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छोटे सत्र से बड़ी उम्मीदें
अनुराग दीक्षित
Updated Wed, 04 Dec 2013 07:18 PM IST
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आज से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र को लेकर सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। लोकसभा अध्यक्ष राजनीतिक दलों के साथ सहमति बनाने के मकसद से बैठक पहले ही कर चुकी हैं। हर बार की तरह इस बार भी प्रत्येक दल संसद चलाने की सैद्धांतिक सहमति दे चुका है, हालांकि मुद्दों को लेकर गतिरोध भी बरकरार है। जैसा कि हर सत्र से पहले देखा जाता है, हर कोई स्वयं को अत्यधिक गंभीर दिखाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन हकीकत यही है कि सत्र को लेकर सत्ता और प्रतिपक्ष में से कोई भी जन अपेक्षाओं के अनुरूप गंभीर नहीं है।
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संसद का यह सत्र पांच दिसंबर से शुरू होकर 20 दिसंबर तक ही चलेगा, जिसमें मात्र 12 बैठकें ही होनी है! 15वीं लोकसभा के प्रथम सत्र को छोड़ दें, तो बीते पांच वर्षों में यह सबसे कम अवधि का सत्र है! ऐसा तब है, जब लंबित विधेयकों की सूची हर सत्र के बाद लगातार लंबी हो रही है।
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यह बात सही है कि सरकार के कार्यकाल का आखिरी माने जाने वाला सत्र कम अवधि का ही होता है। चौदहवीं लोकसभा का पंद्रहवां सत्र भी केवल 10 दिन ही चला था, लेकिन इस बार सौ से ज्यादा विधेयक गंभीर चर्चा के बाद कानून बनने की बाट जोह रहे हैं। लिहाजा बैठकें ज्यादा होनी चाहिए थी। प्रमुख विपक्षी दल हालांकि कम बैठकों पर आपत्ति जता चुका है। सरकार भी इस पर विचार-विमर्श की बात कह रही है। विगत मानसून सत्र में भी अवधि बढ़ाई गई थी, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। अवधि बढ़ने के बाद ही 12 विधेयकों पर मुहर समेत कुछ अन्य महत्वूपर्ण कामकाज हो सका था। जबकि आज से शुरू हो रहे शीत सत्र की 12 बैठकों में तीन दर्जन विधेयकों का भविष्य तय करना संसदीय प्रकिया के साथ मजाक-सा है।
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इस बार जिन विधेयकों पर मुहर लगने की उम्मीद है, उनमें लोकपाल विधेयक, व्हिसिलब्लोअर विधेयक, लैंड बाउंडरी समझौता विधेयक, महिला आरक्षण विधेयक जैसे कई विधेयक शामिल हैं। लोकपाल विधेयक को लेकर लड़ी गई लड़ाई की राजनीतिक परिणति आप पार्टी के रूप में सामने है। ऐसे में, लोकसभा चुनाव से पहले लोकपाल कानून बनाना केंद्र सरकार की मजबूरी होगा।
उधर, 2010 में राज्यसभा से पारित होने के बाद महिला आरक्षण विधेयक को लेकर अब बारी लोकसभा की है। सपा और राजद इसके विरोध में हैं, लेकिन लालू प्रसाद की मौजूदा राजनीतिक स्थिति के बीच शायद इस विधेयक को स्वीकृति मिल जाए। वैसे भी इस विधेयक को लेकर बात तो दशकों से हो ही रही है। ऐसे में महिला आरक्षण विधेयक को कानून बनना यूपीए के लिए ट्रंप कार्ड साबित हो सकता है। जबकि भारत-बांग्लादेश के बीच का लैंड बाउंडरी समझौता विधेयक सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकता है। भाजपा समेत अन्य दल इस समझौते के विरोध में है।
लेकिन सांप्रदायिक हिंसा विधेयक पर इससे भी ज्यादा विरोध होना तय है। भाजपा इसे संघीय ढांचे पर हमला करार देते हुए कांग्रेस पर वोट की राजनीति करने का आरोप लगा रही है। जबकि कांग्रेस इसे नकार रही है। जाहिर है, मुजफ्फरनगर दंगों के ठीक बाद इस विधेयक को लेकर सीधा टकराव दिखेगा। टकराव की एक और बड़ी वजह तेलंगाना भी है। तेलंगाना विधेयक को संसद में लाना सरकार के राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा भले ही हो, लेकिन इसको लेकर प्रक्रियागत काफी काम अभी शेष है।
साथ ही, विपक्ष के अलावा कांग्रेस का आंतरिक विरोध भी इस मामले में सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए भी कुछ विधेयक इस सत्र में प्रस्तावित हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि इन पर दलों के बीच सहमति बन सकेगी। न्यायिक सुधार और शिक्षा सुधार समेत कई अन्य प्रस्तावित विधेयकों पर भी गंभीर चर्चा की उम्मीद होगी।
यूपीए की दूसरी पारी के पांच वर्षों का यह आखिरी सत्र है। फरवरी के सत्र में वैसे भी सिर्फ लेखानुदान मांगें ही पारित होंगी। ऐसे में देखना होगा कि इस बार जनप्रतिनिधि अपने संसदीय कर्तव्य के साथ न्याय कर पाते हैं या नहीं। चुनावी समर में उतरने से पहले जनप्रतिनिधियों को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए। दुर्भाग्यवश मौजूदा हालात में यह परिपक्वता कम ही नजर आती है।