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दाग धोना चाहती है सरकार

Fri, 19 Apr 2013 09:26 PM IST
Updated Fri, 19 Apr 2013 09:26 PM IST
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gopinath munde on 2g scam

2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला मामले में गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की ड्राफ्ट रिपोर्ट ने बजट सत्र के दूसरे चरण के ठीक पहले देश की राजनीति में उबाल ला दिया है। इस रिपोर्ट से जुड़ी विपक्ष की आपत्तियों पर हिमांशु मिश्र ने लोकसभा में भाजपा संसदीय दल के उपनेता तथा जेपीसी के सदस्य गोपीनाथ मुंडे से बातचीत की -

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प्र- जेपीसी ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को क्लीन चिट दे दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सारी गलती पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा की थी।
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हमें शुरू से अंदेशा था कि जेपीसी के अध्यक्ष पीसी चाको ऐसा ही करेंगे। सरकार चाको के माध्यम से मनगढ़ंत रिपोर्ट पेश कर इस घोटाले का दाग धोना चाहती है। इसलिए प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को बुलाने की हमारी मांग लगातार खारिज होती रही। हमारा मानना है कि यह रिपोर्ट जेपीसी के अध्यक्ष चाको की नहीं, बल्कि कांग्रेस की है। हम इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करेंगे। सोमवार को सत्र में इसे पूरी ताकत से उठाएंगे। इस रिपोर्ट के लिए एक ही जगह रद्दी की टोकरी है।
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प्र- आपकी नाराजगी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को जेपीसी के समक्ष नहीं बुलाने पर है या पूरी रिपोर्ट पर ही आपत्ति है?

स्पेक्ट्रम आवंटन की नीति बनाने में प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और तत्कालीन दूरसंचार मंत्री की भूमिका साफ है। इसलिए इन तीनों को तो सबसे पहले समिति के समक्ष गवाही देने के लिए बुलाया जाना चाहिए था। यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि समिति ने इन तीनों में से किसी को बुलाना जरूरी नहीं समझा। प्रधानमंत्री ने पहले तो समिति के समक्ष पेश होने की बात की, तो बाद में पलट गए। वित्त मंत्री हमेशा दूर ही भागते रहे। वहीं राजा ने कई बार समिति के समक्ष बुलाए जाने का अनुरोध किया, लेकिन उन्हें बुलाया नहीं गया। इनसे पूछताछ किए बिना क्लीन चिट देना और महज राजा को दोषी ठहरा देना तो यही साबित करता है कि चाको ने बतौर जेपीसी अध्यक्ष अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाने के बदले कांग्रेस एजेंट के तौर पर कार्य किया।

प्र- मगर चाको का कहना है कि पूरे मामले में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की कोई भूमिका ही नहीं थी?

इससे बड़ा तथ्य और क्या होगा कि घोटाले की जड़ बनी 'पहले आओ पहले पाओ' की स्पेक्ट्रम बेचने की नीति को प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय की सहमति प्राप्त थी। इस नीति की तो इस ड्राफ्ट रिपोर्ट में भी आलोचना की गई है। फिर इस दौरान ए राजा और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच कई बार पत्र व्यवहार भी हुआ। सवाल है कि जब प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने इस नीति को अपनी मंजूरी दी, तो ये दोनों बेकुसूर कैसे हो गए। राजा ने तो आज भी कहा है कि नीति से लेकर आवंटन मामले की हर जानकारी प्रधानमंत्री को थी। ऐसे में इनकी गवाही के बिना रिपोर्ट कैसे तैयार हो सकती है।

प्र- तो क्या फिर आप राजा को बेकुसूर मानते हैं?

नहीं। यह मिला-जुला खेल था। स्पेक्ट्रम आवंटन की नीतियां बनाने में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की भूमिका स्पष्ट है। इसलिए ये दोनों अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। राजा उस दौरान दूरसंचार मंत्री थे, तो उन्हें निर्दोष कैसे कहा जा सकता है?


प्र- लेकिन ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार होने के बाद अब आप क्या करेंगे?

सबसे पहले तो हम रिपोर्ट के निष्कर्षों पर लिखित असहमति दर्ज कराएंगे। सत्र के पहले ही दिन यह सवाल उठाएंगे कि आखिर ड्राफ्ट रिपोर्ट लीक कैसे हुई। विपक्ष रिपोर्ट के माध्यम से थोपी गई मनमानी स्वीकार नहीं करेगा। चाको ने पक्षपात कर जेपीसी और संसद की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाया है। हम अब भी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को जेपीसी के समक्ष बुलाए जाने की मांग पर कायम हैं।

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