अपनी बात साझा करने लगी हैं ये लड़कियां
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नाम कुछ भी हो सकता है, मालती, सपना, कविता, अंजलि या प्रिया। देश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार मिर्जापुर के रामापुर और गड़ोली गांव की इन लड़कियों की कहानियां भी एक सी हैं और सपने भी। मगर मुश्किल यह है कि उन्हें अंधेरे से डर लगता है, क्योंकि उन्हें सुबह के धुंधलके में या फिर देर होती शाम को ही शौच के लिए घर से बाहर जाना होता है। इनमें से अधिकांश के घरों में शौचालय नहीं है। कई के घरों में तो स्नानघर भी नहीं है, लिहाजा रोज सुबह उनकी माएं उनका सबसे बड़ा सहारा बनकर खड़ी होती हैं, ताकि वह समय पर स्कूल या कॉलेज जा सकें।
देश में दो अक्टूबर को काफी व्यापक पैमाने पर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की गई है। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र से महज चालीस किमी दूर इस क्षेत्र में लड़कियों के लिए सबसे बड़ी समस्या शौचालय को लेकर ही है। वैसे यह क्षेत्र मिर्जापुर जिले में पड़ता है, जिसका प्रतिनिधित्व युवा सांसद अनुप्रिया पटेल करती हैं। इन लड़कियों का बस चले तो वे प्रधानमंत्री और अपनी सांसद को शौचालय निर्माण के लिए सीधे अर्जी दे आएं। अंजलि कहती है, मगर हमारी सुनता कौन है? बीच में बात काटते हुए प्रियंका बोल उठती है, 'घरवाले तक बोलते हैं कि लड़की हो लड़की जैसी रहा करो।'
वाकई ये लड़कियां अब मुखर हो गई हैं। पहले इतना खुलकर अपनी बात नहीं कह पाती थीं। इनके बीच समूह बनाकर काम कर रही सारथी संस्था के विजय पांडेय कहते हैं, 'बात से ही बात बनती है। इसलिए हम इन्हें बात करना सिखा रहे हैं।' वाकई उनकी बात में दम है। इसका सबसे बड़ा असर यह हुआ कि लड़कियां खुलकर अपनी बात कह रही हैं। कुछ महीने पहले जब विजय इनके बीच गए तो ये लड़कियां इतना सकुचाती थीं कि अपना नाम तक ठीक से नहीं बता पाती थीं। फिर एक वक्त ऐसा भी आया कि इन्हीं में से एक लड़की ने उन्हें ऐसी बात साझा की, जिसका शिकार बहुत-सी लड़कियां होती हैं, मगर परिवार और सामाजिक दबाव के कारण किसी से कह नहीं पातीं। विजय बताते हैं कि उस लड़की ने उन्हें बताया कि एक करीबी रिश्तेदार उसके साथ अश्लील हरकतें करने की कोशिश करता है! समूह में आने का असर यह हुआ कि उसने हिम्मत के साथ यह बात अपनी मां को बताई।
अमर उजाला ने सोचा कि क्यों न उन गांवों में जाकर उन लड़कियों से रूबरू हुआ जाए और उनसे उनकी बातें सुनी जाएं। इन लड़कियों में आए बदलाव का ही नतीजा है कि वह अब अपने गांवों की समस्याओं पर भी खुलकर बोलने लगी हैं। फिर वह बंद पड़े चापाकल हों या फिर स्कूल के शौचालय में पानी की किल्लत। वैसे इन दोनों गांव का हाल सूबे के दूसरे गांवों से बेहतर नहीं है। मसलन बिजली को ही लीजिए, जैसा कि प्रियंका कहती है, 'हिसाब किसका रखें, बिजली के आने का या उसके जाने का।' मगर भारतरत्न सचिन तेंदूलकर का इन्वर्टर वाला विज्ञापन इनके लिए बेमतलब का है, क्योंकि गांव में किसी की इतनी हैसियत ही नहीं कि वह इन्वर्टर खरीद सके। इसका उसर उनकी पढ़ाई पर होता है, खासतौर से परीक्षा के इस मौसम में उनकी मुश्किलें खासी बढ़ गई हैं।
सच तो यह है कि इनमें से अधिकांश लड़कियों का दायरा महज आठ-दस किमी तक ही सिमटा हुआ है। पूजा को ही लीजिए उसने सिर्फ एक बड़ा शहर देखा है बनारस। और वह भी तब, जब उसे पॉलिटेक्निक प्रवेश परीक्षा के लिए पिता के साथ वहां जाना पड़ा। प्रधानमंत्री ने भले ही देश में बुलेट ट्रेन चलाने का सपना दिखाया है, लेकिन उनके निर्वाचन क्षेत्र से महज चालीस किमी दूर गड़ौली की बीए प्रथम वर्ष में पढ़ रही 18 बरस की पूजा तो कभी ट्रेन में बैठी तक नहीं है! कहती है, 'सर कहीं आना-जाना होगा तभी न ट्रेन में बैठेंगे।' मगर संजू की याद में बचपन का वह सफर है, जब उसके दिल्ली में काम करने वाले पिता ने उसे ट्रेन का सफर कराया था। वाकई ये लड़कियां उस ट्रेन के इंतजार में है, जो उन्हें उम्मीदों के सफर पर ले जाए।