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दिल के लिए भी अच्छी राजनीति चाहिए
डॉ देवेंद्र सक्सेना
Updated Sat, 20 Dec 2014 08:34 PM IST
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यह एक दिलचस्प, लेकिन अनिवार्य सच्चाई है कि अच्छे दिन के लिए भी अद्भुत राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत होती है। मैं जब यह कह रहा हूं तो एक ऐसा हार्ट सर्जन होने के नाते कहता हूं जिससे ह्रदय की शल्य चिकित्सा के मानवीय पहलुओं पर पश्चिम के सर्वोत्कृष्ट सर्जनों के बीच सवाल किए जाते हैं। विकासशील देशों की जमीनी सच्चाई को जाने बिना इसकी पड़ताल नहीं की जा सकती। हाल में बीमारियों से मौत के जो आंकड़े आए हैं, उनमें गरीब देशों की आबादी और दिल का गहरा संबंध है।
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सत्तर के दशक में जब मैंने तय कि ह्रदय के सर्जन के तौर पर काम करूंगा, तो विदेश जाने वाला मैं घर का पहला सदस्य था। उस वक्त जब सब ब्रिटेन चुनते थे, मैंने अमेरिका को चुना। हेनरी फोर्ड हॉस्पिटल, डेट्रॉयट और यूनिवर्सिटी ऑफ यूटा हॉस्पिटल साल्ट लेक ने अवसर दिए। डॉ. नेल्सन के साथ काम करते हुए हमें शल्य क्रियाओं में सीधे हिस्सा लेने का मौका मिला। हार्ट सर्जरी में वॉल्व प्रत्यारोपण के क्षेत्र में यह अनूठी मानवीय सेवा थी। प्रशिक्षण के बाद मैंने जब भारत आकर यह शुरू करना चाहा, तो पहली समस्या सोच की थी। कहा गया, हमारे यहां तो सिरदर्द दूर करने में मुसीबत हो जाती है। न संस्थान तैयार दिखाई देते थे, न लोग। कोई साल भर तक यह संघर्ष चला। यह समझाना अपने आपमें तकलीफदेह था कि जिस प्रत्यारोपण से सैकड़ों जानें बचाई जा सकती है, वह शुरू करने के लिए एक विशेषज्ञ को कैसे महंगी मशीनों, खर्चीली व्यवस्था और अनुपयोगी व्यापार संभावनाओं के खांचे में फिट करके देखा जा रहा था। कौन करवाएगा? कितनी जरूरत है? खर्च कहां से आएगा? इतनी खर्चीली सर्जरी के लिए यहां कौन तैयार होगा? इतने सवाल कि मैंने हताश होकर डॉ नेल्सन को फोन किया कि जैसा सब चाहते थे, मैं अमेरिका लौटना चाहता हूं। यहां इस सेवा की संभावनाएं न्यूनतम हैं। डॉ नेल्सन ने तसल्ली से सुना और कहा, हम तुम यहां हमेशा यहां रखना चाहते हैं, लेकिन एक अच्छी कोशिश और करो। सोचो कि क्या किया जा सकता है।
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1971, में बांग्लादेश का युद्ध हमने जीता था। देश में राजनीतिक माहौल सकारात्मक दिखाई दे रहा था। मेरे लिए एक चिट्ठी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सीनेटर बैनेट ने लिखी और फिर मार्ग प्रशस्त हुआ। लेकिन, यह सब संदर्भ इसलिए कि आगे के अनुभवों में मैंने पाया कि पश्चिम के फॉरमूले से पूरब का सच निकाल लेना एकदम नाइंसाफी है। विकासशील देशों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति इतनी भिन्न है कि हमें ह्र्दय सर्जरी के मानवीय पैमानों को ऊंचा रखना पड़ेगा। गो कि मुनाफे के साम्राज्य में कौन सुनने को तैयार होगा?
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एक मिसाल लेते हैं। ह्रदय के वॉल्व सस्ते, ज्यादा कारगर और अधिकतम जीवन वाले होने चाहिए, इस पर ढाई दशक से कोई काम नहीं हुआ। उल्टे वे कंपनियां जिन्हें इस मामले में आर ऐंड डी करने के लिए उत्तरदायी होनी चाहिए, कुछ बेहतर चीजें उत्पादित करना ही बंद कर रही हैं। मैंने अध्ययन किया कहीं ये कंपनियां बिल्कुल लाभ ही नहीं कमा रही हों, शायद इसलिए उन्हें ऐसा करना पड़ रहा हो। मगर अचरज है कि 13 अरब डॉलर से अधिक का मुनाफा कमा रही मेट्रोनिक हॉल ने अपना सर्वश्रेष्ठ वॉल्व बनाना बंद कर दिया। यह बहुत लंबे समय तक जीवन का साथ देता रहा है। एक मामूली दवा के साथ इसके नतीजे श्रेष्ठ थे। कंपनी वे किस्में बना रही हैं, जो कम सालों तक चलती हैं और उन्हें कुछ सालों बाद फिर ऑपरेशन के जरिये बदलना पड़ता है। सस्ती, श्रेष्ठ लंबे समय तक साथ देने वाली और सब तक पहुंच वाली चीज उनके खांचे में फिट नहीं बैठती। इसके लिए शोध में निवेश ही नहीं है। पश्चिम के सर्जन पूछते हैं, दोबारा-तिबारा ऑपरेशन में हर्ज क्या है? यदि ऐसे वॉल्व हैं, जो बिना अतिरिक्त सार-संभाल के चलें, भले ही कम दिन सही। उन्हें बताना पड़ता है कि अविकसित और विकासशील देशों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वे एक जीवन में, एक संतान के लिए एक ऑपरेशन में ही टूट जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े देखेंगे, तो पता लगेगा कि अफ्रीकी और अविकसित देशों में मलेरिया के मुकाबले ह्रदय वॉल्व की खराबियों से ज्यादा मौतें हुई हैं। उनके जीवन की गुणवत्ता घट गई है। वे महंगे इलाज का बोझ नहीं उठा सकते। यह मानवीय पहलू है, किंतु इस दृष्टि से कोई निवेश ही नहीं करना चाहता।
