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मुनि के चरणों में जान दे दी
नई दिल्ली
Updated Tue, 30 Jul 2013 08:12 PM IST
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उतंक मुनि भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वह सौबीरनगर के एक मंदिर में रहकर भगवान की भक्ति, शास्त्राध्ययन तथा गृहस्थजनों को सदुपदेश देने में लगे रहते थे। मुनि के त्याग-तपस्यामय जीवन से राजा बहुत प्रभावित थे। उन्होंने उस मंदिर को तीर्थ मानकर सोने का शिखर भेंट किया।
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उस क्षेत्र में डाकू कणिक का बहुत आतंक था। एक दिन वह अपने गिरोह के साथ मंदिर के पास से निकला, तो सूर्य की किरणों से चमचमाते स्वर्ण शिखर को देखकर रुक गया। उसने सोचा, जब मंदिर का शिखर सोने का बना है, तो यहां रहने वाले पुजारी के पास भी धन अवश्य होगा। कणिक ने उसी रात मंदिर पर धावा बोल दिया। उसने देखा कि एक महात्मा भगवान के ध्यान में लीन हैं। उसने महात्मा पर तलवार तानते हुए कहा, सोना हमारे हवाले करो, अन्यथा काट डालूंगा।
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मुनि ध्यान लगाए बैठे रहे। कणिक ने उन्हें धक्का दे दिया। मुुनि के आंख खोलते ही उसने देखा कि उनकी आंखों से तेज बरस रहा है। उसके हाथ से तलवार छूट गई। वह मुनि के सामने हाथ बांधकर खड़ा हो गया।
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मुनि उतंक ने मुस्कराते हुए उससे पूछा, भैया, तुम लूटपाट क्यों करते हो? किसी को सताकर प्राप्त किए गए धन से भला कभी नहीं होता। पश्चाताप से भरे कणिक ने सिर पटक-पटककर अपनी जान दे दी। मुनि ने उसके शव पर भगवान विष्णु का चरणामृत छिड़क दिया। कणिक को मुक्ति मिल गई।