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अच्छा हुआ कि मैं मंत्री नहीं बना

Wed, 11 Jun 2014 07:46 PM IST
सुधाकर आशावादी
सुधाकर आशावादी Updated Wed, 11 Jun 2014 07:46 PM IST
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Good that I do not become a minister

मैं चाह रहा था कि जैसे भी हो, नमो मंत्रिमंडल में जगह मिल जाए। महीनों से एक ही पक्ष के सुर में सुर मिलाने का कोई इनाम मिल जाए। जब किसी को हारने के बावजूद महत्वपूर्ण मंत्रालय मिल सकता है, तो मैं ही क्या बुरा था? पर मेरे नाम पर विचार नहीं किया गया। मेरी निष्ठा को पुरस्कार नहीं मिला। लेकिन अब लगता है, अच्छा ही हुआ कि दिल टूट गया। कह सकते हैं कि अंगूर खट्टे हैं। लेकिन दिन भर चारपाई का सुख लेने वाले से अगर कोई कहे कि अट्ठारह घंटे काम करो, बिलकुल आराम न करो-ऐसा मैं स्वीकार नहीं कर सकता।

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वैसे भी कोई मंत्री क्यों बनता है? समस्याएं सुलझाने के लिए किसी को मंत्री बनते मैंने पिछले तीस वर्षों में नहीं देखा। सभी अपने और अपने परिजनों को लाभ पहुंचाने के लिए मंत्री बनते रहे हैं। किसी ने अपने बेटे-पोतों को लाभ के पदों पर बिठाया, किसी ने अपने दामाद की दुकानदारी चलवाई, समाज को संदेश दिया कि तीन लाख से तीस करोड़ कैसे बनाए जाते हैं।
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लेकिन पहली बार पता चल रहा है कि मंत्री बनना आसान नहीं है। मंत्रियों से कहा जा रहा है कि अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करें, अपनी कार्यशैली में पारदर्शिता लाएं, अपने रिश्तेदार को कोई लाभ मत पहुंचाएं। एक सांसद ने पिता को अपना प्रतिनिधि क्या बना लिया, उस पर हंगामा खड़ा हो गया। मजबूरन उन्हें अपना कदम वापस लेना पड़ा।
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कोई अपनों पर यकीन नहीं करेगा, तो क्या औरों पर करेगा? मुहल्ले के सभासद तक से हिसाब-किताब नहीं मांगा जाता कि उसने कितनी कमाई की या अपने कितने रिश्तेदारों को नाली खड़ंजे बनवाने का ठेका दिलाया। लेकिन मोदी जी मंत्रियों से हिसाब मांग रहे हैं। साथ ही, नसीहत भी दे रहे हैं कि मंत्रालय में कोई रिश्तेदार न आ जाए, परिवार वाले किसी ऐसे धंधे में भागीदारी न कर लें, जिसे सरकारी कृपा से चलाया जा रहा हो। ऐसे में तो मंत्री बनने का कोई चार्म ही नहीं रह जाएगा। यही कारण है कि मंत्रिपद न मिलने पर मैं खुश और खुद को भाग्यशाली मान रहा हूं।

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