बारात लौटाती लड़कियां
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एक लड़की ने अपने होने वाले दूल्हे से मामूली संख्या का जोड़ पूछा। जब दूल्हा सही जवाब नहीं दे सका, तो लड़की ने उससे शादी करने से मना कर दिया। लड़की ने कहा कि वह बारहवीं पास है। ऐसे लड़के से शादी क्यों करे, जो दो संख्याओं को जोड़ तक नहीं सकता। बात पुलिस तक पहुंची। पुलिस ने समझौता कराने की कोशिश की, मगर लड़की नहीं मानी। दूसरी घटना में एक लड़का और लड़की साथ पढ़ते थे। दोनों में प्यार हो गया। परिजनों को पता चला, तो दोनों की शादी तय कर दी गई। गाजे-बाजे के साथ दूल्हे राजा लड़की के दरवाजे पहुंचे। जयमाला के वक्त जैसा कि अकसर होता है, दूल्हे ने सिर नहीं झुकाया। दूल्हे के यार दोस्त भी मजाक करने के लिए प्रायः यह अवसर चुनते हैं। दूल्हे को बार-बार समझाया जाता है कि वरमाला के वक्त सिर मत झुकाना वरना जिंदगी भर पत्नी के सामने सिर झुकाना पड़ेगा। लड़की ने कई बार माला डालने की कोशिश की, मगर सफल नहीं हुई। उसने दूल्हे को चेताया भी कि अगर अगली बार सिर नहीं झुकाओगे और माला नहीं डाल सकी, तो ठीक नहीं होगा। लेकिन दूल्हा नहीं माना। बस लड़की ने माला तोड़कर एक ओर फेंकी और मंच से नीचे उतरकर चली गई। उसने शादी करने से भी इनकार कर दिया।
एक घटना में दूल्हा शराब पीकर आया, तो लड़की नाराज हो गई। कहा कि वह शराबी से कतई शादी नहीं करेगी। एक अन्य घटना में दूल्हे को मिर्गी के दौरे पड़ते थे और लड़की तथा उसके परिवार वालों से यह बात छिपाई गई थी। बारात जब आई, तो एकाएक दूल्हे की तबियत खराब हो गई। लड़की ने यह देखा तो उसी समय ऐसे दूल्हे को स्वीकार करने से मना कर दिया। एक समय में तो ऐसा होता था कि शादी अगर तय हो गई, तो लड़का अनपढ़ हो, बेरोजगार हो, निशक्त हो, पागल या किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हो यानी कि कैसा भी हो, लड़की को शादी करनी ही पड़ती थी। तब लड़की की अपनी इच्छा और विरोध की कोई कीमत भी नहीं थी। परिवार के सम्मान के नाम पर उसके गले किसी को भी बांध दिया जाता था।
रोचक तथ्य यह भी है कि ऊपर वर्णित ये सभी घटनाएं किसी महानगर में नहीं, देश के छोटे शहरों और गांवों में हुईं। इस तरह लड़कियों का शादी से मना कर देना और बारातों का दुल्हन के बिना लौट जाना भारतीय समाज के लिए नई और आश्चर्य जनक घटनाएं हैं। वरना तो अब तक होता यह था कि ऐन विवाह से पहले लड़के वालों की तरफ से कोई भारी-भरकम मांग पेश की जाती थी। यह मांग अकसर फेरों से पहले होती थी। जिससे कि लड़की के परिवार वाले मना ही न कर सकें। उन्हें हर हाल में जो कुछ मांगा गया है, वह देना पड़े। मांग पूरी न होने पर बारात लौटा ले जाने और शादी तोड़ने की धमकी दी जाती थी।
लड़की वाले शादी टूटने के डर से जैसे-तैसे वर पक्ष की मांग पूरी करते थे। भारतीय समाज का यह नृशंस रूप बहुत बार देखने को मिलता था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। लड़कियां चाहे पढ़ी लिखी हैं, नौकरी करती हैं, अथवा कम पढ़ी-लिखी हैं और आत्मनिर्भर भी नहीं हैं, तब भी उन्हें अपने अधिकारों का पता है। ऐसे अवसरों पर अकसर परिवार और समाज का साथ भी उन्हें मिलता है। महिला कानूनों के चलते अकसर पुलिस की मदद भी लड़की वालों को मिलती है।
कई स्थानों पर पिछले ही दिनों दहेज की मांग करने और पूरी न होने पर शादी न करने की धमकी देने वाले लोगों को और पूरी बारात को बंधक तक बना लिया गया।
बारातियों और दूल्हे के घरवालों की पिटाई भी की गई। आज कोई भी लड़की का हाथ थामने के बदले लड़के वालों के सामने गिड़गिड़ाना नहीं चाहता, न ही पुरानी हिंदी फिल्मों की तरह बारंबार अपनी पगड़ी उतारकर लड़के वालों के पैरों पर रखता है। ये सभी घटनाएं बताती हैं कि धीरे-धीरे लड़की के नाम पर होने वाला इज्जत का डिस्कोर्स बदल रहा है। समाज में होने वाली ये घटनाएं भले ही कम हों, मगर एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत तो हैं ही।