मैंने कुछ देशों में प्रयोग किए हैं और स्पष्ट रूप से पाया है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति का कोई विकल्प नहीं है। इसके बाद आती है, जनता की अपनी इच्छा और उसका दबाव, अंततः सकारात्मक इच्छा से लगाई गई पूंजी। उससे भी बड़ा, खुद चिकित्सा क्षेत्र का व्यवहार। मॉरीशस जैसी जगह में हमने सरकार की मदद से वहां के लिए विशाल संस्थान खड़ा करने में कामयाबी पाई। शकर मजदूरों के बीच, पूरी आबादी रुमेटिक हार्ट डिसीज सबसे बड़ी समस्या थी। स्वामी कृष्णानंद के जरिये मार्ग बना। शुरुआत में एक छोटी टीम जिसमें एक बायो मेडिकल इंजीनियर, वेंटिलेटर और हार्ट लंग मशीन तक भारत से साथ ले जाने के बावजूद वहां सरकार न चाहती तो हम सब मिलकर कुछ नहीं कर सकते थे। आज सर शिवसागर रामगुलाम संस्थान देश के सभी नागरिकों के लिए निशुल्क डायलिसिस और हार्ट सर्जरी की सेवाएं देता है। उस इमारत के लिए स्थानीय लोगों ने स्वेच्छा से श्रमदान किया है। रोजाना के काम से बचे हुए समय में उन्होंने यहां आगे बढ़कर काम किया और देश के लिए संस्थान खड़ा किया। इसके ठीक उलट मेरे पास मेडागॉस्कर का उदाहरण है। वहां अद्भुत प्राकृतिक संपदा है, विशानलसंसाथन थे, लेकिन कुछ नहीं हो सका। यहां तक कि फ्रांस में प्रशिक्षित एक हार्ट सर्जन जब राष्ट्र प्रमुख हुए तो हमें आशा बंधी थी, लेकिन नतीजा शून्य रहा। यह अनुभव बताता है कि जनता और सरकार में साझा न हो तो कोई कुछ नहीं कर सकता।
तंजानिया, ओमा, इंडोनेशिया और रवांडा समेत ( जहां हमने सब सहारन अफ्रीका का पहला सॉलिड ट्रांसप्लांट किया) कई जगहों पर हमने प्रयोग किए, लेकिन वहां जनता की इच्छा और राजनीतिक इच्छा शक्ति का मेलनहीं हुआ, वहां प्रयोग अधूरे रहे। हमने तंबूओं में ऑपरेशन किए, सर्जनों को भारत बुलाकर प्रशिक्षण दिया और खुद मॉनीटरिंग की। लेकिन नतीजे वहीं मिले जहां दिल साफ थे। बर्मा में कहने को सैनिक सरकार थी, लेकिन रंगून के एक प्रयोग को हम सफलता से कर सके, क्योंकि वे चाहते थे कि ऐसा हो। यह दृष्टि और इरादे की बात है।
विकसित राष्ट्रों के विशेषज्ञ मुनाफा केंद्रित कंपनियां अपनी जगह हैं और कथित तीसरे विश्व की आवश्यकताएं अपनी जगह। वे तो यह भी पूछ सकते हैं कि ऑपरेशन के दौरान आप कैसे तय करते हैं कि वह गरीब है या नहीं? हम उन्हें कहते हैं, हम खोजी एजेंसी नहीं हैं। एक प्रक्रिया है, एक मानवीय संवेदना है, एक सच्चाई है। आपको चिकित्सा के मूलभूत तत्व को साथ रखना पड़ेगा, सिर्फ बाजार और व्यवस्थागत खींचातानी के भरोसे आप मानवीय नहीं हो सकते। विशेषज्ञों को सोचना चाहिए अफ्रीका के भयावह हालात के बारे में, आर्थिक रूप से पिछड़े देशों के लिए, जहां एक ट्रांस्प्लांट से जीवन बदल सकता है। उनके लिए मानवीय विचारों के साथ शोध होना चाहिए।
कोई कॉमन फॉरमूला नहीं है। हर जगह की जरूरत के मुताबिक, उसकी अर्थव्यवस्था तथा सामुदायिक संरचना के मद्देनजर हल निकालना जरूरी है। कुछ लोग इसलिए जी रहे हैं, ताकि आप जी सकें। यह गरीबी का ग्लोबलाइजेशन है। इसे बदलन के लिए बीज, मिट्टी और माहौल तीनों चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित सभी एजेंसियों के आंकड़ें हमें चुनौती दे रहे हैं। राजनीतिक दृढ़ता से जनपक्षीय आर्थिक नीतियों को बनाए बगैर बेहतर स्वास्थ्य की बात सोचना बेमानी है।
आंकड़े अपनी जगह रखें तो भी उम्मीद करनी हो होती है। कुछ नहीं तो, दिल के लिए क्या यह ख्याल काफी नहीं, माना कि इस जहां को गुलजार न कर सके हम, दो चार खार कम कर दिए गुजरे जहां से हम।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में दिए गए विशेष अतिथि व्याख्यान के अंश। अमर उजाला के लिए विशेष। मुंबई स्थित लेखक मॉरीशस के सर्वोच्च अलंकरण कमांडर ऑफ द ऑर्डर और द स्टार ऐंड की ऑफ द इंडियन ओशन सहित कई अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत