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वैष्णो देवी और केदारनाथ की यात्रा पैदल ही भली है जानिए क्यों

Tue, 09 Jun 2015 08:20 AM IST
नारायण दत्त
नारायण दत्त Updated Tue, 09 Jun 2015 08:20 AM IST
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goes to visit the shrine, not to tours

केदारनाथ का मार्ग सौंदर्य की दृष्टि से जितना अप्रतिम है, चढ़ाई की दृष्टि से उतना ही बीहड़। जिस वक्त की यह घटना है, उस समय यात्रा नितांत दुर्गम थी। लेकिन प्राकृतिक सुषमा देवभूमि के नाम को चरितार्थ करती छाई रहती थी। अब से करीब चालीस साल पहले केदारनाथ का मार्ग बीहड़ था, तो चोट भी बहुत लगती थी।

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एक चट्टान ऊपर से लुढ़क जाने के कारण उन विदुषी को, जिनका नाम माता निर्मला था, काफी चोटें आई थीं। उनकी उम्र साठ साल से ऊपर थी। पहाड़ के पथरीले और उतार-चढ़ाव वाले सर्पीले रास्तों पर तो क्या, समतल धरातल पर भी उनके लिए पैदल चलना बेहद कठिन था।
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लगता था कि निर्मला जी बड़े संपन्न परिवार की थीं। उनके साथ कई आदमी थे। उन लोगों ने उन्हें सहारा दिया। उनके जख्म साफ किए, उस पर दवा लगाई और उसके बाद उन्हें एक कंडी पर बैठाया। यात्रा पहले की तरह फिर आगे बढ़ने लगी। माता जी का बड़ा मन था कि पैदल ही चला जाए। मगर कंडी पर बैठे-बैठे भी पीड़ा कभी-कभार कसक उठती थी।


लेकिन मां निर्मला सदा की तरह शांत और हंसमुख बनी रहीं। स्वामी वासुदेव तीर्थ के साथ हम, यानी यह लेखक, भी उनके पास गया। शिष्टाचारवश बड़ी विनम्रता से मैंने उनसे कहा, माता जी, आपको बहुत चोट लगी है। आप की तकलीफ देखी नहीं जाती। आप पैदल नहीं चल रहीं, फिर भी आपके मुखमंडल पर वेदना वक्त-बेवक्त छलक ही आती है।

बात काटकर निर्मला जी अत्यंत स्नेह जताती हुई बोलीं, बेटा, कष्ट तो कोई नहीं है! कष्ट सिर्फ यह है कि मैं अपने पैरों से केदारनाथ जी तक नहीं जा पा रही। तीर्थ तो यात्रा करने जाते हैं, किसी सैर-सपाटे के लिए नहीं। वहां चोट सही जाती है, कही नहीं जाती।

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