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बीमारी में भी हो आय की गारंटी

Wed, 28 Sep 2016 07:28 PM IST
नारायण कृष्णमूर्ति
नारायण कृष्णमूर्ति Updated Wed, 28 Sep 2016 07:28 PM IST
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Guaranteed income even in illness
नारायण कृष्णमूर्ति

हमारे देश की हर सरकारों ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं, जिन्होंने अपनी स्थायी छाप छोड़ी है। मनरेगा, सबके लिए घर, स्वच्छ भारत अभियान, कृषि ऋण माफी और जन-धन-यह सूची काफी लंबी हो सकती है। इन सभी कदमों का उद्देश्य हर नागरिक का आर्थिक उत्थान करना है।

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फिर भी हर बार स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सामने आती हैं। इन कार्यक्रमों में ऐसा कुछ नहीं है, जो लोगों, खासकर निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए आर्थिक रूप से सोचे। तर्क दिया जाता है कि केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य संबंधी कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, लेकिन ऐसे समय में अगर आप अस्पतालों का दौरा करें, तो उदासीनता साफ नजर आती है।
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इस समय सरकार द्वारा विभिन्न तरह के स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, मसलन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, कर्मचारी राज्य बीमा योजना, केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना, आम आदमी बीमा योजना, जनश्री बीमा योजना और सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा योजना। इनके अलावा व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा तो है ही। ये सभी योजनाएं एक मरीज के इलाज और उस पर होने वाले खर्च को उठाने के लिए उपलब्ध हैं। इलाज का खर्च जिस तेजी से बढ़ता जा रहा है, उसे देखते हुए यह अद्भुत प्रयास है।
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राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) की शुरुआत श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में लाने के लिए की गई थी। इस योजना का उद्देश्य गरीबों को बीमारी के कारण अस्पताल के खर्च के बोझ से सुरक्षा प्रदान करना है। इस योजना के लाभार्थी अधिकांश बीमारियों में अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में 30 हजार रुपये तक का अस्पताल खर्च हासिल कर सकते हैं। स्वाभाविक रूप से यह योजना निम्न आय वर्ग के नागरिकों के कल्याण के लिए है।

आरएसबीवाई के तहत सरकार ने अस्पतालों के लिए ज्यादातर मामलों में पैकेज रेट तय कर दिया है। पहले दिन से ही पूर्ववर्ती स्थिति को कवर किया जाएगा और व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा की तरह इसमें कोई उम्र-सीमा नहीं है। इस बीमा का दायरा परिवार के पांच सदस्यों तक बढ़ाया जा सकता है। लाभार्थी को इस योजना के पंजीकरण के लिए मात्र 30 रुपये भुगतान करने होंगे, जबकि जबकि केंद्र एवं राज्य सरकारें बीमा करने वाली कंपनी को प्रीमियम का भुगतान करती हैं, जिसका चयन राज्य सरकारें बोली लगाकर करती हैं।

अब जरा हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में फैली डेंगू और चिकनगुनिया महामारी पर ध्यान दें, जिसके विभिन्न तबकों में फैलने के कारण अस्पतालों में बिस्तरों की कमी हो गई। यह महामारी ऐसी है, जिसमें इलाज के बाद ज्यादातर लोगों को आराम की जरूरत होती है और वे हफ्तों तक काम करने के लायक नहीं होते। फिर भी कई दिहाड़ी श्रमिक अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद काम करते हैं, क्योंकि यदि उनका इलाज मुफ्त भी होता है, तो परिवार चलाने के लिए उन्हें काम पर जाने की जरूरत होती है।

नतीजा यह हुआ कि कई अस्थायी कर्मचारियों की नौकरी चली गई, क्योंकि नियोक्ताओं ने पहले तो उन्हें किसी भी तरह के स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराने पर विचार ही नहीं किया और यदि ऐसी सुविधा किसी को उपलब्ध भी है, तो नौकरी का ऐसा कोई अनुबंध नहीं है, जो ऐसे श्रमिकों को बीमारी का इलाज कराने के बाद काम पर लौटने की अनुमति देता है। यह प्रभावित लोगों को मुश्किल स्थितियों में डाल देता है।

हम जानते हैं कि देश में हर वर्ष कुछ बड़ी रेल दुर्घटनाएं होती हैं। नतीजतन लोगों की मौत होती है, घायलों का इलाज कराना पड़ता है, सरकार मुआवजे की घोषणा करती है और लंबे समय तक मुआवजा न मिलने की शिकायतें आम बात हैं। इस समस्या के समाधान के लिए रेल मंत्रालय ने पिछले महीने कुछ सरल उपायों की घोषणा की है-रेल यात्रियों के लिए यात्रा बीमा। जो लोग आईआरसीटीसी की से टिकट की बुकिंग कराते हैं, वह उसी वक्त एक रुपया प्रीमियम पर यात्रा बीमा करा सकते हैं। इस योजना के तहत यात्री या उनके परिजनों को मुआवजे के तौर पर मौत या स्थायी अक्षमता की स्थिति में दस लाख रुपये, आंशिक अक्षमता की स्थिति में 7.5 लाख रुपये, घायलों को अस्पताल खर्च के लिए दो लाख रुपये दिए जाने का प्रस्ताव है। यह सुविधा उन सभी रेल यात्रियों के लिए उपलब्ध है, जो ई-टिकट बुक कराते हैं, उपनगरीय ट्रेनों को छोड़कर। मेरा मानना है कि यह सुविधा बुकिंग काउंटर से टिकट खरीदने वालों के लिए भी उपलब्ध होनी चाहिए।

बीमार लोगों को आय की गारंटी देने के लिए सरकार इससे सबक ले सकती है, खासकर अनियोजित क्षेत्र में या निचली श्रेणी के कर्मचारियों के लिए, जहां कोई औपचारिक अनुबंध नहीं होता है। ऐसे में डेंगू या चिकनगुनिया होने पर अनियोजित क्षेत्र के कर्मचारी अपनी दैनिक मजदूरी खोने के डर से बीमारी में काम करके अपनी जान जोखिम में नहीं डालेंगे। ऐसे कर्मियों के मामले में स्वास्थ्य सेवा से ज्यादा जरूरी उनके दैनिक वेतन को सुनिश्चित कराना है। इससे न केवल उनके जीवन की गुणवत्ता बढ़ेगी, बल्कि वास्तव में उनका सामाजिक उत्थान भी होगा।

अलग से कोई नीति बनाने के बजाय अतिरिक्त प्रीमियम के साथ इसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में शामिल किया जा सकता है। इससे न केवल लाभार्थियों का स्वास्थ्य सुनिश्चित होगा, बल्कि वे ऐसी माली हालत में नहीं फंसेंगे। यदि हम बीमारी की हालत में उनकी आर्थिक स्थिति को सुनिश्चित कर सकते हैं, तो इसका उनके जीवन पर सकारात्मक असर पड़ेगा। इससे निदान योग्य बीमारी से होने वाली मौतों की संख्या भी घटेगी।


सरकार इस पर विचार करके उन लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकती हैं, जिन्हें बुनियादी जीविका के लिए सरकार की मदद की जरूरत है। बीमा कंपनियां भी ऐसी पॉलिसी ला सकती हैं, जो शहरी गरीब एवं मध्यवर्ग की जरूरतों को संबंधित करे, जो इन दिनों ऐसी ही चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं

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