ था। पिछली बार गुजरात में तीन युवा नेता-हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी भाजपा के खिलाफ मैदान में थे, जिन्होंने कांग्रेस के पक्ष में चुनाव का रुख मोड़ दिया था। 

लेकिन इस बार हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। यह कांग्रेस की सबसे बड़ी विफलता है कि युवा नेता आते हैं, साथ में रहते हैं, लेकिन पार्टी उसका सही उपयोग नहीं कर पाती है। अभी जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस में हैं, लेकिन दलित नेता होने के नाते उनका इस्तेमाल सिर्फ गुजरात ही नहीं, देश भर में होना चाहिए था। वह युवा नेता है, जो दलितों को फिर से कांग्रेस की तरफ मोड़ सकते हैं। 

इस बीच दिल्ली में भी एमसीडी के चुनाव की घोषणा हो चुकी है, जो आम आदमी पार्टी का ध्यान गुजरात से हटाने की रणनीति लगती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अगर भाजपा कोई एक राज्य हार जाती है, तो यह उसके लिए बड़ा झटका होगा और गुजरात में वह पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन नहीं करती है, तो साफ है कि उसके प्रति जनता का समर्थन धीरे-धीरे घट रहा है। 

यदि कांग्रेस हिमाचल जीत जाती है, तो निश्चित रूप से उसका मनोबल बढ़ेगा, राहुल की यात्रा और उनकी लीडरशिप को महत्व मिलेगा। लेकिन अगर कांग्रेस दोनों राज्यों में हार जाती है, तो यही संदेश जाएगा कि राहुल जो कर रहे हैं, वह अपनी जगह ठीक है, पर वह पार्टी को जिता नहीं पा रहे हैं। दूसरी तरफ, अगर भाजपा दोनों राज्यों में चुनाव जीत जाती है, तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर फिर से सफलता की मुहर लग जाएगी। 

अगर आप गुजरात में चुनाव नहीं भी जीतती है, लेकिन यदि उसके वोट शेयर और सीटें बढ़ती हैं, तो उससे जनता में यही संदेश जाएगा कि यह भविष्य की पार्टी है, जो धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है और एक न एक दिन भाजपा का विकल्प बनेगी।

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