सियासत नहीं, समाधान चाहिए
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संसद से कुछ ही कदमों की दूरी पर लोगों की भीड़ के बीच राजस्थान के एक किसान द्वारा आत्महत्या की चौंकाने वाली घटना ने भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन स्थिरता देने के लिए जारी बहस में एक नया आयाम जोड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक, वर्ष 1995 से अब तक करीब तीन लाख किसानों ने देश में खुदकुशी की है। आत्महत्या की दर में वृद्धि तब होती है, जब सूखे और बेमौसम बरसात के कारण फसलों को भारी नुकसान पहुंचता है, जैसा कि अभी हुआ है। दिल्ली में आप की रैली में एक किसान की मौत ने एक बार फिर से छोटे किसानों की दुर्दशा को सामने लाया है, जिन्हें संकट के समय में वास्तव में कोई सुरक्षा तंत्र हासिल नहीं है।
लोकसभा में इस बात पर चर्चा हुई कि अनिश्चित मौसम और फसलों की अस्थिर कीमतों से किसानों को राहत दिलाने के लिए कैसे दीर्घकालीन समाधान निकाले जा सकते हैं। बहस का जवाब देते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि देश की 60 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है, जबकि देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान मात्र 14 फीसदी है। यानी समस्या यह है कि 60 फीसदी लोग राष्ट्रीय आय में मात्र 14 फीसदी का योगदान कर रहे हैं। यह एक संरचनात्मक समस्या है, जिसके दीर्घकालीन समाधान की जरूरत है। निश्चित रूप से हमें कृषि क्षेत्र से आबादी के दबाव को विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र की तरफ ले जाने की जरूरत है। लेकिन ऐसा नए नीतिगत प्रोत्साहनों और किसानों के साथ निरंतर संवाद, दोनों के जरिये ही करना होगा।
राजग सरकार तर्क दे रही है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में नए औद्योगिक केंद्र स्थापित करना है, ताकि कम आय वाले कृषि कार्यों में लगी अतिरिक्त आबादी को नए उद्योगों एवं सेवाओं में खपाया जा सके। भाजपा नेता तर्क देते हैं कि खेतिहर परिवार नहीं चाहते कि उनके बच्चे कम आय वाले कृषि कार्यों में फंसे रहें और वे अपनी अगली पीढ़ी के ज्यादातर लोगों को गैर-कृषि कार्यों में लगाना पसंद करेंगे।
इस दावे में कुछ सच्चाई हो सकती है, पर हमारे जैसे लोकतांत्रिक समाज में कृषि क्षेत्र से उद्योगों की तरफ आबादी का स्थानांतरण धीरे-धीरे ही हो सकता है। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार जल्दबाजी में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पारित कराना चाहती है। ऐसा तब हो रहा है, जब उत्तरी और पश्चिमी भारत कृषि अर्थव्यवस्था के अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। जब इतने बड़े पैमाने पर किसान खुदकुशी कर रहे हैं, तो सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता इस तात्कालिक समस्या को दूर करने और किसानों तक राहत पहुंचाने की होनी चाहिए।
जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री प्रोफेसर अशोक गुलाटी, जो नीति आयोग में कृषि प्रकोष्ठ के सदस्य भी हैं, कहते हैं कि देश में सबसे पहले किसानों के लिए एक व्यापक कृषि बीमा जरूरी है। यह सूखे और बेमौसम बारिश के समय में संकट को कम करेगा। उनके अनुसार, भारत के बहुत कम किसान बीमा सुरक्षा के दायरे में हैं। 19 करोड़ हेक्टेयर सकल बुवाई वाले क्षेत्रों में से मात्र 1.5 करोड़ हेक्टेयर भूमि ही बीमा के दायरे में है। यानी अपेक्षाकृत सिर्फ बड़े किसान ही बीमा के दायरे में हैं। जबकि चीन में 80 फीसदी कृषि भूमि बीमा के दायरे में है और ज्यादातर प्रीमियम राशि सरकार चुकाती है।
गुलाटी बताते हैं कि चीन में एक व्यवस्था है, जिसके जरिये ज्यादातर किसानों ने जमीन से जुड़े अपने बैंक खाते रजिस्टर्ड कराए हैं और प्राकृतिक आपदा से फसलों को हुए नुकसान की स्थिति में 24 घंटे के भीतर राहत राशि उनके खाते में आ जाती है। जबकि अपने देश में इतने बड़े पैमाने पर फसल विनाश के बाद भी किसानों को नौकरशाही की लालफीताशाही का सामना करना पड़ता है। सरकार ने कई राहत उपायों की घोषणा की है, लेकिन इसमें संदेह है कि ये छोटे किसानों तक पहुंचते हैं।
इन सबके बावजूद सरकार जोर देकर कह रही है कि वह किसानों के व्यापक हित में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को आगे बढ़ाएगी। क्या सरकार ने किसानों से पूछा है कि वे क्या चाहते हैं? भाजपा क्यों नहीं समझती कि मौजूदा माहौल में किसानों को मनोवैज्ञानिक तौर पर नुकसान हुआ है और उन्हें डर है कि सरकार द्वारा जबरन भूमि अधिग्रहण उनके दुख को बढ़ाएगा ही? वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक अखबार से कहा कि एक लंबा औद्योगिक कॉरिडोर बनाने के लिए लाखों किसानों से सहमति लेना मुश्किल है। भाजपा अगर सोच रही है कि इतनी ज्यादा जमीन वह किसानों की सहमति के बगैर अधिगृहीत कर लेगी, तो गलती कर रही है। क्या किसी भी तरह नरेंद्र मोदी के लिए मौजूदा कृषि संकट का समाधान होने तक छह महीने के लिए इस अध्यादेश को स्थगित करना संभव नहीं है?
जाहिर है, मोदी इस धारणा के हैं कि इस स्तर पर अगर वह पीछे हटे, तो उनकी सरकार को कमजोर समझा जाएगा। कुछ लोग तर्क देते हैं कि राजग सरकार विदेशी निवेश के प्रति प्रतिबद्ध है, इसलिए वह विदेशी निवेश के प्रवाह को बढ़ाने के लिए भूमि कानूनों, श्रम कानूनों और कर कानूनों को ठीक करेगी। वास्तव में कोई नहीं जानता कि जब देश इतने बड़े कृषि संकट से गुजर रहा है, तो भूमि अध्यादेश को इतनी तत्परता से आगे बढ़ाने की मोदी की असली मजबूरी क्या है। यह भी अजीब है कि अपने तमाम संवाद कौशल के बावजूद मोदी अब तक किसानों को यह नहीं समझा पाए हैं कि यह अध्यादेश किसानों के लिए कैसे लाभप्रद है।
सरकार एक वैकल्पिक रणनीति अपना सकती है। संकटग्रस्त किसानों को जरूरी अल्पकालीन राहत मुहैया कराने के बाद वह ग्रामीण उद्यमियों द्वारा छोटे औद्योगिक केंद्र बनाने के लिए चीन के शहर एवं गांव उद्यम (टीवीपी) मॉडल का उपयोग कर सकती है। 1980 के दशक में चीन में टीवीपी काफी सफल हुई थी और व्यापक रोजगार का सृजन कर कृषि क्षेत्र में लगी करीब 35 फीसदी आबादी को उद्योगों में खपाया गया था। मुद्रा बैंक इन छोटे औद्योगिक केंद्रों को वित्तीय मदद दे सकता है, जिनके लिए ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं है। पंचायतों की सहमति से इन केंद्रों के लिए भूमि अधिगृहीत की जा सकती है। सरकार को शहरों के सीमांत पर बसे ग्रामीण इलाकों के शहरीकरण के बारे में ज्यादा रचनात्मक ढंग से सोचने की जरूरत है।